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Monday, February 20, 2012

नमक की कीमत

मैं धूप में चमकता...
पिघलता ..
गुजरात की धरा पर
जमा पड़ा ...
नमक हूँ मैं |

मैं खुद की कीमत...
जानता नहीं..
मैं खुद को बेचने ...
बाजार जाता नहीं...
मेरी कीमत आंकते..
कुछ नमक हराम हैं..
दुहाई देते मेरी वो ..
सारे आम हैं...

क्यूँ मेरी दलाली करते हो..
क्यूँ देते हो वास्ता मेरा तुम..
मेरी हलाली का..

क्यूँ नारी, तू सौंप देती ..
लाज अपनी..
किसी वहशी मुनीम को..
क्यूँ मजदूर चुका रहा ..
कीमत दे जान अपनी...
किसी मशीन में हाथ कटा..
क्यूँ चुका रहा..
मजदूर मजदूर का..
हक के लिए..सर फटा...
क्यूँ जुल्म सह रही अबला..
घरों में हिंसा की शिकार हो...
क्यूँ भ्रस्त लोगो को चुन रहे..
क्यूँ, किसको हक अदा कर रहे तुम....

मैंने(नमक) कभी अपनी कीमत
मांगी नहीं...
मेरी कीमत लहू में बह रही,
जो तुमने जानी नहीं ..

कभी सुना कहीं...नमक ने ..
नमक हलाली की
दुहाई दी हो
क्यूँ नमक हरामो को मेरी हलाली देते हो.....
क्यूँ देते हो..?
क्यूँ कीमत के नाम पर मेरी...
तुम अन्याय सहते हो......

रामेश्वरी

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