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Tuesday, August 21, 2012

जिनके लिए सब रेखाएं पार की, दरकिनार की...
आज देखो वही जकड़ते हैं पग हमारे लक्ष्मण रेखाओं में....रामेश्वरी ...
ना सेंको रोटिया, स्वार्थ की..
जला आशियाना किसी गरीब का..
आज रोटी तुम्हारी है, कल उनकी होगी..
यह बस खेल है बनते बिगड़ते नसीब का.....रामेश्वरी
लू बनकर ढाती हैं सितम ये हवाएं भी कभी कभी...
गर हमने भी खुद को पत्थर का बना दिया, बोल तेरा मोल क्या होगा.......रामेश्वरी
क्या मिला उनको दोनों आँखें बंद करके ...
खवाबों में आ न सके, यूँ मजबूर होके..
सिमटे रहे पलकों में, सुबह का इंतज़ार करके.....रामेश्वरी

न मालूम था यूँ, गहरा वीराना होगा..
जब२ तेरी गली में आना जाना होगा....
कब्र वहीँ होगी मेरी, जहाँ फ़िदा हुए थे हम..
क्या मेरी कब्र पर तेरा नया आशियाना होगा..रामेश्वरी

Monday, August 20, 2012

तराश न मुझे इन निष्ठुर पत्थरों में...
रोना भी चाहें गर हम, फिसल जाए दामन से इसके....
ना दे आकृति बेजान सुखी रेत पर..
लिपट कर दामन,  रहना जो चाहा भी हमने..
ये हवा के झोंकों से हमें छुड़ा न सके....
खुद में बसा हमें बस अपना खुदा बना ले....
दे दे पर दो हमें, सबसे हमें जुदा बना ले...
.रामेश्वरी 

Sunday, August 19, 2012



निखरा  तभी ...
तपा है जब सोना..
तप इंसान ..
बना है जानवर ...
जंगल कहीं भला.....

धर्म न जात ...
ना शिकवा न गिला ....
भूख ही धर्म ...
जै शक्ति तिन मिला ...
रामेश्वरी 

क्या मिला उनको दोनों आँखें बंद करके ...
खवाबों में आ न सके, यूँ  मजबूर होके..
सिमटे रहे पलकों में, सुबह का इंतज़ार करके.....रामेश्वरी 

तन्हाई का संगीत




>>>>>>तन्हाई का संगीत >>>>


तन्हाई कुछ चाहती है कहना..
कुछ गुनगुनाने तो दो उसको..
कौन कहता है, अफ़सोस है तन्हाई...
ऊँची पहाड़ियों में, बस जाने दो उसको ...
शोर है दुनिया में बहुत अब..
कुछ घडी जाओ, सुनो संगीत तन्हाई का..
खुद में रच बस जाने दो उसको...
जब संग छोड़ा हो अपनों ने..
देती साथ वही, संग रह तेरे...
जिगरी यार बना लो उसको...
शोर कम करो, कुछ कम करो...
महसूस उसकी जुबां करो..
ना दूरी करो उससे तुम...
थोडा करीब आने दो उसको.......
कुछ गुनगुनाने तो दो उसको...............

Saturday, August 11, 2012

नारी जीवन

काश नारी जीवन,  मैं नारी ना होती ..
पग पग क़दमों तले मेरे आरी न होती ..
घायल हुआ जीवन मेरा..
होती उड़ान मन चाही मेरी, 
मन में दबी चिंगारी न होती..
बन चुकी है वो आग अब..
सुलगाई रसोई सदा जब..
अब इस अग्नि से खुद को तराश ..
स्वर्ण आभा दूं..

क्यूँ चढ़ूँ सदैव मैं ही..
देवता के शीश..
देवदासी बन..
इश्वर दरस कभी पाया नहीं..
आड़ इश्वर की ले..
सदैव पुरुष नज़र आया हर कहीं...
कभी बना सामान, मन सम्मान का मुझे..
वेश्यालयों में सजाया कभी..
कीचड है दलदल है वहां..
कमल है जीवन मेरा..
उदर संतान का भर पाया तभी..
ना डरी न डरूँगी कभी 
बना इसी अग्नि को इंधन ..
अपनी उड़ान खुद भरूँगी...रामेश्वरी 


































यूँ ही व्यर्थ बहे जा रहे थे आंसू..
समेटा, बना दिया बादल इन्हें..

बरसों से उझडा आशियाना...
सूखे हैं खेत खलियान ..
बरसूँ, वो हरा जो जाए..
गए मुसाफिर को मालूम हो जाए..
खड़ा है ये खंडहर ..
हरा होना चाहता है आज भी ये..
बस अपनों के इंतज़ार में...

चाहती हूँ..
अब गिरे जो, बरसे किसी प्यासे के हलक पर...
या गिरे किसी थके हारे किसान की पलक पर....
धनवानों का क्या है..
वो कब नमकीन पसीना बहाते हैं..
वो तो बारिश नोटों की कर ..
नोटों में नहाते हैं..रामेश्वरी