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Thursday, October 17, 2013

यूँ तो हर फूल खुशबू ही समेटे है । 
पर कुछ फूलों ने जैसे यादें समेट लीं ॥ 

यूँ तो कुछ पर्वत भीतर आग समेटे हैं । 
पर कुछ पर्वतों ने शीतल स्वेत चादर लपेट लीं । 

कुछ अज्ञानियों ने,  पढ़ा कुछ नहीं,  पोथी रटें हैं ।
"कबीर" ज्ञानी पंडित भया वही, जोउन ढाई आखर रट लीं ।  रामेश्वरी 

Tuesday, October 15, 2013

भागीरथ बना, बैठा है कौन ?




लहराती,
इठलाती,
धरा सहलाती,
मधुर गान गुनगुनाती,
मैं सुघोषा,
फिर !
दे रहा कौन,
आज ये मौन ?

ढोती पापी,
धोये पाप । 
आज यही संताप 
सदियों रही वही मैं । 
स्वयंभू भागीरथ बना,
बैठा है कौन ?  रामेश्वरी 

(गंगा माँ का इतना रौद्र रूप देखने के बाद भी क्या उत्तराखंड की सरकार ने कुछ भी सबक नहीं लिया ।  इतनी भारी मात्रा मैं जान माल की हानि हुई,  फिर भी इन सब के बावजूद हर की पौड़ी तक जल स्तर बहुत कम कर दिया गया है ॥  अगले वर्ष कहीं माँ का रौद्र रूप इससे भयावह ना हो ?  प्रकृति से छेड़छाड़ बुरी है क्यूँ अहंकार पाल रहा है इंसान ।)रामेश्वरी 

Saturday, October 12, 2013

रावण क्यूँ परेशान ?




रावण क्यूँ परेशान ?

हैरान है रावण . 
दुनिया की कार्यवाही से। .  
खुद कलयुगी रावण। . 
फूँक रहे.  .
मुझे! 
कितनी वाह वाही से। . 

तुलना करूँ,  कभी जो.. 
कृत्यों की.. 
न्याय चाहूँ मैं ?
दुशासन स्वछंद फिरे . . . 
क्यूँ युगों अग्नि समाऊँ मैं ?
अब शायद प्रकृति भी। . 
गवाह रहेगी मेरी 
अब ना अग्नि समाऊँ मैं ?
सम्मान दिया राम ने। . 
तुमसे मुखाग्नि ना चाहूँ मैं ?

स्तब्ध हूँ। . 
न्यायिक कार्यवाई से ॥ रामेश्वरी। 


(संस्मरण )


बचपन मैं जो उत्साह रामलीला देखने को हमारी दिलों में होता था वो शायद अब की पीढ़ी के बच्चों में नहीं दिखाई देता ।   मुझे आज भी अपने मोहल्ले की रामलीला के सभी लोग अच्छे से याद हैं जो भिन्न भिन्न पात्र निभाया करते थे ।   एक दो बार मैंने खुद भी रामलीला  की शुभारंभ आरतीयों में हिस्सा लिया था ।   हमारे मोहल्ले में  रावण का पात्र निभाने वाले युवक जो की मेरे बड़े भाई के मित्र भी थे, मोहल्ले में बहुत लोकप्रिय थे ।  जब भी वह गली मोहल्ले से गुजरते,  हम सभी बच्चे यकायक ख़ुशी से कह उठते" देखो रावन जा रहा है " ।   उस दौर में वह हमारे लिए जैसे एक बड़ी फ़िल्मी हस्ती जैसे थे ।   वह बहुत ही सभ्य इंसान थे ।   

बात उन दिनों की है जब कंप्यूटर युग शुरू ही हुआ था और सभी टाइपिंग सीखा करते थे ।   हमारी क्लास में एक युवक था, जो की बहुत ही हसमुख और शरारती था ।   लड़कियों से फ़्लर्ट करना जैसे उसकी आदत थी ।  मैं सांवली रंगत की थी सो मेरे से उसका व्यवहार सिर्फ दोस्त वाला था ।  एक दिन अचानक सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी और संयोगवश दरवाजा खोलना भी मुझे ही पड़ा ।   सामने जिस शख्स को देखा तो हैरान ।   वहां कोई और नहीं वही युवक था जो मेरे साथ टाइपिंग सीखा करता था ।   मुझे देखते ही वो  बिल्डिंग से नीचे उतर गया ।  संयोग वह मेरे बडे भाई साहब से रामलीला के बारे में जानकारी हेतु आया था ।   मैंने अपने भाई साहब से पुछा तो उनसे मालूम हुआ की यह वही युवक था जो राम का पात्र निभाता आया है ।   मैं उस युवक को राम के पात्र में कभी पहचान नहीं पायी,  क्यूंकि उस समय वह भारी भरकम मेक-उप में हुआ करता था ।   आज भी मैं इस बात पर हँस देती हूँ कि  यह भी अजब संयोग रहा की राम जैसा सभ्य इंसान रावण पात्र निभाता आया था ।   और कुछ कुछ रावण जैसा युवक राम का पात्र निभाता आया था ।   वो भी सिर्फ चेहरे मोहरे के कारण ।    क्या चेहरा इतना मायेने रखता है ?   रामेश्वरी 

Thursday, October 10, 2013

ना मस्जिद गिरी 
ना मंदिर गिरा
गिरा तो बस इंसान
जानवर की नज़र से गिरा। ।



पिछले वर्ष मैं सपरिवार चिड़ियाघर की सैर को गयी थी । वहां भिन्न भिन्न जंतुओं को देख मन बहुत प्रसन्न सा था । पर उनकी क़ैद भरी ज़िन्दगी मन को चुभ रही थी । आप शायद हँसेंगे पर उनकी जगह खुद को खूंटी से बंधा महसूस करने पर उनकी पीड़ा का सही सही आंकलन हुआ ॥ वहीँ करीब में, एक बाडे में एक गोरिल्ला भी बैठा हुआ था जो की बच्चों के लिए मुख्य आकर्षण था । बच्चों का शोर, युवाओं की सीटियों की आवाजें, लोगो का उसे पुकारना जैसे उसे रास नहीं आ रहा था । वह सभी की ओर पीठ किये बैठा रहा । मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो नाराज़ सा था, इंसानों की इस हरकत से कि उन्होंने उसकी आजादी छीन ली । हमने इतनी भाग दौड़ कर क्या पा लिया जो जानवरों के पास नहीं । जानवर हमसे कहीं बेहतर हैं । रामेश्वरी।।।
खुद से गुम इस कदर रहता हूँ, कि गुमशुदगी दर्ज करवाने कोतवाली गया था । 
पहचान ढूँढते कैसे वो मेरी,  पहचान को अपनी हाथों में लिए आएना गया था ।। रामेश्वरी 

Friday, August 30, 2013

कागज़, कलम, किताब, स्लेट, श्यामपट, कक्षा, स्कूल, विश्वविद्यालय, छड़ी, गुरु....... 


मौनी कागज़। 
कलम इंकलाबी। 
मिटा अज्ञान। 


गुरु निष्काम। 
श्यामपट है श्याम।
भोर शारदे ?

हे कलजुगी। 
शिष्या ब्याह रचाए । 
पद भ्रष्ट हैं । 

मूल्य नष्ट हैं ।  
वाग्देवी लज्जाये हैं । 
रिक्त कक्षाएं। 

छड़ी अड़ी  है । 
परीक्षा की घड़ी है । 
हे जड़मति !

खुली किताब । 
निगाह चहुँ ओर  । 
दूर है भोंर ।  रामेश्वरी। ३०/८/१३ 

मैं हूँ अज्ञानी  । 
विद्या बहता पानी । 
रोके ना बंधे । रामेश्वरी। ३०/८/१३ 

Sunday, August 18, 2013


कैसी आबो हवा है आजकल। 
हर शख्श झूठी मुस्कान लिए नज़र आता है। 

बादल भी अब रुठते नहीं। 
हर रोज भीगा मंज़र नज़र आता है। 

दरो  दीवारों में ख़ामोशी पसरी।
हर रिश्ता रेत सा नज़र आता है। 

पहले इंतज़ार था उसका,  खिड़की तले। 
अब वहां सिसकता  लहू नज़र आता है। . 

कण कण संगीत था , प्रकृति जहाँ। 
वहां शमशान का सन्नाटा नज़र आता है। 

ख़ुशी के आंसुओं में "रामी" वो नशा कहाँ। 
मेरी गली में हर शख्श गम पीता नज़र आता है। 

विशाल अनंत थी, सीमायें देश की मेरी। 
हर गली क़स्बा,  नया देश नज़र आता है। 

समय ठहर सा गया,  अपनों के लिए वक़्त नहीं। 
इंसा हर ओर  पंख लिए उड़ता नज़र आता है। 
(रामेश्वरी)

Friday, August 2, 2013

तेरी चाहत में अब ये दिल बरहम ना होगा   । 
हर सुर्ख,  सोज़ ए सामां,  नादां तेरे घावों का मरहम न होगा। . रामेश्वरी 

Monday, July 29, 2013

मैं चंपा

मैं चंपा,  
रूप यौवन भरी,  
ह्रदय उदास । 
बीते मौसम ।
बिन भँवरे कैसा मधुमास । 


हर मौसम । 
खिलते पुष्प हज़ार । 
अटरिया कांटो भरी । 
प्रेम कहीं खिलता नहीं । 
घर घर नफरत का वास । 
ये कैसा बनवास … 

हर मुस्लिम ईद करे । 
हर दिवाली सजे बाज़ार । 
जिसमें सबका मन मिले ।  
जन जन को ऐसे पर्व की आस । 


चिरैया तू लुप्त कहाँ । 
कोउन देश, कोउन धर्म  तेरा । 
नहीं अब डेरा तेरा । 
उगा ली घास मैंने । 
जिससे घौसला तेरा हरा मिले 
लोहे की छड़ रोके बैठा स्वास 
बस तेरे लौटने की आस … रामेश्वरी 


Thursday, July 25, 2013

फेस बुक पे आजकल कुछ हिन्दू मुस्लिम ज्यादा हो रहा है, सभ्यता गुम होती जान पड़ती हैं 
इस पर मैंने कुछ लिखा हैं,…. ठीक लगे तो बताना 

अब कुछ असाधारण करने की जरूरत नहीं , 
इतना बहुत है कहदो दिल में नफरत नहीं 

मेरे हिन्दुस्तान के , मेरे वतन के मेरे अजीजों, 
खुद के कहर से ये देश न ख़त्म हो जाए कहीं 

जो नफ़रत का पाठ पढाये वो धर्म नहीं हैं,
क्या नुक्सान है जिस किताब में वो पाठ नहीं है

जन्मे है , पले है , पढ़े हैं बढे हैं इसी धरती पे
क्या मै और तुम इस मिटटी के कर्जदार नहीं हैं ,

एक मुसलमान गर गीता को इज्ज़त बक्शे ,
और हिन्दू कुरान की आयतों को समझे ,

मै सही औत तू गलत पे हो जाएँ कत्ले -आम
मेरे मुल्क इतना भी तंगदिल नहीं हैं.

जो रखते है कुछ मौलवी और संतो की फ़िक्र
उनके जेहन में सिवा सियासत के कुछ नहीं है ,

मेरी बेटी की शादी में एक मुसल्मान था हलवाई,
मैंने हर रोज नमाज एक ब्राह्मण की छत पे पढ़ी हैं



Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)

Thursday, July 18, 2013

ख़त के पन्नों में

ख़त के पन्नों में, दफ़न फूल, दिखेगा तुम्हें ...
छिपी महक मेरी, बस इत्र समझ तुम लगा लेना ....


जिनमे जिक्र नहीं तेरा, शब्द वो दिखेंगे तुम्हें ..
मेरे मूक गुमशुदा शब्दों की तुम आवाज़ सुन लेना ....


लफ़्ज़ों की माला पिरो लाया हूँ मैं,  ब्याहने तुम्हें ..
हो जब फेरे अग्नि के,  प्रेम अग्नि तुम जला लेना ...रामेश्वरी
फिर अफरातफरी करे लंगूर ..
ना जाने कलयुगी रावण कितनी दूर ....रामेश्वरी 


जब तक बच्चियों को जान गंवानी है। 
स्वत्रंत्रता प्रतीक तिरंगा बेमानी है ......



रातरानी हूँ,  
महकती,  तेरी क्यारी हूँ ..
पहली पहर वजूद मेरा ..
इंतज़ार दोपहर तेरा ...
मिलन हो कैसे ?






लताबद्ध हूँ,
कोमल देह ..
पाने झलक तेरी ..
लाख जतन कर ..
तेरे झरोखे चढ़ी हूँ ..
महकता मदिरालय मेरा ..
निन्द्रा नशा तेरा ..
अब तुझे जगाऊँ कैसे ?



रामेश्वरी 

Saturday, June 15, 2013

इतिहास वृक्ष से, वर्तमान का फल।।
जैसा सिंचोगे, पाओगे वैसा ही कल ॥ शुप्रभात सभी मित्रगणों को। कैसे हैं आप सभी ...
हमेशा सूनी नहीं थी गोद मेरी ..
मेरे आँगन भी बचपन पलता था ..
रसोई के चूल्हे के लहराते धुएं से ..
सुबह रेशमी किरणे, छूती थी आँचल मेरा ..
शाम ढले, अँधेरा मेरा, कोना टटोलता था ..
गिरती थी बूँदें ..
कलशे से पनहारियों के..
सीना मेरा जब जब उमस भर खौलता था ..
रंभाती थी गौ माता कभी, आँगन मेरे ..
नन्हा बाछी, मेरे सीने पर दौड़ता था ..
था सीना, कभी वजूद से मज़बूत इतना ....
दिन ढले तक, आने जाने वालों का ..
वज़न झेलता था ..
सोचती हूँ, क्या शहरी बहुमंज़िलों का सीना ..
ये वज़न झेलता होगा ?
आजा बेटा ....अब तो ..
आँचल मेरे घांस उग आई ..
बस अब ढ़हने को हूँ ..
याद तेरी फांस बन आई है।
(रामेश्वरी) मेरा जनम पालन पोषण उत्तराखंड में नहीं हुआ ..फिर भी मुझे वहां की खुद सी उठती है…. जिन लोगो ने वहां जनम लिया पले बडे अक्सर उन्हें शहर आकर उस मिटटी को भुलाते देखा है…लोग कैसे अपनी जन्मभूमि भूल जाते है ....मुझे अपनी जन्मभूमि और पैतृक भूमि दोनों से समान रूप से लगाव है….
हर मोड़ पर
नयी राह हो
संभव नहीं ..
हर नयी राह ..
मोड़ लिए हो
ये ज़रूरी है…. रामेश्वरी
ना मांगो आकाश उनसे ..
जिनके पास सिर्फ कुछ कतरे धुंध के हैं .....रामेश्वरी
ज़िन्दगी मुस्कराहट देगी, नींद से स्वार्थ की जागो, ज़रा सोने वालों । 
स्वार्थी नींद में अदावत ए ज़लज़ला सोने नहीं देता, लाख नर्म बिस्तर लगा लो…। रामेश्वरी
कहीं बजी घंटियाँ ..
कहीं राग छेड़ रहा संतूर है ...
हाय ये इश्क ..
ख़ुदा ! खुद में इक फ़ितूर है । 
जो कर बैठा ..
वो बाँवरा, खुद से मीलों दूर है । रामेश्वरी
चटक धूप में कैसे वो, खुद पर आवरण ओड़ लेता है । 
दिन के तीसरे पहर, वो कैसे बचपन निचोड़ लेता है ॥ रामेश्वरी .......

बच्चे देश का भविष्य हैं यदि उनके साथ अपहरण, बलात्कार जैसी घटनाएं होंगी तो सोचिये देश का भविष्य क्या होगा ?
चन्दन भयो अंग२ ..
तुम भवो भुजंग ..
संग हमारा यूँ भये ..
ज्यूँ कस्तूरी मृग संग ...
खोजे से भी, मिलूँ ना मैं ..
समाऊँ ज्यूँ इन्द्रधनुष में सात रंग ..
तुम तीर शाँत रहो ..
मैं इठलाती दरिया सी ..
यूँ अल्हड सा मेरा बहने का ढंग ..
रामेश्वरी ..

इन शब्दों को कोई मित्र अन्यथा ना लें ...बहुत दुःख होता है जब कोई इन्हें मजाक में लेता है…. अपनी भाषा का यूँ अपमान मंजूर नहीं ..नमस्कार ..
यकीं कर ..
मेरे ही आंसुओं से भरा ये सागर ...
मुझे और गम में ..
डूबोने की ज़हमत ना कर…. रामेश्वरी
जिसमे स्त्री के पंखो को उड़ान नहीं ..
वो कौन कहता है आसमान है ..
मुट्ठी भर धुँध लगा मुझे 
ऐसे आसमान की मैं मोहताज नहीं .....रामेश्वरी 
मेहनत का नमक घुला लहू में हमारे ...
चापलूसों का असर है, जो मिठास खोलते हैं ...रामेश्वरी
साँसों के उतार चड़ाव को यदि जिंदा होना कहते हैं । 
कब्रगाह में उन बूंदों का क्या कहें, जहाँ शाहजहाँ सोये हैं ॥ रामेश्वरी
लोग साँसों को जगा कर जीते हैं
हम साँसों को दबा कर जी गए ...
आज सिर्फ तन जा रहा कफ़न ओढ़ कर ..
हम तो माँ बनते ही खुद को पी गए .......रामेश्वरी




लोग साँसों को जगा कर जीते हैं
हम साँसों को दबा कर जी गए ...
धुंआ लहरा कर पीता हर शख्श ...
हम कमबख्त धुंआ दबा कर पी गए ....रामेश्वरी
बहता पानी अक्श दिखाता नहीं । 
अक्श देखने को ठहराव ज़रूरी है दोस्तों ॥ रामेश्वरी 
गिद्ध, कौवे , नदारद हो रहे अब… 
इस कदर इंसानियत को नोंच खाया हमने ...॥ रामेश्वरी ..शुप्रभात ..
हम बहते निरंतर, जाने अनजाने किनारे टूट जाते हैं । 
वजूद वही हमारा, बस बहने के दायरे बदल जाते हैं । रामेश्वरी ..

हायकू

कुछ हायकू लिखने की कोशिश मात्र ..यदि कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें और मेरा मार्गदर्शन भी करें । 


जीवन शोर । 
जे मृत्यु मौन धरे ॥ 
कर्म ही यात्रा ॥ 

युद्ध सफ़र ॥ 
राही रंजिश धरे ॥ 
अंत एकाकी ॥। 

कहीं थे शाखी।
कहीं बंज़र ज़मीं ..
नहीं यात्रा थमी ॥। 

मौन है पथ ..
है सफ़र अधिक ..
चल पथिक ..रामेश्वरी

Saturday, May 18, 2013

तू गरीबी ।




क्यूँ तुझे सेठ की ..
दहलीज न भाती है । 
एक अरसे से तू गरीबी । 
गरीब का सब्र आजमाती है । 
देख ..
सेठ की दहलीज पर ..
कितना सोना जड़ा है ..
देख ..
आज फिर सिर्फ ..
तेरी वज़ह से ..
किसी बच्ची को भूखा।।
मिटटी पर सोना पड़ा है ...
(रामेश्वरी)
ज़िन्दगी मुस्कराहट देगी, नींद से स्वार्थ की जागो, ज़रा सोने वालों । 
स्वार्थी नींद में अदावत ए ज़लज़ला सोने नहीं देता, लाख नर्म बिस्तर लगा लो…। रामेश्वरी
वो कुछ ऐसे गरज कर, गुजरे आँगन से मेरे । 
निगाह धुंधली हैं, पड़ा नैनो में सावन तब से ॥ रामेश्वरी






दर्द में बहे ये आंसू, मोहब्बत में बहे ये आंसू । 
फर्क इतना जितना जाम में पानी, और समंदर में पानी ...रामेश्वरी







दफन कर दो मेरे अरमां, संग मेरे, मेरी कब्रगाह में । 
ये मचलेंगे, दुनिया कुरेदेगी कब्र मेरी, जिंदा समझ कर ॥ रामेश्वरी

Tuesday, May 14, 2013





बेशकीमती हैं अश्क तेरे,  मेरे जीने के लिए । 
सागर क्या ओहदा बड़ा पायेगा कभी, इन्हें पीने के लिए ॥   रामेश्वरी ..

Saturday, May 11, 2013

इन सर्द धुंधली राहो में ..
देखो कैसे ये वृक्ष तने से हैं ..
झड चुके हैं पात, शाखों से इनकी ..
उग रहे ख्वाब, कोमल टहनियों में ...
आएगा सावन फिर से .
पड़ेंगी बूँदें, प्यासी धरा पर ..
उड़ेगी मृत्तिका श्वास फिर से ..
लिए मंद मंद खुशबू मटैली ..
फिर नाचेगी, प्रकृति फैला छटा नखरेली ..

मिट रहे शाख, राहों से फिर बंट जायेंगे ..
सब्र करना सीखो मानुष, मुफलिसी के दिन भी ..
बदलते मौसम से कट जायेंगे ..
धुंध से आगे भी जीवन है ..
ना इसको ठहराव कहो ..
समय की अविरल धारा .
सदैव संग बहो ......रामेश्वरी

सर्द दिन, सन्नाटा गहन पसरा है । 
चल पथिक, पथ कितना संकरा है । 
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है । 
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है । 
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है । 
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...रामेश्वरी





मैंने जनम लिया ।  
वो स्त्री से माँ हो गयी ॥ 

मैंने पग धरे, धरा पर । 
वो मेरी नींव का, सामान हो गयी । 

प्रथम शब्द, माँ से लिया । 
वो माँ से, गुरु हो गयी 
यूँ प्रथम शिक्षा शुरू हो गयी । 

मैं यौवन की प्रथम सीढ़ी पर ...
माँ आखिरी सीढ़ी,  खड़ी हो गयी । 

आज भी वो देख बैचेनी मेरी ..
सोती नहीं । 
मैं बूढ़ा अब हो चूका हूँ । 
माँ फ़र्ज़ से बूढ़ी होती नहीं । 

दवा देने से पहले आज भी । 
माँ ......मुख में दाना धरती नहीं । 
माँ ....कभी मरती नहीं । 

अब माँ नहीं है दुनिया में । 
छवि उनकी अब देखूं मुनिया में । 
बिटिया भी मन से माँ जैसी होती है । 
अब वो दवा देकर सोती है ..रामेश्वरी 


Thursday, May 9, 2013

जमुरियती सरकार



सुनो सुनो जमूरों !
ये जमुरियती सरकार है । 

मिटने वाले मिटे वतन पर । 
इन्हें गद्दियों से प्यार है । 
सुनो सुनो जमूरों !
ये जीव शाकाहार हैं । 
चारा निगलें क्षण भर में । 
कहाँ लेते डकार हैं । 
ये कुदरत का अनोखा आविष्कार है । 

सुनो सुनो !
महंगाई की डोर खींच।।
तमाशा हमारा देखते हैं ..
तपन से भूख की हमारी ..
अपनी राजनितिक रोटियाँ सेंकते हैं । 
ये सूरते निराकार हैं । 
जमूरों की भरमार है। 
ये ज़मुरियती सरकार है । 

ना अब हिंदी ना हिन्द की बातें हैं । 
फैला रहे, समाज में  मज़हबी बातें हैं । 
झूठ बोल रहा, सच को पड़ी लातें हैं । 
निगल रहे सभ्य समाज ये तो । 
ये तो दैत्याकार हैं । 
ये जमुरियती सरकार हैं ।  रामेश्वरी 

Monday, April 29, 2013

हिंदी फ़िल्में, 
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया, जी हाँ, ये एक हिंदी फिल्म का गाना है , जो मुझ नाचीज़ पर फिट बैठता है। हिंदी फिल्मो में सब कुछ है या यूँ कहूं तो जीवन जीने की कला हिंदी फ़िल्में बेहतर सिखाती है। मेरे एक दोस्त को तो इतना फोबिया हुआ की वो निरूपा राय को ही अपनी माँ मानता था और असली माँ को ललिता पंवार। एक दोस्त तो खाते पीते , सोते उठते बस कुछ रटे -२ डायलॉग ही बोलता रहता था मसलन " हम जहाँ खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीँ से शुरू होती है , हांय !" या " जली को आग कहते हैं बुझी को राख कहते हैं ...जिस आग से बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं।" ये फ़िल्मी डायलाग भी पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहते हैं, एक बुजुर्ग से पूछ लिया कोई हिंदी फिल्म का डायलाग सुनाओ तो मुगले आजम सुनाने को झटपट तैयार हो गये लो जी " हमारा हिन्दुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं एक लोंडी जिसकी मलिका बने ..तो सलीम कहता है "मेरा दिल भी कोई कोई आपका हिन्दुस्तान नहीं जिस पर आप हुकूमत करें।" अब मुझे समझ आया बीज तो इन बुड्ढों के जमाने में ही बोये गए थे। अगर आज सलमान खान गाता है की " इश्क के नाम पर करते सब रास लीला है , मै करूं तो साला करैक्टर ढीला है" तो हरगिज़ नाइंसाफी नहीं। तो मेरे कोरे जीवन की बातें हो रहीं थी , कोरा यूँ की हिंदी फिल्मे ज्यादा नहीं देख पाया , गुरु जी पूछते कितने दंड पेले , कितनी बैठक लगाईं, कितने रस्से चढ़ लिए , तो जवाब मिलता ३ हज़ार दंड, २ हज़ार बैठक और तीस बार रस्सा चढ़ लिया तो गालियाँ पड़ती , नालायक तेरे से कुछ न बन पड़ेगा , इधर और ज्यादा करने के चक्कर में शाम ६ बजे तक चित्त होकर खाट पकडनी पड़ती। कहाँ से देखते आखिर ज्ञान की धारा तो प्राइम टाइम या उसके बाद ही बहती है। और पहलवानी में ब्रह्मचारी होना लाजमी है , सो भय इतना की हर लड़की में बहन ही दीखती , हाँ अगर हिंदी फ़िल्में देखते तो सुबह-२ बालों में कंघा लगा कर मोटर साईकिल लेकर किसी लड़की के घर के नीचे न खड़े हुए होते ? दोस्तों से उधर मांगते या माँ बाप से किसी न किसी बहाने रूपये मांग कर उनका मोबाइल बिल भरते। अपनी किस्मत में ऐसा कुछ न रहा। दिन भर पार्कों में आजकल बच्चे क्या क्या शिक्षाप्रद बातें करते हैं हमसे न हो सकी , क्योंकि जो सुबह चार बजे पार्क में पसीना बहा कर सात बजे लौट आये वो दिन में वहां फिर क्या करने जाएगा अंदाजा न था , हिंदी फिल्मों की शिक्षा ग्रहण करता तो पता चलता। खैर इधर अपने पडोसी की लड़की बड़ी हिंदी फिल्मे देखा करती , मां बाप उसके और पडोसी लड़के के बीच उन्हें विलन नज़र आने लगे , अब उनके मोबाइलओ में शिक्षाप्रद गाने बजा करते "मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए " या फिर "भीगे होंठ तेरे .." और भी न जाने क्या क्या ? ज्ञान अंतहीन है , उसका संग्रह और दर्शन आपके जीवन की दिशा निर्धारित करता है। आपके चारों और का वातावरण आपको प्रेरणा देता है , इधर फ़िल्मी हेरोइन हीरो के साथ भागी नहीं की पडोसी की लड़की ने भी बैग बाँधा और पडोसी के लड़के के साथ भाग खड़ी हुई, समस्या हमारी , ढूंढें हम। और पकडे जाने पर हमारी किरकरी। क्या आपने कभी प्यार किया है ? सवाल हुआ ; आपको क्या मालूम माँ बाप हमें प्यार नहीं करते , फलां लड़का प्यार करता है , कोर्ट मैरिज कर चुके हैं क़ानून हमारे साथ हैं इत्यादि -२। भाई शादी तो हम भी कर चुके मैंने उनसे कहा। मां बाप ने लड़की ढूंढी , और ये लो जी घोड़े पर बैठे और डोली ले आये ,पर क्या मजा आया महीनों दिल्ली भर के पार्कों की शोभा तो न बढ़ा पाए । इनकी शिक्षा प्रद कहानी सुनकर आज घरवाली से कहने को जी हुआ सुनो जी कल बस स्टैंड पर सज धज कर आ जाना ,में भी बालों में कंघी लगा कर जींस पहन कर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा किसी पार्क में बैठेंगे , एक फिल्म देखेंगे , और फिर आइसक्रीम खायेंगे , तो महारानी बोली पगला गए हो , बच्चे कहाँ रहेंगे ? पार्क में बाते क्या करेंगे, मैंने तो बता ही दिया है की परसों मायके जाना है साडी और सूट तो मैं ले ही आई हूँ , सिलाई देनी है तो यहीं देदों और हाँ अकेले ही खाओगे मम्मी पापा को पता चलेगा तो क्या कहेंगे ? वगैरा -२; सुनकर जवाब न बना , अपना तो वक्त ही चला गया , हिंदी फ़िल्में देखि होती तो ये अनुभव भी हुआ होता मां बाप से शहजादा सलीम बनकर बहस बाजी करते। खैर अब इधर कुछ अरसा पडोसी की बेटी की शादी हुए गुजरा तो मालूम पड़ा हिंदी फिल्मों मे शादी के बाद की कहानी ही नहीं होती , हिंदी फिल्मों का ज्ञान-दर्शन तो बस शादी पर ही ख़तम हो जाता हे , लड़के ने जो टाइम हिंदी फिल्मों की प्रेरणा स्वरुप लडकी की खिड़की के नीचे लगाया उसका परिणाम ये हुआ की कमाई के लाले पड़ गये , घर तो पहले ही छोड़ना पड़ा था किराए के छोटे मकान में ठीक से गुजर बसर न हो रही थी , सो लड़की मेरे पास आई कहती इन्हें नौकरी लगा दो मैंने जानबूझ कर पुछा क्या कर लेता है , हालांकि मुझे तो पता ही था। किसी तरह एक कम्पनी में चपरासी लगाया तो रोजी रोटी चली , उन्हें याद कर रहा हूँ , इधर कोई आशिक रेडिओ पर गाने सुन रहा है ... मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में ...इधर मुझे भी समझ आ रहा है। ठीक रहे गुरु जी के डंडे और झिडकियां खाई सो खाई बच्चे चैन से सो रहे हैं

Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)

मैं मांगता हूँ ।

मैं हर फ़िज़ूल कानून का उल्लंघन मांगता हूँ । 

मैं अपने देश, चैन ओ अमन मांगता हूँ ॥ 

हर फूल मुस्कुराएँ जहाँ,  वो चमन मांगता हूँ ॥ 

हर रोंदने वाले पैरों का, मैं दमन मांगता हूँ ॥ 

हर फूल बचा लूं,  मैं दोनों हाथ लोहे के कंगन मांगता हूँ ॥ रामेश्वरी 
सौम्य, पावन  हृदया तू ....
पुरुष जीवन का मान सम्मान तू ..
कोमल तन ..
कोमल मन सही ..
यम से हर ले प्राण तू।
उज्जवल रूप रंग ..
हाड मॉस का लोथड़ा भर नहीं तू ..
क्यूँ वहशी गिद्ध निगाह गाड़े खड़े ?.
लज्जा रहती है जिन नैनो में ..
उन नैनो मैं तेज़ाब भर तू ...
अब दौर नहीं घूंघट का ..
छोड़ दामन पनघट का ..
नीर बहुत बहा चुकी तू ..
कल्पना का आकाश, राह ताके तेरी ..
उन्मुक्त, स्वछंद उड़ान भर तू ...
बहेलिये खड़े जो, गर राह हो तेरी ..
जो समझे ना तेरी ह्रदय पीर ..
लोह भर ह्रदय,  हाथों में उठा शमशीर ..
जीवन रणभूमि मान तू ..
अपनों में, गैरों में ..
दुश्मन को पहचान तू ....
(रामेश्वरी)








 



कहीं बजी घंटियाँ ..
कहीं राग छेड़ रहा संतूर है ...
हाय ये इश्क ..
ख़ुदा !  खुद में इक फ़ितूर है । 
जो कर बैठा ..
वो बाँवरा, खुद से मीलों दूर है । रामेश्वरी 
 ये आईना गर्द हटा कर निहारना जानता है । 
कैसे कहोगे, खूबसूरत हो तुम ?.................