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Friday, August 30, 2013

कागज़, कलम, किताब, स्लेट, श्यामपट, कक्षा, स्कूल, विश्वविद्यालय, छड़ी, गुरु....... 


मौनी कागज़। 
कलम इंकलाबी। 
मिटा अज्ञान। 


गुरु निष्काम। 
श्यामपट है श्याम।
भोर शारदे ?

हे कलजुगी। 
शिष्या ब्याह रचाए । 
पद भ्रष्ट हैं । 

मूल्य नष्ट हैं ।  
वाग्देवी लज्जाये हैं । 
रिक्त कक्षाएं। 

छड़ी अड़ी  है । 
परीक्षा की घड़ी है । 
हे जड़मति !

खुली किताब । 
निगाह चहुँ ओर  । 
दूर है भोंर ।  रामेश्वरी। ३०/८/१३ 

मैं हूँ अज्ञानी  । 
विद्या बहता पानी । 
रोके ना बंधे । रामेश्वरी। ३०/८/१३ 

Sunday, August 18, 2013


कैसी आबो हवा है आजकल। 
हर शख्श झूठी मुस्कान लिए नज़र आता है। 

बादल भी अब रुठते नहीं। 
हर रोज भीगा मंज़र नज़र आता है। 

दरो  दीवारों में ख़ामोशी पसरी।
हर रिश्ता रेत सा नज़र आता है। 

पहले इंतज़ार था उसका,  खिड़की तले। 
अब वहां सिसकता  लहू नज़र आता है। . 

कण कण संगीत था , प्रकृति जहाँ। 
वहां शमशान का सन्नाटा नज़र आता है। 

ख़ुशी के आंसुओं में "रामी" वो नशा कहाँ। 
मेरी गली में हर शख्श गम पीता नज़र आता है। 

विशाल अनंत थी, सीमायें देश की मेरी। 
हर गली क़स्बा,  नया देश नज़र आता है। 

समय ठहर सा गया,  अपनों के लिए वक़्त नहीं। 
इंसा हर ओर  पंख लिए उड़ता नज़र आता है। 
(रामेश्वरी)

Friday, August 2, 2013

तेरी चाहत में अब ये दिल बरहम ना होगा   । 
हर सुर्ख,  सोज़ ए सामां,  नादां तेरे घावों का मरहम न होगा। . रामेश्वरी