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Tuesday, July 14, 2015

हे अतिथि ! ना खोजो । ना खोजो, मेरा गांव ॥

फिर छत की मुंडेर 
काक करें है कांव । 
इस कलयुग दौर में 
ना खोजो मेरा गांव ॥ 

ना  गंगा इतनी 
पावन रही । 
ना सागर में ठहराव । 
काठ भी फफूंद रखे 
देख अपना चाव । 
 देख महंगाई
काँप रही  
मेरी टूटी नाव । 
हे अतिथि !
ना खोजो  । 
ना खोजो,  मेरा गांव ॥ (रामेश्वरी )