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Wednesday, February 29, 2012

लौट चल, आँगन अपने ..


चल नादाँ अभी वक़्त है लौट चल, आँगन अपने ..
उस माँ की गोद में, जो दे रही पुकार कब से तुझे..
जिसके अंग अंग में, मातृत्व स्नेह झरना कलकल बहे..
सुना उसका आंगन बिन तेरे, मृत्तिका उससे अब झडे..
पत्थर सीने में उसके पड़े, घायल उसका ह्रदय फ़ूट२ रोये ..
क्यों मेरी संतान, चंद सिक्कों का लोभ, मुझ से दूर होए..
वो बिन तेरे गुमसुम सी है, नदिया(गंगा) नैनो से बहे ..
बिन कलकल किये, दरिया पर भी संतानों ने बाँध पिरोये...
अब यह माँ किस आंगन जाये, किस किस के आगे रोये..
दूध(सुख रहे नदी नाले) अब सीने से उसके उतरता नहीं..
सोच में पड़ी वो, क्यूँ दूध उसका अब दूध नहीं पानी सा होए ..
संतान उसकी दूर उससे, गैर अब सीने से लग उसके हैं सोये ....



चल



बैठ गुलमोहर तले, सर रख सिरहाने तेरे, चल प्रेम बतियां बतियाएं हम..
मिलन का हमारे दुश्मन ये जहां है, चल क्षितिज तक टहल कर आये हम...
प्रेम क्षुधा बंजर सूखी पड़ी, कर प्रेम वर्षा, प्रेम उपवन हरा भरा कर आये हम.....
प्रेम के रंग अनगिनत, चलो उस छोर से इस छोर इक इन्द्रधनुष रचाएं हम.....

(रामेश्वरी )

सुनो प्रिये


सुनो प्रिये, मेरे संगीत की बस तू ही झंकार है
तुम हो तो, पतझड़ में भी मेरे लिए बहार है..

चाह किसे हो सज्जा की, तू ही मेरा पूरण श्रृंगार है ...
पूर्वा में सुगंध तेरी, लज्जाते चाँद में तेरा ही आकार है ..

रति से खूबसूरत तुम, यही मेरी कामदेव से टकरार है ...........
नैन कुछ देखते नहीं, ज्यूँ तेरे मनमोहक रूप का इंतज़ार है ...

रामेश्वरी
दल बद्लूओं का रूप भी अजब देखिये..
बैठे संग जहाँ सेठ के, तन कितना अकड़ा है..
जहाँ बैठे भूखे संग, अंतड़ियां सूखी, ऑंखें ऐसी...
जैसे बरसों से ताका नहीं, रोटी का मुखड़ा है ...रामेश्वरी

Tuesday, February 28, 2012

कहीं न कहीं अँधेरे के पास उजाला बैठ, यही सोच रहा होता है..
क्यूँ नहीं हम दोनों साथ होते, एक का आना दुसरे का जाना होता है...............रामेश्वरी

KAFIRकाफ़िर

छाया दे गर गलत राह, मैं धूप का मुसाफिर ही सही...

पूजना पड़े पाप अधर्म को, मैं लाख काफ़िर ही सही

..............रामेश्वरी

pookar

ऐ खुदा,
मुझे खुदा बना या सबसे जुदा बना.....
देख बहता लहू किसी का, ह्रदय रोये ना ..
भावनाएं मार दे मेरी,या इसे लोहे का बना....रामेश्वरी

Monday, February 27, 2012



























 ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ऐ खुदा ..
खुदा, कुछ दिन मुझे भी खुदा बना दे..
इंसान से अलग कुछ और वजूद हो मेरा ..
इंसान नहीं मुझे कुछ और जुदा तू बना दे ...रामेश्वरी 

मन पखेरू






उड़ चल, मन पखेरू, चल उड़ा चल, चल वहां ...
आशाओं के बीज फेंके थे जहाँ पिछली बार,चल...
शायद अंकुरित हुई हो अमर बेल वहां आशाओं की ..

उड़ चल, मन विहंग, अपनी इस भारत माँ के कोने२ को...
दाना चुग चैन ओ अमन का, हर आँगन फ़ेंक आती मैं...
देखना चाहती मैं, सम्पूरण दुनिया, धरती और आकाश...
महसूस करना चाहती, हर चिड़िया के घौसले का आभाश..
समझना चाहती मैं, चहचहाती पंछियों का शोर...
देखना चाहती मैं, कहाँ है वो, जो बांधे हैं प्रकृति की डोर...
संग संग नाचना चाहूं, सावन मैं संग मोर, 
वो पंख फैलाए, मैं अपनी बिखरी लटें फैलाये ...
ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा हे ईश्वर...शायद तू  समझ जाए ...............रामेश्वरी 
चले जा रहे थे, कांधे अपने, अपना ही जनाज़ा लिए..
रुखसती पर मेरी देखो, लोग कह रहे सफ़र अच्छा है.....रामेश्वरी.............

वो पगला..

वो बैठ छत की मुंडेर ..
ताकना दुनिया को कितनी देर...
वो किसी की तकरार सारे राह में..
कोई जा रहे डाले, बांह बांह में ...
वो ताकना उस पगले को...
रोज करता जो जमा कूड़े का ढेर ...
साफ़ दिखती फिर वही जगह..
होती जब सुबह सबेर ....
जाने क्या था ये उस पगले का खेल ...
बच्चों संग बतियाता था वो..
संग खेलता था कभी क्रिकेट का खेल...
थी खटारा खड़ी कार ही उसका घर .
उसी में देर रात छुपाता था वो सर ..
कहते थे सभी पुलिस का जासूस होगा वो..
इक सुबह खबर फैली मोहल्ले में देर सबेर ..
निष्प्राण पड़ा था वो पगला...
बस स्टैंड पर ठण्ड से अकड़ा ..
(इक पगला जिसे मैंने बचपन में देखा था.....रामेश्वरी)
.

Sunday, February 26, 2012

सखी बसंत आयो है...

सखी बसंत आयो है...
संग अपने फागुन लायो है..

अब टेसू पलाश भी खिले आंगन मेरे .
फिर से होगी होलिका दहन...
आँगन मेरे ..

होगी फिर से हुडदंग होली...
झूमती आएँगी मस्तो की टोली ....
श्याम स्वेत वर्ण सब समान..
संग जल के प्रेम फुहार होगी...
पिया  संगे खेलूँ, फिर मैं होली..
भीगे२ तन मन में भी देख सखी..
उमड़ रही गरम साँसे होंगी....
उस दिन प्रेम पर ना बंधन होगा ..
ना एह्साओं पर  सीमायें होंगी..
गर वो कृष्ण मेरी नगरी के होंगे..
संग उनके पड़ोस की बालाएं होंगी ..
आँगन मेरा ज्यूँ ब्रज होगा ...रामेश्वरी 

बसंत आयो

मैं क्या जानूं, कब आया बसंत ऋतुराज है...
खिले होंगे टेसू, गेंदा, पलाश, बुरांश सभी...
मोऊ पे फर्क हो कैसे, मेरे सजन जब पार हैं...
मेरे लिए बिन साजन, बसंत भी पतझड़ समान है ..
आयें जब सजन सूने से इस आँगन मेरे, 
तब सग्र पतझड़ में भी जैसे खिली बसंत बहार है..........रामेश्वरी 

 

Saturday, February 25, 2012

 
 
 
 हे देव मेरे, ये क्या करा...
जहाँ भरना था प्यार मोहब्बत ...
वहां स्वार्थ ही स्वार्थ क्यूँ भरा...


कहा किसी ने सत्य है ..
भय बिना ना होत प्रीत ...
डर ही सूर्य के पूजन की नींव 
डर ही करे ईश्वर  रूप सजीव ..
डर ही रोशनी का आधार ...
पाप पुण्य का डर भया, 
जीवन की नैया संसार पार...
डर से  ही रचा इंसान ने ...
ईश्वर के कई प्रतीक ...
डर से हो रहे कई वैज्ञानिक ..
प्रयोग सटीक ...
जग में लिया जन्म जब मानव का ..
अब ब्रह्मा देव का डर क्यूँ ?
डर नहीं, पूजन नहीं...
मौत हर पल डराए, तुच्छ इंसान  ...
सबसे ज्यादा पूजे जाते, मेरे शिव ..
सत्यम शिवम् सुन्दरम भगवान ....
डर में छिपा हित भी...
माँ करने अनुशासित  बालक..
नित नए रूप से डराए ...
कभी बुडिया आये डराने ..]
कभी दाढ़ी वाला बाबा आ जाये...
बिन भय इंसान खुद इंसान ना रह जाएगा ..
बचाने वजूद उसे अपना, हर रोज डराया जायेगा ................रामेश्वरी 


.
सुना! जहाँ में कह गए बड़े2,  इश्क मुश्क छिपाए नहीं छिपते ..
फिर कैसे ये बसा इस दिल में, इक हम हैं जिसे पता ही ना चला ....

हर शय के दाम में आग लगी है, कैसे इसे बुझाएंगे 
ये बाज़ार ऐसा जहाँ,  इंसान का तो मोल नहीं ...
दीन ईमान बड़ी सस्ती कीमत, ख़रीदे बदले जायेंगे .....
तराजू उस देवी के हाथ,  जिसे सब कारे नज़र आएंगे ...रामेश्वरी 




कीमते आसमान छु रहीं, 
तारे गिर पड़े धरातल पर ...
चाँद भी अब मुस्कुराता नहीं, 
किसी चेहरे पे अक्ष उसका ..
नज़र अब आता नहीं.....
सस्ते में भक्त भी दर्शन पाता नहीं ...
अब तो छाया भी महंगी हुई..
मॉल खड़े बड़े बड़े...
बिना टिप सन्तरी छाया छूने ..
अब देता नहीं....
अब तो प्यार भी महंगा हुआ...
जिसकी जेब गरम,  उसी से हुआ ....
गरीब का मोल, अब सस्ता है बस..
जिसने पी वही गया, कुत्ते की तरह ..
उसे कुचलता  हुआ  ....
अब कैसे हम,  अस्तित्व खुद का बचायेंगे...
हर शय के दाम में आग लगी है, कैसे इसे बुझाएंगे  (रामेश्वरी )
पीले हुए पात सभी ह्रदय के मेरे,  लगे ज्यूँ  पतझड़ आ गया ///
सावन बन बरसो, तुम प्रिये, कर दो हरा, ये उपवन तुम मेरा /// 
कोपले उम्मीद की फिर फूटेंगी, कलियाँ नयी जीवन में आएँगी ///
खिलेंगे उपवन पुष्प नए,  हँसेगी फिर डाली2, झड़ी वो कब आयेगी ///....(रामेश्वरी... स्पर्धा )



तुम बहते रहे उफनते दरिया की तरह ///
मैं साथ साथ सटी चलती रही किनारों जैसे //
ह्रदय मेरा आकाश तुल्य, करी ना अभी सौतिया डाह ///
जबकि तुम बह कर आज भी,  जा रहे सागर की राह//  रामेश्वरी



उठाया था मैंने भी, कांधे पर्वत अभावों का ...
जब जब गरीबी आंगन मेरे घुमा करती थी.......
माँ हो परेशां अभावों से, झुन्झुलाया करती..... 
मारती वो फिर, ह्रदय भेदी बाण, अचूक थी ....
घायल जब जब हुआ, हृदय  तीखे बाणों से....
लगी  मुझे सदैव, घावों पे संजीवनी बूटी तुम...रामेश्वरी 


तुम दरिया बहता बनों..
मैं मत्स्य बन विचरूंगी..
मैं बनू गर पुष्प बसंत का..
तुम भवंरा बन इतराना ....
तुम हरा भरा उपवन बनों..
मेरा हिरनी सा इठलाना ...रामेश्वरी 

कमल चक्षु तेरे, नीर गंगा जल ...
मोतियों सी मुस्कान ...प्रिये |
तन मन तेरा, पवित्र धाम प्रिये ..
मैं साधक, तू ही मेरा भगवान प्रिये ..||..(रामेश्वरी )



शाखाओं के पातों पर पड़ी ..
जो मोती सी चमकती ओंस की बूँदें हैं..
वो नीर है नैनो से गिरे, मेरे आज ...
छुपाया जग से,  नीर इन पातों पर क्यूंकि ..
मरुस्थल इस जग के जज्बात  हैं ....
(रामेश्वरी)




मेरे सागर समान, प्रेमी ह्रदय पर..
ये दो छींटे प्रेम, मार गया कौन .......

मैं ताकती रही आसमां,  बन प्यासा पपीहा ..
मेरे सूखे अधरों पर, सावन बरसा गया कौन ...........रामेश्वरी 
बिन जुर्म, कैसी सजा ..
बाबूल का घर तजा..
मंदिर सा कैदखाना ..
सात जन्म की सजा भई..
ना हाथ हथकड़ी ..
ना पैर ज़ंजीर भई ...
ख़ुशी२ काटें सजा सभी ..
फिर भी जेलर(साजन) से पहले ..
मौत मांगे कैदी (सजनी), 
सजा(प्रीत) कैसी भई .................रामेश्वरी 
मंजिल दूर, लम्बा सफ़र, महबूब तेरे दीदार को ..
चली दबे नंगे पावँ, खबर ना हो बैरन जहाँ को ,
घडी भर बैठ छांव,  पर संग2 ये आवाज़ किसकी है .............रामेश्वरी 

 
 
दुआ है मेरी ...ऐ दोस्त ..
तुम्हें मिले मंजिल तुम्हारी ..
हमें मिले यह ज़रूरी  तो नहीं...
हर सफ़र की मंजिल एक तो नहीं..रामेश्वरी 
मेरी आवाज़, तुम्हें छु कर आई है..
मैं यही खड़ी, बस तन्हाई सी है ...

ना जाने दोनों में, यूँ दूरी दरमियाँ क्यूँ ..
सफ़र में इस बार इतनी लम्बाई क्यूँ है .....रामेश्वरी 

 
 

 
कठिन डगर, लम्बा सफ़र..
मंजिलें कितनी ही दूर सही..
पा ही लेंगे उसे हम पल भर में..
यदि मेरा हमसफ़र तू हो................रामेश्वरी


था दिल हमारा भी मोम सा, कदम रखे थे हमने ..
जब बुतों के शहर में ..
हर ठोकर पर हमने, देखो तराशा इक नया पत्थर दिल..
बुत भीतर अपने...............(रामेश्वरी)
मूरत2 में फर्क कितना..
चाँद की चांदनी और
सूरज की आग जितना ....
वो ममता की मूरत ...
हम पत्थर की मूरत ....रामेश्वरी 

पत्थर2 कह दुत्कारा सबने मुझे..
ठोकर मार आगे बढ़ गए, 
क्या कभी मोम का बुत सह सका,  तपिश तेरी..
मैं वो, जिस बुत को तू धूप दे या छावं दे मर्जी तेरी ...........
मोम पिघली तो बेदर्दी कहलाई तेरी...
मैं उफ़ भी करूं तो खुदगर्जी मेरी..............रामेश्वरी 




क्यूँ खुशफहमी पालते हो...
पत्थर दिल सनम में दिल तलाशते हो........रामेश्वरी 
वो जाते २ कह गए पत्थर हमें...
इक हम हैं नादां,  चुप्पी उनकी तोड़ ना सके............रामेश्वरी 

कहते हैं पत्थर दिल हैं ये पत्थर भी...
यह जज्बात कहाँ रखते हैं...
यही पत्थर तो, हर इश्क की दास्ताँ ..
इतिहास खुद पर सजाये बैठे हैं......रामेश्वरी 
 वो फ़ेंक पत्थर पानी में वीरता दर्शाते हैं...
हम पत्थरों से पानी बहा धरती माँ हर्षाते हैं .........रामेश्वरी
प्रत्येक प्रतिबिम्ब पर, प्रति पायी प्रिये तुम्हारी ...
रोई रुक्मणी देख रासलीला, राधा संग तुम्हारी ........रामेश्वरी
राम जप जप जपकर, हे प्राणी, तप तपकर भी ..
रही रावन रूप आत्मा, रामायण रचित ना कभी.......

चपल, चंचल, चितवन है, चन्द्रिका तेरी ..
चाँद भी चकोर बन, चाहत रखे चन्द्रिका तेरी .........रामेश्वरी
तरुवर तीर, ताड़ तले, तन्मय कान्हा, प्रेम लीन...
बंसी बजे बैरन, बरबस भागी गोपियाँ, लाज विहीन ......रामेश्वरी
मोहना मोहे मोह लिए, दिखा मोहे मूरत मोहनी..
गोकुल गली, गोपियौं गले, डाल हाथ खेरे होली, डाह करे राधा सोहनी .. रामेश्वरी
बरबस कर गयी बस में, बांसुरी ब्रज बासी की 
मंद मंद मुस्काये मोहना, मिटी मति माहरी............ .रामेश्वरी
हरी थे तो हरा नहीं..
हरा है तो हरी कहीं नहीं...
हरी हर लिए हरा सब.
इन बुतों में कलाकार, दिल ना तराश.
रंगे हैं यह मैंने बड़े अहंकार से ..
दौलत की चमक दमक रंगीनियों से ..
दिल पथहर सही है इनका..
गर भावुक हो रो पड़े, रंग होंगे फिर फीके से .....
मेरे अश्रू इतने खारे कैसे...
समंदर में नहाई कभी नहीं..
गुज-राजस्थान से नमक की ..
आंधी यहाँ तक कभी आई नहीं.........
बस यही इक बात समझ आई नहीं ..........
यह नमकीन हवा बही किधर से ....
शेर तो स्वभाव से, जन्म जात शेर है....
पर शेर दिल बनकर दिखाओ तो जाने...
दहाड़ से अपनी, खेमा दुश्मन का हिलाओ ..
तो शेरदिल तुमको जाने ....
धरती पर रहकर चंद बूँदें गिरा रोये सब...
दुश्मन को चने चबवा, रूला दो तब जाने ....
एक कदम से तुम्हारी धरती हिले..
संग गर्जना से नील आसमान में........
दामिनी जगाओ तो जाने ..........
आवाज़ में तुम्हारी अग्नि का शोर हो..
जाओ तुम जहाँ, वहीँ रात्रि में भोर हो...
आगमन पर तुम्हारी भोर में भी अन्धकार ..
हो तो, शेरदिल तुमको जाने .......रामेश्वरी