मुझ में बसे हो तुम..
जैसे सूर्य में किरण जैसे..
सीप में सोया मोती जैसे..
मुझ में छुपे हो तुम..
गंगा में पवित्रता जैसे...
पुरवाई में ठंडक जैसे..
आईने में अक्ष जैसे...
हरियाली में हरा रंग जैसे...
मुझ में बसे हो तुम...
जैसे...
तुम्हारे चेहरे में चमक मेरी है..
मेरे ह्रदय में धड़कन तेरी है...
मृतिका में सोन्धि२ सौं जैसे ...
समंदर में खारे नमक जैसे
दोनों इक पेड़ की डाली जैसे..
दो हाथों की बजती ताली जैसे......
बिना इक दूजे जैसे...
बिना मूर्ती के मंदिर जैसे..
बिना डोर उड़े पतंग जैसे..
बिना समंदर नदिया जैसे...
(रामेश्वरी)
जैसे सूर्य में किरण जैसे..
सीप में सोया मोती जैसे..
मुझ में छुपे हो तुम..
गंगा में पवित्रता जैसे...
पुरवाई में ठंडक जैसे..
आईने में अक्ष जैसे...
हरियाली में हरा रंग जैसे...
मुझ में बसे हो तुम...
जैसे...
तुम्हारे चेहरे में चमक मेरी है..
मेरे ह्रदय में धड़कन तेरी है...
मृतिका में सोन्धि२ सौं जैसे ...
समंदर में खारे नमक जैसे
दोनों इक पेड़ की डाली जैसे..
दो हाथों की बजती ताली जैसे......
बिना इक दूजे जैसे...
बिना मूर्ती के मंदिर जैसे..
बिना डोर उड़े पतंग जैसे..
बिना समंदर नदिया जैसे...
(रामेश्वरी)


