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Tuesday, October 18, 2011

मुझ में बसे हो तुम..
जैसे सूर्य में किरण जैसे..
सीप में सोया मोती जैसे..

मुझ में छुपे हो तुम..
गंगा में पवित्रता जैसे...
पुरवाई में ठंडक जैसे..
आईने में अक्ष जैसे...
हरियाली में हरा रंग जैसे...

मुझ में बसे हो तुम...
जैसे...
तुम्हारे चेहरे में चमक मेरी है..
मेरे ह्रदय में धड़कन तेरी है...
मृतिका में सोन्धि२ सौं जैसे ...
समंदर में खारे नमक जैसे

दोनों इक पेड़ की डाली जैसे..
दो हाथों की बजती ताली जैसे......

बिना इक दूजे जैसे...
बिना मूर्ती के मंदिर जैसे..
बिना डोर उड़े पतंग जैसे..
बिना समंदर नदिया जैसे...
(रामेश्वरी)
कहीं कोई भूख में खा रहा..
कहीं भूख किसी को खा रही..
उपजाया जिसने इस अन्न को..
अन्न तृष्णा उसी को तड़पा रही..(रामेश्वरी)
मुझे भी प्रसिद्ध होना है....मुझे भी प्रसिद्ध होना है..
मुझे भी टीवी में आना है, चेहरा अपना वहां दिखलाना है

आजकल तो जूते खाना और मारना इक फैशन है....
आसान तरीका ही सही..पर इस बात में वज़न है ...

मारूं किसको यह करना चुनाव है...
किस पर लगाना अपना सीधा दाँव है...

इतनी महंगाई में जूता मेरा महंगा है...
पर प्रसिद्ध होना है यही इक पंगा है ....

कहीं वो हमसे सरकारी गरीब ना हो...
हम मारे एक चाह उसे दुसरे की भी ना हो...

उसका तो जोड़ा बन जाएगा....
पर मेरे जैसा 32Rs सम्पति का अमीर...
बिना जूता मारा जाएगा......(रामेश्वरी)

Sunday, October 16, 2011


कल देखा छलनी से मुझे बड़े प्यार से...
आज छलनी हूँ में उसकी तकरार से...

कल ले बलायियाँ मुझे पे वो  वार रही थी..
आज समझ बला मुझपर कर वार रही थी...

कल माथे पे मेरे प्यार का टिका था ...
आज ना पूछो कैसे इक पैर पर मेरा शरीर टिका है..

कल रख उपवास विचलित से उसके दिन रैन थे ...
आज जैसे खा जायेगी मुझे ही ऐसे उसके नैन थे..

इक दिन चरण छुए उसने कर्ज ये चुकाऊँगा...
३६४ दिन अब उसके चरण में दबाऊँगा....
सावित्री वो बन गयी ...
अब सत्य वान में ही कहलाऊँगा...(रामेश्वरी)

Wednesday, October 12, 2011

हम आईना देखें क्यूँ ?
आईना भी झूठ कहता है...
जब भी देखूं आईना मैं ..
दिखे तस्वीर तेरी...

और आईना कहे इसमें खता..
मेरी नहीं जब...
तुझ में वही बस्ता है...

खुदा वो नहीं खुदा से कम भी नहीं
मेरे घर जब खुशियाँ वही रचता है ....रामेश्वरी
वक़्त तू हमसे यूँ बेहयाई ना कर..
ओड़ मुखौटा चांदनी का, आशियाना मेरा...
पल भर को दमकाया ना कर.....
सोच चाँद आ गया हम व्रत तोड़ देते हैं...
दे दगा हमें फिर यूँ अँधेरा ओड़ा ना कर.......रामेश्वरी
काश ये काश होता...
हमारा भी इक छोटा सा आकाश होता..
थोड़ी सी उम्मीद व हौसले का प्रकाश होता...
उड़ान ऊँची होती और हमारी .....
यदि थोड़ा सा मिला हमें भी अवकाश होता....
किसी ने यदि हमें भी तराशा होता....
वो कर दिखाते हम ना कोई हमसे निराश होता....
पर काश ये काश होता !



(रामेश्वरी)

Tuesday, October 11, 2011

दिन-दिन, पल-पल, रैन रैन गिन हम जीते हैं...
जीने को आह़त छिद्रित ह्रदय को हर कोने से यूँ सीते हैं..

इन बूढी आँखों में बेशुमार बहता प्यार देखा है.....
विरह में डूबा इन आँखों का इंतज़ार देखा है....

कब आओगे बेटे घर...?
टक टकी लगाये खड़ी इक पांव पर ..
माँ का निराश चेहरा देखा है........

बाल सफ़ेद हमने किये..
सफ़ेद खून क्यूँ हमारा हुआ...
कभी वनवास माँ ने दिया था...
आज माँ को वनवास क्यूँ हुआ...
ये जन्म देने की सजा है शायद ..
जो आज मुझे आजीवन कारावास हुआ..

(रामेश्वरी

Sunday, October 9, 2011

हम दोनों में फर्क बस इतना है ..
वो कबीर जैसे ..मैं कबीर ऐ रंग ..
वो चाँद जैसे मैं रौशनी उसके संग ..
गर वो पतन मैं डोर डोर संग ...

वो कनक स्वर्णिम हैं, मैं सिर्फ कनक ..
वो गर संगीत हैं, मैं सिर्फ इक खनक ...

प्यार सिर्फ एहसास है..
गुण अवगुण देखे नहीं...
जो देखे गुण उसे प्यार मिला नहीं..
जहाँ सच्ची प्रीत मिले उसे अपना लो..
धन दौलत हाथ का मैल है धो डालो...
(रामेश्वरी
aayena bola dekh use..
teri surat kyun aaj tak anjaan thi..
kyun kal tak tou teri jaat inshaan thi.
शायद आँखों को भी उसकी याद सताती है...
उसकी तस्वीर को वो भी बहाना चाहती है..
इसीलिए याद में वह भी अश्रू खूब बहाती है .. .
तस्वीर बसी आँखों की इतनी घहराई में...
जहाँ तक शायद कोई सीड़ी नहीं जाती है...
इसीलिए चाहकर भी अडिग नहीं कसम..
... फिर टूट जाती है...(रामेश्वरी)
निंद्रा तू रात्रि के पहर आया न कर...
जिन्हें भूलना चाह हमने ... यूँ...!
उनसे हमें स्वप्न में मिलवाया न कर....

उनसे दूर जाने को, आँखों में तुझे यूँ आने न देंगे...
मेरा बसेरा बसा नहीं, तुझे कैसे यहाँ घर बसाने देंगे....(रामेश्वरी)

Sunday, October 2, 2011


यूँ मेरे उजालों में अँधेरा ना भर ..
ख़वाब रात समझ दस्तक देते हैं !

यूँ इतना पाक -साफ़ दिल इंसान ना बन...
खुदा समझ हम नित नतमस्तक करते हैं  !

यूँ प्यार की घटा बन लहरा कर गली से हमारी ना गुजर...
हम सावन समझ पपीहा समान आसमाँ को यूँ तकते हैं !

(रामेश्वरी)