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Monday, April 29, 2013

हिंदी फ़िल्में, 
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया, जी हाँ, ये एक हिंदी फिल्म का गाना है , जो मुझ नाचीज़ पर फिट बैठता है। हिंदी फिल्मो में सब कुछ है या यूँ कहूं तो जीवन जीने की कला हिंदी फ़िल्में बेहतर सिखाती है। मेरे एक दोस्त को तो इतना फोबिया हुआ की वो निरूपा राय को ही अपनी माँ मानता था और असली माँ को ललिता पंवार। एक दोस्त तो खाते पीते , सोते उठते बस कुछ रटे -२ डायलॉग ही बोलता रहता था मसलन " हम जहाँ खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीँ से शुरू होती है , हांय !" या " जली को आग कहते हैं बुझी को राख कहते हैं ...जिस आग से बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं।" ये फ़िल्मी डायलाग भी पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहते हैं, एक बुजुर्ग से पूछ लिया कोई हिंदी फिल्म का डायलाग सुनाओ तो मुगले आजम सुनाने को झटपट तैयार हो गये लो जी " हमारा हिन्दुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं एक लोंडी जिसकी मलिका बने ..तो सलीम कहता है "मेरा दिल भी कोई कोई आपका हिन्दुस्तान नहीं जिस पर आप हुकूमत करें।" अब मुझे समझ आया बीज तो इन बुड्ढों के जमाने में ही बोये गए थे। अगर आज सलमान खान गाता है की " इश्क के नाम पर करते सब रास लीला है , मै करूं तो साला करैक्टर ढीला है" तो हरगिज़ नाइंसाफी नहीं। तो मेरे कोरे जीवन की बातें हो रहीं थी , कोरा यूँ की हिंदी फिल्मे ज्यादा नहीं देख पाया , गुरु जी पूछते कितने दंड पेले , कितनी बैठक लगाईं, कितने रस्से चढ़ लिए , तो जवाब मिलता ३ हज़ार दंड, २ हज़ार बैठक और तीस बार रस्सा चढ़ लिया तो गालियाँ पड़ती , नालायक तेरे से कुछ न बन पड़ेगा , इधर और ज्यादा करने के चक्कर में शाम ६ बजे तक चित्त होकर खाट पकडनी पड़ती। कहाँ से देखते आखिर ज्ञान की धारा तो प्राइम टाइम या उसके बाद ही बहती है। और पहलवानी में ब्रह्मचारी होना लाजमी है , सो भय इतना की हर लड़की में बहन ही दीखती , हाँ अगर हिंदी फ़िल्में देखते तो सुबह-२ बालों में कंघा लगा कर मोटर साईकिल लेकर किसी लड़की के घर के नीचे न खड़े हुए होते ? दोस्तों से उधर मांगते या माँ बाप से किसी न किसी बहाने रूपये मांग कर उनका मोबाइल बिल भरते। अपनी किस्मत में ऐसा कुछ न रहा। दिन भर पार्कों में आजकल बच्चे क्या क्या शिक्षाप्रद बातें करते हैं हमसे न हो सकी , क्योंकि जो सुबह चार बजे पार्क में पसीना बहा कर सात बजे लौट आये वो दिन में वहां फिर क्या करने जाएगा अंदाजा न था , हिंदी फिल्मों की शिक्षा ग्रहण करता तो पता चलता। खैर इधर अपने पडोसी की लड़की बड़ी हिंदी फिल्मे देखा करती , मां बाप उसके और पडोसी लड़के के बीच उन्हें विलन नज़र आने लगे , अब उनके मोबाइलओ में शिक्षाप्रद गाने बजा करते "मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए " या फिर "भीगे होंठ तेरे .." और भी न जाने क्या क्या ? ज्ञान अंतहीन है , उसका संग्रह और दर्शन आपके जीवन की दिशा निर्धारित करता है। आपके चारों और का वातावरण आपको प्रेरणा देता है , इधर फ़िल्मी हेरोइन हीरो के साथ भागी नहीं की पडोसी की लड़की ने भी बैग बाँधा और पडोसी के लड़के के साथ भाग खड़ी हुई, समस्या हमारी , ढूंढें हम। और पकडे जाने पर हमारी किरकरी। क्या आपने कभी प्यार किया है ? सवाल हुआ ; आपको क्या मालूम माँ बाप हमें प्यार नहीं करते , फलां लड़का प्यार करता है , कोर्ट मैरिज कर चुके हैं क़ानून हमारे साथ हैं इत्यादि -२। भाई शादी तो हम भी कर चुके मैंने उनसे कहा। मां बाप ने लड़की ढूंढी , और ये लो जी घोड़े पर बैठे और डोली ले आये ,पर क्या मजा आया महीनों दिल्ली भर के पार्कों की शोभा तो न बढ़ा पाए । इनकी शिक्षा प्रद कहानी सुनकर आज घरवाली से कहने को जी हुआ सुनो जी कल बस स्टैंड पर सज धज कर आ जाना ,में भी बालों में कंघी लगा कर जींस पहन कर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा किसी पार्क में बैठेंगे , एक फिल्म देखेंगे , और फिर आइसक्रीम खायेंगे , तो महारानी बोली पगला गए हो , बच्चे कहाँ रहेंगे ? पार्क में बाते क्या करेंगे, मैंने तो बता ही दिया है की परसों मायके जाना है साडी और सूट तो मैं ले ही आई हूँ , सिलाई देनी है तो यहीं देदों और हाँ अकेले ही खाओगे मम्मी पापा को पता चलेगा तो क्या कहेंगे ? वगैरा -२; सुनकर जवाब न बना , अपना तो वक्त ही चला गया , हिंदी फ़िल्में देखि होती तो ये अनुभव भी हुआ होता मां बाप से शहजादा सलीम बनकर बहस बाजी करते। खैर अब इधर कुछ अरसा पडोसी की बेटी की शादी हुए गुजरा तो मालूम पड़ा हिंदी फिल्मों मे शादी के बाद की कहानी ही नहीं होती , हिंदी फिल्मों का ज्ञान-दर्शन तो बस शादी पर ही ख़तम हो जाता हे , लड़के ने जो टाइम हिंदी फिल्मों की प्रेरणा स्वरुप लडकी की खिड़की के नीचे लगाया उसका परिणाम ये हुआ की कमाई के लाले पड़ गये , घर तो पहले ही छोड़ना पड़ा था किराए के छोटे मकान में ठीक से गुजर बसर न हो रही थी , सो लड़की मेरे पास आई कहती इन्हें नौकरी लगा दो मैंने जानबूझ कर पुछा क्या कर लेता है , हालांकि मुझे तो पता ही था। किसी तरह एक कम्पनी में चपरासी लगाया तो रोजी रोटी चली , उन्हें याद कर रहा हूँ , इधर कोई आशिक रेडिओ पर गाने सुन रहा है ... मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में ...इधर मुझे भी समझ आ रहा है। ठीक रहे गुरु जी के डंडे और झिडकियां खाई सो खाई बच्चे चैन से सो रहे हैं

Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)

मैं मांगता हूँ ।

मैं हर फ़िज़ूल कानून का उल्लंघन मांगता हूँ । 

मैं अपने देश, चैन ओ अमन मांगता हूँ ॥ 

हर फूल मुस्कुराएँ जहाँ,  वो चमन मांगता हूँ ॥ 

हर रोंदने वाले पैरों का, मैं दमन मांगता हूँ ॥ 

हर फूल बचा लूं,  मैं दोनों हाथ लोहे के कंगन मांगता हूँ ॥ रामेश्वरी 
सौम्य, पावन  हृदया तू ....
पुरुष जीवन का मान सम्मान तू ..
कोमल तन ..
कोमल मन सही ..
यम से हर ले प्राण तू।
उज्जवल रूप रंग ..
हाड मॉस का लोथड़ा भर नहीं तू ..
क्यूँ वहशी गिद्ध निगाह गाड़े खड़े ?.
लज्जा रहती है जिन नैनो में ..
उन नैनो मैं तेज़ाब भर तू ...
अब दौर नहीं घूंघट का ..
छोड़ दामन पनघट का ..
नीर बहुत बहा चुकी तू ..
कल्पना का आकाश, राह ताके तेरी ..
उन्मुक्त, स्वछंद उड़ान भर तू ...
बहेलिये खड़े जो, गर राह हो तेरी ..
जो समझे ना तेरी ह्रदय पीर ..
लोह भर ह्रदय,  हाथों में उठा शमशीर ..
जीवन रणभूमि मान तू ..
अपनों में, गैरों में ..
दुश्मन को पहचान तू ....
(रामेश्वरी)








 



कहीं बजी घंटियाँ ..
कहीं राग छेड़ रहा संतूर है ...
हाय ये इश्क ..
ख़ुदा !  खुद में इक फ़ितूर है । 
जो कर बैठा ..
वो बाँवरा, खुद से मीलों दूर है । रामेश्वरी 
 ये आईना गर्द हटा कर निहारना जानता है । 
कैसे कहोगे, खूबसूरत हो तुम ?.................

Thursday, April 25, 2013

देवदासी





रह चरणों में देवता के ...
रही में प्रेम प्यासी ..
कभी महसूस करूँ बंधन ..
कभी घट घट वासी ..
कोई कहे जोगनी, कोई देवदासी ..

वही बसेरा मेरा ...
मंदिर शिवालों में ..
मदमस्त नृत्य करना चाहूँ ..
गोपियों ग्वालों में ..
पग बंधे घुँघरू मेरे ..
क़ैद रस्मों रिवाजों में ..
असंभव निकासी ..

अर्पित आजीवन ..
देव चरणों की दासी ..
ब्याहता देवों की ..
वर्जिता जीवन मेरा ..
देव स्पर्श को प्यासी ...रामेश्वरी "तस्वीर क्या बोले" समूह में समक्ष रखे गए चित्र पर मेरे कुछ शब्द ....शुभसंध्या सभी मित्रगणो को ..







Tuesday, April 23, 2013




अज़ब मेरे शहर का मौसम देखा ..
शहर मेरे सूखा पड़ा प्यार का ..
वहीँ बहता दरिया नफरत का देखा ...रामेश्वरी 
आ ..
सुरमई बादलों को ..
चोंच से अपनी चीरते हैं ..
आ,  तरसते कंठ सींचते हैं ..
अथाह नीर गर्भ रखे ..
जाने क्यूँ, किस और दौड़ते हैं ?
जाने किस पर ये खीजते हैं ..

आ  ..
संग नृत्य करें ..
कोमल पंख फैलाएं ..
नीलाभ नभ में ..
अपूर्व दृश्य रचायें ..
इस स्वार्थी लोक से दूर ..
अपना नव त्रिदिव सजायें ..

आ ..
उड़ चले ..
उस दिशा की ओर ..
जिस ओर स्नेह दरिया बहे ...
ना स्वार्थी मानुष हो जहाँ  ..
ना रक्त का दरिया बहे ..
आ ..क्षितिज तक उड़ान भर आयें ..
धरती आकाश मिले कैसे वहां ?
प्रेम का वो सबक पढ़ आयें ..
(रामेश्वरी )

'  तस्वीर क्या बोले" समूह में मेरे कुछ शब्द…. 






समझो ना ..
वीरानियाँ छाई हैं ..
गिरे पीले पात हैं, मगर !..
सन्नाटे में कहीं ना कहीं ..
यादों की बारात है ...
छूने एहसास मेरे ..
तेरी यादें आई हैं ...
 धुंधली हवाओं ने 
यादें धुंधली करायी हैं ..
पर यहीं कहीं, लुक्का छुपी ..
खेल रही तेरी परछाई हैं .. 

कभी गूंजती थी स्वरलहरी ..
आज यहाँ वीराना है .
निसदिन ख़ामोशियों का आना जाना है ..

आज पड़ी धरातल ..
काठ के ठूंठ की तरह,  उम्मीद हमारी..
पर आज भी ..
ये मेज हमें  बुलाता  ..
सूखे  झड़ चुके पातों से..
खुद का सौन्दर्य बढाता ....
धीमे से पुकारता ..
ए राही जब गुजरना इन राहो से ..
थोडा ले सहारा मेरा सुस्ता लेना ..
भूल चुके जो लम्हें बीते संग मेरे ..
उनकी थाह लेना ..
पा सुकून, फिर अपनी राह लेना ..
ये आज भी तुम्हारे प्रेम की महक ..
संजोये रखता है ...
ये बैठा एकांत वीराने में ..
आज भी दामन अपना खाली रखता है ... रामेश्वरी  



Wednesday, April 17, 2013

हिदी की पढ़ाई, 

परसों एक रिक्शा वाला आड़े टेढ़े चलता हुआ मेरी गाडी को हल्का सा छु गया , मैंने एक दम संज्ञान लिया, गाडी का शीशा नीचा किया , गर्दन बहार निकाली , आँखे तरेडी , और रिक्शा वाले की तरब मुखातिब हो कर कहा ... ओ बहन के… माँ के ... तेरि… और रिक्सा वाला फुर्र ...इधर एक विदेशी भी सब कुछ देख रहा ,था उसने अपने गाइड से माजरा पुछा ...तो गाइड ने उस विदेशी को कहा की फलां गाडी वाले ने रिक्शे वाले को हिंदी में कुछ समझाया है और वो समझ कर सीधा अपने रस्ते पर चले गया है , हिंदी भाषा के प्रयोग की ताकत और महत्ता का उस विदेसी को ज्ञान हुआ, ..उसने तुरंत मेरी तरफ बढ़ कर मुझे कुछ बात कहने के लिए ,रोक लिया। पूछने पर उसने बताया की वोह मुझसे हिंदी सीखना चाहता हैं ... मैंने उसे कुछ हिंदी के लेक्चर देने का वायदा किया। और वो अगले दिन घर पर ही आ धमका। मैंने उससे पुछा की हिंदी कौन सी सीखना चाहते हो वो समझा नहीं , तो मैंने खोल कर समझाया , देखो पुलिस में भर्ती होना है, या नेता बनना है, किसी की चमचा गिरी करनी है , या अपने पैसे का रॉब झाड़ना हैं, धोखा देना है या किसी साउथ इंडियन से हिंदी में बात करनी हैं, हिंदी अलग-२ प्रकार की हैं,देखो पुलिस वाले की हिंदी में माँ बहन शब्दों का प्रयोग ज्यादा होता हैं, जबकि नेता जी की हिंदी में भविष्य काल का ज्यादा उसे होता है, मसलन हम ये कर ,देंगे वो कर देंगे, पानी पूरा मिलेगा , राशन सस्ता हो जाएगा , नौकरी मिलेगी , नालियों की सफाई होगी ..सब के सब भविष्य काल में .. अगर चमचा गिरी करनी है तो उसमे जी हजूर , मालिक , यस सर , हाँ जी, बिलकूल ठीक सर, हाँ , हाँ ...और सिर्फ हाँ जैसे सकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल ही होता है, ...किसी साउथ इंडियन के साथ कोई भी बात करनी हो तो जेंडर अर्थात पुरुष वाचक संबोधन को स्त्री वाचक में बदलना होगा , अर्थात सभी पुरुष यही कहेंगे , मई दूध खाती , मई चावल पीती .. इत्यादि -२। अब विदेशी का सर चकराया वो बोल हिंदी तो बड़ी व्यापक और भरपूर लोचदार भाषा है , लेकिन थोडा दिमाग चक्र खा रहा हैं, जरा थोडा मोर एक्सप्लेन प्लीज .. कहा चल कोई बात नहीं बेटा तुझे ढंग से ही समझाता हूँ। उससे पुछा देखो अगर आप किसी परिचित को देखते हो तो उसे क्या संबोधन करते हो , उसने कहा हाय , मैंने कहा हिंदी बड़ी व्यापक है , अगर आप अपने अध्यापक को देखोगे तो कहोगे नमस्कार सर, ताऊ राम -२ अगर ताऊ मिले तो, भाई मिले भैया जी राम राम, और भाई के धर्म पर भी निर्भर करता हैं की वो हिन्दू है या मुसलमान हैं, सिख है या इसाई है , इसके बाद अगर हिन्दू है तो कौन सा जैन, बोध , तो या तो असल्लम वालेकुम या फिर वाहे गुरु , इत्यादि -२ , इसके अलावा भी निर्भर करता ही की उसने किस गुरु का सत्संग ले रखा है ..जानने पर राधे राधे , या फिर जय गुरुदेव , या ॐ शांति कहना होगा इसके पेटेंट तो नहीं हुए है पर एक दुसरे गुरु ने इनको मान लिया है की अमुक तरह की राम -२ अमुक गुरु के चेले करते हैं मसलन ॐ शांति को ब्रह्मा कुमरिएस करती है , ..निर्भर ये भी करता ही की हाय लेनदार को की जा रही या देनदार को , ..मसलन जिसे लेना होगा वो बोलेगा राम-२ सेठ जी, और जिसने उधार दिया होगा वो कर्ज़दार को देखते ही बोलेगा अबे कहाँ था इतने दिन फ़ोन भी नहीं उठाता ...हाय चिचोरों द्वारा किसी हसीना को देखकर तो अंग्रेजी वाली हाय ही चलती है जो गहरी सांस खींच कर कही जाती हैं , इसे करने पर वैसे भी डिस्काउंट में चप्पल जूते एक्स्ट्रा मिलने का फायदा भी होगा। हाय रिक्शे वाले को तो मैंने की थी , अब रिक्शे वाला कैसे करता है ये खुद रिक्शा चला कर समझना पड़ता है, उस बेचारे कू हाई कहनी नहीं पड़ती उसकी तो हाय निकलती है, और ...और ....अब विदेसी बेहोश हो चूका था , तो लोगों ने कहा हाय बिचारे को क्या हुआ

Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)

गरीब हूँ लाचार हूँ,

aaj dilphenk aashik ban kar roohani huwaa jaata hoon

गरीब हूँ लाचार हूँ, 
पर तलबगार नहीं हूँ, 
चर्चे है तेरी अमीरी के सरे आम, 
चुरा लूं दिल वो एक महबूब हूँ, 
मै कोई चोर ,झपट - मार नहीं हूँ, 
तेरे हुस्न की बिजलियों में झुलसा हूँ, 
तुझे गलतफहमी है, मै कोई बीमार नहीं हूँ, 
हाँ कबूल है ,तुझसे बे इन्तहा मुहब्बत है, 
खता है मेरी, लेकिन गुनाहगार नहीं हूँ,
तेरे गुनाहों की माफ़ी के लिए सर पे काँटों का ताज है पहना,
चलता हूँ तेरी गली में अपनी सलीब लेकर ,
मै किसी क़त्ल में गिरफ्तार नहीं हूँ,
तुझे देख लूं एक पल की सांस निकले ,
अभी ज़िंदा हूँ, जहाँ तू आएगी चादर लेके अभी वो मज़ार नहीं हूँ,
thanks
deepak 






इंतजार की हद देखिये ..
कद परबतों से ऊँचा हो गया ..
आंसू घेरे बैठे ऐसे मुझे ..
जाने कब ये दरिया हो गया ..
सूखे लब मेरे, पुकारने में उन्हें ..
ये कितनों की प्यास बुझाने का ..
सामां हो गया ..रामेश्वरी

Monday, April 15, 2013




ऐ री सखी .
फिर रबी फसल पकी ..
खेतों में बालियाँ लहराये।।
चल खेतों की ओर चलें ..
मधुर लोकगीत गुनगुनाएं ..

हाथ हसिया ..
संग रसिया ..
नार चली कमरिया मटकाए ..
चल छांव अमवा की 
प्रेम बतियाँ बतियाएँ ..
ऐ री  सखी ..
फिर अमवा बौरायें ..

 ऐ री सखी ..
चल,  फिर मेले सज आये ..
कहीं झूले डलें ..
कहीं कोई चूड़ियां चमकाए ..
कोई दवा प्रेम वशी की बेचे ..
कितने हारने हिया यहाँ आये .. 
चल सखी ..पिया मिलन को
भीड़ में कोउन लज्जाये ..
कोई खोया यहाँ ..
कोई खोने मेले आये ..
फिर से बैसाखी का दिन आये ...रामेश्वरी 















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Thursday, April 4, 2013

ना मांगो आकाश उनसे ..
जिनके पास सिर्फ कुछ कतरे धुंध के हैं .....रामेश्वरी 

फिर काली बदरिया छाई ..




फिर काली बदरिया छाई ..
संग पूर्वा बहा लायी ..
कहीं पीर विरह की जगी ..
कहीं पीर अंगो में ..
निंद्रा से जाग आई ..


फिर से सुगंध, मृत्तिका भर लायी ..
दीवानों से मुरझाये पातों पर ..
फिर से प्रीत, उमंग बन भर आई ..
बिन ब्याही धरा,  प्रसूता भयी ..
नन्ही कोपलें, ले अंगडाई ..

कहीं गरजी, कही बरसी
क्यूँ यौवना क्रोध में आई ..
कहीं गुबार में बूँदें गिरीं ..
कहीं ओलावृष्टि गिराई ...

फिर बूंदों ने घूँघरू पहने ..
फिर शाखाओं ने ठाप दी .
लूकछुप कोयल गीत गुनगुनायी ..
काले बदरवा, कोयल काली ..
घूंघट कोयल छोड़ आई ..
बेसुध डाल२ डोली वो ...
लाज शर्म तज आई ..

खुद विरहन रही बदरिया ..
विचरण करे आकाश ..
खींच लकीर इन्द्रधनुषी ..
दो प्रेमियों को मिला आई ...

फिर से काली बदरिया छाई ....रामेश्वरीं