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Monday, April 15, 2013




ऐ री सखी .
फिर रबी फसल पकी ..
खेतों में बालियाँ लहराये।।
चल खेतों की ओर चलें ..
मधुर लोकगीत गुनगुनाएं ..

हाथ हसिया ..
संग रसिया ..
नार चली कमरिया मटकाए ..
चल छांव अमवा की 
प्रेम बतियाँ बतियाएँ ..
ऐ री  सखी ..
फिर अमवा बौरायें ..

 ऐ री सखी ..
चल,  फिर मेले सज आये ..
कहीं झूले डलें ..
कहीं कोई चूड़ियां चमकाए ..
कोई दवा प्रेम वशी की बेचे ..
कितने हारने हिया यहाँ आये .. 
चल सखी ..पिया मिलन को
भीड़ में कोउन लज्जाये ..
कोई खोया यहाँ ..
कोई खोने मेले आये ..
फिर से बैसाखी का दिन आये ...रामेश्वरी 















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