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Saturday, June 15, 2013

इतिहास वृक्ष से, वर्तमान का फल।।
जैसा सिंचोगे, पाओगे वैसा ही कल ॥ शुप्रभात सभी मित्रगणों को। कैसे हैं आप सभी ...
हमेशा सूनी नहीं थी गोद मेरी ..
मेरे आँगन भी बचपन पलता था ..
रसोई के चूल्हे के लहराते धुएं से ..
सुबह रेशमी किरणे, छूती थी आँचल मेरा ..
शाम ढले, अँधेरा मेरा, कोना टटोलता था ..
गिरती थी बूँदें ..
कलशे से पनहारियों के..
सीना मेरा जब जब उमस भर खौलता था ..
रंभाती थी गौ माता कभी, आँगन मेरे ..
नन्हा बाछी, मेरे सीने पर दौड़ता था ..
था सीना, कभी वजूद से मज़बूत इतना ....
दिन ढले तक, आने जाने वालों का ..
वज़न झेलता था ..
सोचती हूँ, क्या शहरी बहुमंज़िलों का सीना ..
ये वज़न झेलता होगा ?
आजा बेटा ....अब तो ..
आँचल मेरे घांस उग आई ..
बस अब ढ़हने को हूँ ..
याद तेरी फांस बन आई है।
(रामेश्वरी) मेरा जनम पालन पोषण उत्तराखंड में नहीं हुआ ..फिर भी मुझे वहां की खुद सी उठती है…. जिन लोगो ने वहां जनम लिया पले बडे अक्सर उन्हें शहर आकर उस मिटटी को भुलाते देखा है…लोग कैसे अपनी जन्मभूमि भूल जाते है ....मुझे अपनी जन्मभूमि और पैतृक भूमि दोनों से समान रूप से लगाव है….
हर मोड़ पर
नयी राह हो
संभव नहीं ..
हर नयी राह ..
मोड़ लिए हो
ये ज़रूरी है…. रामेश्वरी
ना मांगो आकाश उनसे ..
जिनके पास सिर्फ कुछ कतरे धुंध के हैं .....रामेश्वरी
ज़िन्दगी मुस्कराहट देगी, नींद से स्वार्थ की जागो, ज़रा सोने वालों । 
स्वार्थी नींद में अदावत ए ज़लज़ला सोने नहीं देता, लाख नर्म बिस्तर लगा लो…। रामेश्वरी
कहीं बजी घंटियाँ ..
कहीं राग छेड़ रहा संतूर है ...
हाय ये इश्क ..
ख़ुदा ! खुद में इक फ़ितूर है । 
जो कर बैठा ..
वो बाँवरा, खुद से मीलों दूर है । रामेश्वरी
चटक धूप में कैसे वो, खुद पर आवरण ओड़ लेता है । 
दिन के तीसरे पहर, वो कैसे बचपन निचोड़ लेता है ॥ रामेश्वरी .......

बच्चे देश का भविष्य हैं यदि उनके साथ अपहरण, बलात्कार जैसी घटनाएं होंगी तो सोचिये देश का भविष्य क्या होगा ?
चन्दन भयो अंग२ ..
तुम भवो भुजंग ..
संग हमारा यूँ भये ..
ज्यूँ कस्तूरी मृग संग ...
खोजे से भी, मिलूँ ना मैं ..
समाऊँ ज्यूँ इन्द्रधनुष में सात रंग ..
तुम तीर शाँत रहो ..
मैं इठलाती दरिया सी ..
यूँ अल्हड सा मेरा बहने का ढंग ..
रामेश्वरी ..

इन शब्दों को कोई मित्र अन्यथा ना लें ...बहुत दुःख होता है जब कोई इन्हें मजाक में लेता है…. अपनी भाषा का यूँ अपमान मंजूर नहीं ..नमस्कार ..
यकीं कर ..
मेरे ही आंसुओं से भरा ये सागर ...
मुझे और गम में ..
डूबोने की ज़हमत ना कर…. रामेश्वरी
जिसमे स्त्री के पंखो को उड़ान नहीं ..
वो कौन कहता है आसमान है ..
मुट्ठी भर धुँध लगा मुझे 
ऐसे आसमान की मैं मोहताज नहीं .....रामेश्वरी 
मेहनत का नमक घुला लहू में हमारे ...
चापलूसों का असर है, जो मिठास खोलते हैं ...रामेश्वरी
साँसों के उतार चड़ाव को यदि जिंदा होना कहते हैं । 
कब्रगाह में उन बूंदों का क्या कहें, जहाँ शाहजहाँ सोये हैं ॥ रामेश्वरी
लोग साँसों को जगा कर जीते हैं
हम साँसों को दबा कर जी गए ...
आज सिर्फ तन जा रहा कफ़न ओढ़ कर ..
हम तो माँ बनते ही खुद को पी गए .......रामेश्वरी




लोग साँसों को जगा कर जीते हैं
हम साँसों को दबा कर जी गए ...
धुंआ लहरा कर पीता हर शख्श ...
हम कमबख्त धुंआ दबा कर पी गए ....रामेश्वरी
बहता पानी अक्श दिखाता नहीं । 
अक्श देखने को ठहराव ज़रूरी है दोस्तों ॥ रामेश्वरी 
गिद्ध, कौवे , नदारद हो रहे अब… 
इस कदर इंसानियत को नोंच खाया हमने ...॥ रामेश्वरी ..शुप्रभात ..
हम बहते निरंतर, जाने अनजाने किनारे टूट जाते हैं । 
वजूद वही हमारा, बस बहने के दायरे बदल जाते हैं । रामेश्वरी ..

हायकू

कुछ हायकू लिखने की कोशिश मात्र ..यदि कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें और मेरा मार्गदर्शन भी करें । 


जीवन शोर । 
जे मृत्यु मौन धरे ॥ 
कर्म ही यात्रा ॥ 

युद्ध सफ़र ॥ 
राही रंजिश धरे ॥ 
अंत एकाकी ॥। 

कहीं थे शाखी।
कहीं बंज़र ज़मीं ..
नहीं यात्रा थमी ॥। 

मौन है पथ ..
है सफ़र अधिक ..
चल पथिक ..रामेश्वरी