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Monday, October 29, 2012

एक अच्छाई सौ बुराई पर भारी होती है और एक बुराई हज़ार अच्छाई को मिटा भी देती है।।।।।।। राम और रावन इसके अच्छे उदाहरण हैं।।।।।
तारें टूट चुकीं, पाप रूपी छिद्र भर चुके, धुन मधुर बजा रहे हैं साज़।।।
राम हैरान हैं, हाथ रंगे भ्राता लहू से जिनके, वही मुझे पूज रहे हैं आज ।।।
रावन मंद 2 मुस्काये देख, अरे रावन ही रावन को जला रहे हैं आज ।।।
सच देशद्रोही है, झूठ पहने हैं देखो शहंशाह का ताज ....रामेश्वरी
तेरी बेरुखी से देख हम खाक भये , काजल बन गए।।।
इन नैनो पर अब फ़िदा हैं वो, मेरी मय्यत उठने के बाद।।।।।।।रामेश्वरी
खून के रिश्ते ।
खून यूँ कर गए ।।
रंग डराता ।।।

रिश्ते हैं सस्ते ।
ये बेरंग हो गए ।।
घर सताता ।।।

देख फरिश्ते ।
भाई2 यूँ कट गए ।।

धर्म डराता ।।।

द्वार दो रास्ते ।
रंग हीर, वो पीर।।
सूफी ये गाता ।।। रामेश्वरी
हरीतिमा, किरणे, खुशगवार

ताक सकी जहाँ तक,..
दो नयनों की सीमा ..
धरा ओढ़े चादर हरीतिमा ..
मृत्तिका भी लिपटी अब।।
धरा से यूँ मुंह खोले।।।
दिनकर अब गर्म किरणे छोड़े ..
देख मौसम खुशगवार ...
बावरे बादल इत उत डोले ....

सुन सको तो सुनो रख धीर ..
बहता नीर कोउन धुन बोले।।। रामेश्वरी
GOOD MORNING FRIENDS
कोई अश्क बहा कर रो दिया।
कोई अश्क छुपा कर रो दिया ।
हम रोये ऐसे देख मेरे दोस्त ..
हम जब हँसे सारा ज़माना रो दिया ।। रामेश्वरी
उजाड़ दी वो सीडियां जिनसे उतरे थे वो दिल ओ ज़मीन पर, नासूर देने के वास्ते ।
अब गर्द लिए हाथ फिरते हैं हम, सुना है नया मकां बना रहे हैं वो बसर के वास्ते ।। रामेश्वरी
खफा था वो मुझसे, हर गुल उसकी जुबां से जुदा जुदा सा हो गया।
आज बहता लहू चूमे कदम उसके, सुना उसका कद अब बड़ा हो गया ।। रामेश्वरी
पुराने खंडहर फिर कोई बेल लटकी है।
लगा कभी, जैसे, किसी की जान आज भी अटकी है ..
हर क्षण हरीतिमा सा रंग सूखे तन पर चाहती है वो ..
हर भूले भटके राही को क्यूँ लुभाती है वो।
शाख अब झड़ चुके हैं उसके।
अब हर सावन से दूर है वो, 
इतनी लाचार मजबूर क्यूँ है वो ?..
पात अब शीत लहर से भी कंपकपाते नहीं ..
बस थोडा सा और जीने को मजबूर है वो ? ...रामेश्वरी 26/10/12
रोक लो वक़्त है।।
अब मेरे पर खुलने लगे है।।।
आकाश विशाल सही।।
ये उडने को मचलने लगे हैं ।।।
नयी उमंग, नयी उड़ान है अभी मेरी ।।
ये बादल संग उलझने लगे हैं ।।।
रंग भरे हैं इसमें सभी मन के मैंने ।।
रोक लो बारिश की बूंदों को ।।।
ये नीर से उसके पिघलने लगे हैं ।।।
वो लाये हैं जकड़ने पर मेरे, जंजीरे संग ।।
हुआ आज यकीन, वो अब नारी से डरने लगे हैं .......रामेश्वरी
आये न कोई ख्वाबों में, लो हमने खुली आँखें मूंद लीं ।
बंद थे द्वार नैन के, देख किसी ने नयी दुनिया ढूंढ ली ।।।
ये बेजुबान लफ्ज़ मेरे,..
तड़प रखते हैं भीतर अपने।।
फिर क्यूँ कोई आता है।।
लफ़्ज़ों में लिए खार अपने।।
खोजा घट।
तज सगर पट ।।
जग सराय ।।।

रूह बसे हो ।
जे कौन मार पाए ।।
विष पिलाये ।।

श्वेत वस्त्र हैं ।
कौन रंग चढ़ाये ?

ये मैला जाए ।।।

हाथ वीणा ।
सबहूँ मोह छीना ।।
लो समझाए ।।।

मीरा दीवानी ।
राधे सौत ना जानी।।
राणा मनाये ।।।

(रामेश्वरी )
कान्हा सा सांवला सलोना रूप ।
कोउन कोसे, कोउनों मन ये भाये ।।
अपने हिस्से की धूप सबहूँ पाए।।।
(रामेश्वरी )
जब से कह दिया,  आंसू बेशकीमती मोती होते हैं ।
आलम ये है अब दोस्तों, देने सौगात मोतियों की उन्हें, हर रोज हम रोते हैं।। रामेश्वरी 
ना करो नुमाईश खुद की, यहाँ कोई खुदा नहीं है ।
पंथ भिन्न हैं राही सुन ले, ऊपर वाला जुदा नहीं है।।
उठे हाथ ऊपर दुआ को, दो गज ज़मीं काफी यहीं है ।।। रामेश्वरी ...

आत्मसात करें।
सुगंध महकते पुष्पों की ।
करें संगत ।
इन मचलती पुरवाई की ।
समां ली है अब ।
मद्धम2 उठती सुगंध माटी की ।
बन जाऊं जी भर इंसान कुछ पल ।
जाने कौन ..
गला घोंट दे, इस इंसानियत की ।
आ गया समय अब ..
पुकार लूं नीलकंठ को।
जाने कौन इच्छा रखता  है आज भी ।
खुली हवाओं में  ज़हर मिलाने की।।।।।रामेश्वरी 

Thursday, October 25, 2012

तेरी बेरुखी से देख हम खाक भये , काजल बन गए।।।
इन नैनो पर अब फ़िदा हैं वो, मेरी मय्यत उठने के बाद।।।।।।।रामेश्वरी
किसी ने कहा कुछ भी हो लिख बयाँ किया करो।।।
आज वो खफा है क्यूँ फिर, बेवफा लिखने के बाद ।।। रामेश्वरी
बूँद2 ने भरा सागर, सागर में तन्हाई नहीं होती ।
तन्हाई का आलम पूछो, सीप में तनहा कैसा है मोती ।। रामेश्वरी ..

खून के रिश्ते ।
खून यूँ कर गए ।।
रंग डराता ।।।

रिश्ते हैं सस्ते ।
ये बेरंग हो गए ।।
घर सताता  ।।।

देख फरिश्ते ।
भाई2 यूँ कट गए ।।
धर्म डराता ।।।

द्वार दो रास्ते ।
रंग हीर, वो पीर।।
सूफी ये गाता ।।। रामेश्वरी 

Monday, October 15, 2012

क्या होगा इस देश का...


क्या होगा इस देश का...
भरोसा नहीं यहाँ  किसी भेष का ...

देशप्रेमी जहाँ देशद्रोही कहलाये जाएँ...
कालिख चेहरों पर हो जिनके...
श्वेत उनका भेष होगा...
सोच क्या उस  देश का होगा ?

चंद ईंटो के लिए भाई भाई में द्वेष होगा...
फर्क बस इतना होगा...
कुछ ईंटो में मंदिर लिखा होगा, कुछ में मस्जिद लिखा होगा..
बचा सिर्फ भट्टी में, खाक  ए इंसानियत शेष होगा......

सोयी है गहरी निन्द्रा प्रजा अभी..
नींद का थोड़ा समय अभी शेष होगा...
जाग जाओ मिटा दो तिमिर भीतर का ..
जनता का जल्द फिर क्रांति का उद्घोष होगा...

नवरात्र हैं...
अधर्म से फिर धर्म का कलेश होगा...
दस सर फेंको अपने धड से...
अहंकार मिटेगा,  जल कर भस्म होगा..
कुछ न फिर अवशेष होगा..


हर गली कूचे अब हिंसा बिखरी है...
एक भाई के हाथ तलवार, दूजे हाथ खुकरी है 
यकीं क्या होगा, आने वाली पीढ़ी को...
अहिंसा परम धर्म..
कभी इस देश का रहा सन्देश  होगा.....

रामेश्वरी .