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Saturday, March 31, 2012

पिता की प्रेमिका, बहु बनी, देखो आया ज़माना कैसा है?
बेटी का प्रेमी, पिता बना, रिश्तों में आया फेर ये कैसा है ?

गंगा बहे हरित वर्ण तन पर लिए, धूमिल वर्ण चढ़ा उस पर, फिर  ये कैसा है ?
नेक पार लगे डुबकी मार, पापी बैठा लिए एक तार, लगा ढेर पापियों का कैसा है?

आकाश भी अब पानी बरसाता नहीं, बरसाता वो आंसू नमकीन, ये नमक कैसा है?
शायद चाहता नहीं घाव भरे पापियों के, ईश्वर का विस्मय कारी न्याय ये कैसा है ?........

सुनी बालपन में, कहावत एक, अंधों में काना राजा भी होता है, पर ये ज़माना कैसा है?
अब कानी सोयी प्रजा पर, विराजता अँधा राजा है, वो ज़माना कैसा था, ये ज़माना कैसा है ?..............रामेश्वरी 

आंसू


अब कोई शिकवा और शिकायते नहीं...
वो जब जब हमारे आंसुओं पर हंस रहा है...
हम तो काट चुके गम की राह तक़रीबन पूरी अब...
पर उस नासमझ को मालूम नहीं, 
खुदा उसके नाम अभी, कुछ आंसू लिख रहा है.............रामेश्वरी 

कीमतों में उछाल..

कीमतों में आ रहा उछाल..
भूखे पेटों, में राशन का सवाल ..
एक बेटी के गरीब बाप पर दहेज़ का बवाल ..
पिस रहे चक्की एक, छूटा धर्म जाति का सवाल ..
जनता का फिर से एक ही सवाल ?
इसमें दोष किसका है ?

कोई नहीं किसी के साथ ..
पनप रहा हर ह्रदय एक अवसाद..
छोटी सी बात पर उठ रहे हाथ ..
जनता का फिर से एक ही सवाल ?
इंसान और जानवर में फर्क कहाँ है?
इस फसाद की जड़ कहाँ है...
ये बोया गया बीज किसका है?

मुस्किल में हर जान..
थकी२ सी रूहें हैं, भटक रहे सभी परेशान..
जुगाड़ करें कैसे अब,  रखें कैसे झूठी शान ..
किस्तों में जी रहे, बस किश्तें ही चुका रहे...
इन किश्तों का असल मुंशी कौन ?
अपने ही असल पर ब्याज हम चुका रहे...
जनता का फिर से एक ही सवाल ?
किस जन्म कर्ज ये, ये उधार किसका है?...........रामेश्वरी 



Friday, March 30, 2012

आज छुट्टी है स्कूल की..
सजा ना देना दोस्तों जो भी भूल की...
चलो मस्ती से खेलेंगे खेल कई..
इक बारी मेरी होगी, इक बारी तेरी की...
लड़ेंगे नहीं मम्मियों को लड़ने दो..
आज घर घर, कल खो खो होगा...
मैं बनूंगी मम्मी सबकी, 
सबको बच्चा बनना होगा...
यूँ ही खेलते२ छुट्टी बिताएंगे...
दो दिन अब किताबों को..
हाथ नहीं हम लगायेंगे ...
आज नहीं लड़ेंगे अभी हम बच्चे हैं..
धर्म जाति से अभी अक्ल के कच्चे हैं..
कभी गुरूद्वारे लंगर, कभी छीन कर चीज खायेंगे...
आओ कवी, उषा, आनंदी, फिर ये दिन चले जायेंगे...रामेश्वरी 
बनाओ मिजाज़ अपना भी, उस बहते दरिया की तरह...
मीलों चलकर मिले जो सागर से, आंसू भी दिखे ना उसके पानी में मिलकर .............रामेश्वरी 

Thursday, March 29, 2012


दो कदम चलना था, इस दिल से उस दिल की राह पर ...
वो इतरा रहा, बैठ अकेले चमचमाती लखपति टकटकिया पर .

दो गज ज़मीन चाहिए,  चैन सुकून से सोने को......
वो सोता नहीं, भटकता बहुमंजीले हवाई महल बना2..

बेदर्द मत फूंक इस आशियाने को, समझ किसी गैर का आशियाना...
गर इस आशियाने में मेहमां तेरा कोई अपना हुआ, मुश्किल होगा फिर बुझाना इसका..
वो पूछते हैं, बार२ राज हमारी खूबसूरती का...
पर तराशा है हमें,  वक़्त के पड़ते थपेड़ों ने....

अनछुआ और जब तक पढ़ा नहीं..
तो कीमत बरकरार है...
जिस पल पढ़ लिए तमाम लफ्ज उसके...
पड़ा ढेर कबाड़ी के द्वार है...
हर लफ्ज इसीलिए बयाँ ना करो...
बंद किताब जब तलक, कीमत तभी 
तोडती उपयोगिता ह्रास नियम पार है...........रामेश्वरी 

Wednesday, March 28, 2012


अपने वजूद से कलम कर कलम लगायी थी..
सींचा उसे पल पल लहू से अपने हमने...
महका गुलाब तो, जग पूछता गुरुर भर ...
बता ये गुल-ऐ- गुलाब किसका है?..............रामेश्वरी 

हर मौसम यहाँ से आया और गया ...
अंकुरित हुआ नहीं बीज अभी तक..
प्यासी धरा,  तृप्त हुई क्यूँ नहीं?
क्यूँ हर मौसम, यूँ ही ऊपर से गुजर गया..
क्यूँ कलेजा इस धरा का, दो बूँद पानी को..
पपीहे समान, प्यासा तकता ही रह गया ?...........रामेश्वरी 

समय

हर चीज जो फिसले हथेलियों से...
रेत तो नहीं होती.......
होता है कभी२ तकाजा वक़्त का भी..
हाथ आकर भी ठहरा नहीं..........

आम आदमी

आम आदमी को देख..
आम भी यूँ बोला है..
बोल, तुझे हर वक़्त नाम से..
मेरे क्यूँ तोला है...
तू क्यूँ इतना बड़बोला है..
स्वाद तेरे सब मटियामेल हैं..
खुद को आज भी मुझ से तू..
क्यूँ तोलता है...
बोल आम मैं हूँ, और आम ..
खुद को तू क्यूँ बोलता है......
देख मैं सड़क किनारे टंगा ..
फिर भी रसीला हूँ..
इतनी जल्दी हार मान ..
मैं पिलपिलाता नहीं..
महंगाई से तेरा हर स्वाद फीका है..
तू तो अभी से पिलपिलाया है ...
हर वक़्त तेश में रहता..
इतना तिलमिलाया है ...
बोल अब..अपने आगे मेरा नाम..
आम क्यूँ लगाया है?..............(रामेश्वरी)


नन्हे चूजे से मैं चिड़ियाँ बनी...
फैला पर, उडी घौसले से मैं ....
है अस्तित्व की लड़ाई फलक पर भी ...
विशाल पंछियों की तिरछी नज़र वहां भी है ....
या शक्ति दो बचाने अस्तित्व अपना...
या कोई नया खुला नीला आसमान बनाने दो मुझे.......
उनके स्वप्निल आँगन में...
अस्तित्व की भूमि पर ...
स्नेह के कण कण में...
ये पंख बिखरे किसके हैं ?
उनके आँगन इतनी ऊँची उड़ान ..
सिर्फ हम ही भरा करते थे..........
ज़हन की हवेली में मेरी..
यादों की तिजोरी सजी थी..
यदाकदा भरी रहती वो..
बेशकीमती यादों से मेरी...
यथार्थ से ठोकर मार
सजा के नगीने आंसुओं के ...
इन्हें तराशा जिसने ....
देखो आज वही इन्हें भी .
चुराना चाहता है ज़हन से मेरी.....
सरहद पार ..
रोज सुबह हुई..
शाम हुई...
सूरज उगा ..
ढला भी..
धरती मेरे गांव की..
ऐसी भई...
जहाँ हर पल ...
घनी रात भई....
उस रूठे २ सूरज को..
इस धरती पर..
अब मैं.
मना कर लाऊँ कैसे ?.....

महंगाई आई है..

जब से हर रसोई में महंगाई आई है...
भाई भाई के प्यार में स्वार्थ की रेखा ..
खिंची सी पायी है...
अब भोजन कम, हर रिश्ता ज्यादा भुनाया जाता है...
हर वक़्त के भोजन में, इक रिश्ता पकाया जाता है...
हर बहिन अब रोती है, राखी भी रिश्तों का वज़न  ढोती है..
अब भाई भी राखी से कतराता है, हर बरस जब रक्षा बंधन ..
पर्व समय से आता है...
अब तो महंगाई का तकाजा इतना है...
लाश सस्ती, कफ़न महंगा ..
हर इक शख्स के कंधे जनाज़ा खुद उसका है....रामेश्वरी 
झूठ कह्ते२ वो सदियों तक सच बन जाता है..
सच बन फुसफुसाहट कान के नीचे से निकल जाता है..

यादें

यह यादें भी जाने क्यूँ ..
बिन बुलाये मेहमान सी...
लौट2 कर ज़ेहन में आती हैं...
ये ज़ेहन बड़ा निज़ी है...
इसके खाली होने का इश्तेहार ...
हमने कहीं बंटवाया नहीं.........
मनाया बहुत यादों को..
ज़ेहन में बसेरा वैसे ही बहुत है..
ज़िन्दगी की कशमकश का...
तुम आ२ कर क्यूँ ज़ेहन की नींव ..
जड़ से कुरेदा करती हो..............
खोखला हो ढह ना जाए कहीं...
आशियाँ उम्मीदों का..................
हर जगह सजी दुकाने...
बोली अलग२ सीखने की...
हर बोली की कीमत सजी भाई...
एक गुरु ढूँढो, प्रेम की बोली का..
कठिन इतनी, गुरु भी करेला भाई.....
हर वर्ष बजट आये जाए ..
हमें कोई दरकरार नहीं....
क्यूंकि हमारी उड़ान को..
किसी इंधन से सरोकार नहीं.........

महंगाई

कौन जालिम कहता है..
महंगाई डायन हुआ करती है..
यह वो समझदार नागिन है...दोस्तों..
छोड़ हर दौलतमंद का पहलू ...
हर आम आदमी को ही डसा करती है....रामेश्वरी
कंक्रीट के जंगलों में..
इक जीव ऐसा पाया जाता है...
जो लुप्त प्राणी तो नहीं...
पर चुनावों पर बड़ा कीमत बनाया जाता है....
दवा महंगी दारु सस्ती है उसके लिए..
लीपा पोती का दाम सस्ता कर..
कभी बीच सड़क, कभी पार्टी में चेहरा..
 उसका रंगा जाता है..
नमक सस्ता कर जैसे घावों पर छिड़का जाता है...
अब मरने भी नहीं देते, जिन्दा हैं वोट के लिए ..
जब तेल, ज़हर, पंखा, दवा महंगी कर ..
उन्हें जिंदा रखा जाता है..
बस कूदो अब ऊंचाई से...
तंग हो गर महंगाई से...

रामेश्वरी...

Monday, March 5, 2012

मौसम और ज़िन्दगी

जो अहंकार चेहरे और तन मन पर ओड़े बैठे थे..
क्या मालूम है उन्हें, होगा ऐसा भी...
मौसम रूख बदलेगा, आएँगी गर्मियां कभी..

वो ये सोच कर, लम्बे सफ़र पर निकले थे ..
हाथ होगा उनका, उनके हाथ, 
साया तो साथ देता नहीं, होता ऐसा भी..
सूखे थे नैन सुख से जिनके...
वहां बरसेगा सावन बेमौसम  का ..
होगा दरिया दोनों के दरमियाँ कभी...

वो कूद तो पड़े दरिया में..
सोच पार होगी दुनिया की तंग गली...
क्या मालूम था, पी जाएगा इक घूंट में..
सागर वो दरिया भी कभी................

वो खुश थे झूठ पर अपने सभी..
बहार है सदा के लिए, अबके आई जो कभी..
यौवन का नशा चढ़ा है उन पर भी...
अहंकार औलाद पर उनको सभी..
द्वार खुले आंगन के सभी, पतझड़ आएगा ना कभी..

आज दूर है वो अपनों से सभी..
हवा दे रहा वो,  सुखो को सभी...
ज्यादा हवा ना दो, उड़  जायेंगे सभी..
गम की रेत भी, संग हवा आ जाये कभी...
अपनों की याद गर आने लगे ..
नब्ज उदास से लगी, ठंडी सी लगे..
समझो फिर से सर्दियां आ गयीं.....................रामेश्वरी 











लफ्ज

चंद लफ्जों ने  ही इतिहास रचे..
लफ्ज ही बनाये ग्रन्थ कई ...
चंद लफ्जों ने महाभारत रची ..
लफ्जों से ही ईमारत खड़ी ..
चंद लफ्ज ही ढहा देते घर कई...
लफ्जों से किसी ने आत्मीयता पायी..
लफ्जों ने करे ख्वाब कितने धराशायी....रामेश्वरी 

नियम ..

देख नियम तोडना हमारा..
गर खुदा, खुद नियम से मुहं 
मोड़ गया..
हाय खुदा, फिर तो बस क़यामत होगी..
ज़िन्दगी बुड़ापे से शुरू, जन्म पर ख़तम होगी .
स्वर्ग नसीब होगा , हर पापियों को...
नेक आत्माएं, नरक में पूरियां तल रही होंगी... 
करम के फल लगेंगे फिर पेड़ों पर .........
मीठे फल झडेंगे आसमान से, 

भगवान होंगे फिरघर घर सबके, 
इंसान भगवान बन, खुद भगवान के नियम ..
तोड़ रहा होगा..........

नियम तोड़ पाती

काश मैं भी सारे नियम तोड़ पाती ..
मौंत किसी के भी अपनों की ना होती, 
अपने प्यारे पापा धरती पर लौटा लाती..
समय की सुइयां भी उल्टा घुमा पाती ..
फिर से अपने बचपन, मैं लौट जाती...
सुख हर पेड़ पर उगता, मैं तोड़ सुख..
हर दुखी इंसान की झोली डाल आती ..
पंख अपने लगा खुद, सारा आकाश ...
खुद में समां पाती .........
तोड़ तारे आसमां से, सवांरती रूप अपना ..
चाँद तोड़ बना बिंदिया माथे अपने सजाती ..
खुदा भी रश्क खाते हमसे, 

खुदा की खुदाई चुरा लाती........रामेश्वरी
देख आईना, मैं माँगू तुझसे पहचान अपनी ......
तू चेहरा प्रियतम का क्यूँ दिखाता है मुझे...
जब जब देखा तेरी ओर, डार नज़रों पर जोर ..
निहारा तालाब भी, लगा ज्यूँ उसे भी ना सूझे ..
वो भी पलभर दिखा छवि मेरी, आई लहर ..
जाते जाते चेहरा उन्ही का दिखा गया ..........रामेश्वरीa
देख आईना, मैं माँगू तुझसे पहचान अपनी ......
तू चेहरा प्रियतम का क्यूँ दिखाता है मुझे...
जब जब देखा तेरी ओर, डार नज़रों पर जोर ..
निहारा तालाब भी, लगा ज्यूँ उसे भी ना सूझे ..
वो भी पलभर दिखा छवि मेरी, आई लहर ..
जाते जाते चेहरा उन्ही का दिखा गया ..........रामेश्वरी
न जाऊं में सजन मिलन तोसे, जमुना के तीर...
बैठे वहां ग्वालों संग, बरगद तले, मेरे बड़े बीर ...
खनक कर पायल, जाता देगी, दिल का हाल मेरा..
पूछेंगे समग्र ग्वाले, काहे सोलह श्रृंगार है मेरा ..
जाऊं छुप२ मिलन पिया जो, निशाँ मेहंदी राह छोर आएगी ..
निगोड़ी कुमकुम बिंदिया, गालों पर निशाँ उसके जोड़ आएगी 
मेहंदी में रंगत तेरी, चूड़ियों मैं झंकार तेरी है ..
बिंदिया की कुमकुम, पायल की छुम छुम तेरी है ..

तुझ से ही दुल्हन में, मेरा सोलह श्रृंगार तुझी से है..
श्वेत से दामन पर मेरे, धवल रंग रंगा तुझी से है ..

गालों पर गुलाबी रंगत, छूँअन से आई तेरे है ..
प्रियतम देखो,टिमतिमाते तारों के डारे हमने फेरे है .........

लटों पर मेरी, हीरे सी उज्जवल बूँदें सावन की नहीं ...
रोये फूट२ रति कामदेव भी, बिदाई पर मेरे हैं.....
माथे बिंदिया, हाथ कंगन , छम छम पायल क्सिके लिए 
मिटी रंगत मेहंदी की , कैसा ये अब सोलह श्रृंगार प्रिये ...
विरह अग्नि भस्म करे, रूप रंग मेरा, व्यर्थ तुझ बिन श्रृंगार प्रिये.......रामेश्वरी
आ रहा है फिर से ..
फागुन का त्यौहार ..
रंग हो इसमें बस प्रीत के..
डारो इक दूजे पर बस..
प्रेम की ही फूहार......
ना राग द्वेष ना नफरत ..
फले फुले ह्रदय में सभी के ..
हर्षो-उल्लास ..
दे रही धरती भी रंग पलाश ..
फिर क्यूँ हो क्रित्रिम रंग, ढंग..
प्राकृतिक विधि का अनुसार हो ..
प्यार से ओत प्रोत त्यौहार हो..............रामेश्वरी (गंदे रंगों का प्रयोग नहीं करें)
ज़िन्दगी की राहें अक्सर टेड़ी मेढ़ी होती हैं...
ज़िन्दगी घर आते आते रास्ता बदल देती है............रामेश्वरी
इन्तेहाँ हो गयी, तेरे इम्तिहान लेने की.....
अब तो इम्तिहान भी डरती है इम्तिहान लेने से..............रामेश्वरी

baanke bihari

तुम कहे जाते हर पल, बिहारी ..
श्रम से तुम्हारे, दुनिया है हारी..
हैरान हूँ देख, क्यूँ परेशां दुनिया तुमसे ..
देखि हर पल मुस्कुराती सूरत तुम्हारी ..
जैसे हर परेशानी भी तुमसे है हारी ..
हम भूल गए मुस्कुराना, महंगाई की मार से ..
बैठे तुम आज भी, संग साथियों के इक तार से ..
सुबह होती ऊँची हंसी से तुम्हारी ..
व्यर्थ ये सुइयां घड़ी की हमारी ...
खिलखिला कर मोहल्ला जगाते तुम..
जिंदादिली से ह्रदय मेरे सम्मान पाते तुम..
फिर भी जाने क्यूँ ईश्वर, इन्हें दुत्क्कारते तुम..
इक पल को नारी भी थक हार जाती है..
कह देती हिम्मत नहीं आज रसोई की हमारी है..
जोड़ने तिनका२ घरोंदे का, इक इक सिक्का बचाते तुम..
थकान भूल इस तन मन की, रसोई खुद बनाते तुम..
यह ढृढ़-इच्छाशक्ति कहाँ से पाते तुम..
तंग कमरों में. खुले हृदय द्वार हैं तुम्हारे ..
(रामेश्वरी)
(मैं बिहार के निवासियों को इतना खुश देखकर बहुत हैरान होती हूँ कभी२, कि उसी दुनिया में हम रहते हैं और वह भी उसी दुनिया में हैं...पर वो इतने खुश क्यूँ रहते हैं)

होली है

फागुन आया है ...
होली है होली है..
यही प्रेम की हंसी है..
यही प्रेम की ठिठोली है..
सभी हंसी ठिठोली माफ़ ..
आज होली है .....


रंगों से सरोबार, आ रही ..
होलियारों की टोली है ..
हर तरफ रंग है गुलाल है .
पीछे२ नर आगे आगे नारियां हैं ..
नन्हे हाथों में चल रहीं..
पिचकारियाँ हैं..


झाँकू झरोखे से निहारने ..
होली की हुडदंग ..
सफ़ेद चुनर मेरी, बिन रंगरेज ..
रंगी इतने रंग...


श्वेत स्याम वर्ण समान भये ..
आज हर गोरी राधा लगे,
हर युवा कान्हा भये ..
प्रकृति भी आतुर खेलने होली..
पलाश से लाल, सरसों से पीली..
वो भी बौराई है..
तोड़ सीमाए लाज की ..
सभी ने भंग आज चढ़ाई है..
बुरा ना मानो होली आई है................रामेश्वरी

Thursday, March 1, 2012

विरह

सावन आया, सावन गया..
यह बंजर ह्रदय, मेरा देख सखी..
कोई बसन्त इसमें क्यूँ ना भया.......

गिरी जब जब बूँदें सावन की...
सबका हृदय शीतल कोमल भया ..
तड़पी जली विरह अगन, अभागन ऐसी ..
शीतल बूँदें बदन छूए ज्यूं, जैसे अंगार भया ......रामेश्वरी

प्रेम


दिल की कलम //
स्नेह की स्याही ///
पत्र बनूँ तुम्हारी मैं///
रचूँ ग्रन्थ प्रेम का ///
प्रेम हर ह्रदय समाहीं ///

दिल मेरा घरोंदा तेरा ///
जब चाहो बसेरा करो ///
चाहे करो रजनी का डेरा ///
चाहे इसमें तुम सवेरा करो ///
बस अब, मेरा बस कुछ नाहीं ///

दिल इक किताब //
तुम उसके अल्फाज ///
मैं बन जाऊंगी रागिनी //
तुम इस रागिनी के साज ///
बजे मधुर प्रेम गीत का राग ///( रामेश्वरी)