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Monday, September 23, 2019

फिर लौट जाना चाहती हूँ,
जिन्दा लोगों की बस्ती में | 
 भय है डूब जाने काछिद्र बहुत है मेरी कश्ती में ||  रामेश्वरी 

Sunday, October 7, 2018

दिल की कसक

कल ही मन हुआ तो अपने मनपसंदीदा कलाकार बलराज साहनी जी की काफी प्रसिद्ध फिल्म काबुलीवाला देखि...मैंने बचपन से कई बच्चों को गोद में खिलाया पर जैसे मीना युवावस्था में काबुलीवाले को भूल जाती है वैसे ही वो बच्चे आज मुझे भूल चुके हैं | पर फिल्म का अंत आते२ आँखों में आंसू और एक नन्हे बच्चे की तस्वीर थी| जिस तरह मीणा काबुलीवाला के लिए प्रिय थी उसी तरह मुझे स्कूल दिनों में उस नन्हे बच्चे से बहुत स्नेह था | दिन भर उसे गोद में खिलाना, वो बोलना भी तीन वर्ष की आयु तक नहीं सीख पाया था उसे दिलरुबा कहकर चिड़ाना और उसे बोलना सीखाना जैसे मेरा उद्देश्य था | लिखते वक़्त भी आंसू है पर याद भी है उसकी | कई लोग कहते मत खिलाया कर इतना पराया बच्चा है कुछ हुआ तो तुझ पर आरोप प्रत्यारोप लगेंगे | एक बार वह मेरे साथ खेल रहा था वो घर जाकर उल्टियां करने लगा में लोगों की बातों से डर कर पांडेय भाभी जी से कहने लगी भाभी मैंने इससे कुछ नहीं खिलाया जाने क्यों कर रहा है पर भाभी ने मुझ पर मुझ से ज्यादा विश्वास रखा और कहा कोई बात नहीं डर क्यों रही हो ठीक हो जाएगा | उसके ठीक होने पर जान में जान आयी | मैंने बहुत छोटी शायद सात साल की उम्र थी तब से अपने भतीजा भतीजियों की देख रेख की थी | उनसे वो सम्मान नहीं मिला जो उस बच्चे ने मुझे दिया, एक दिन वो कितना बड़ा हुआ कैसा दिखता होगा, जिज्ञासावश, जानने हेतु, विवाह उपरान्त उसके घर अचानक धमक सी पड़ी | जैसे ही दरवाजे पर आहट की तुरंत वही नन्हा मेरे समक्ष खड़ा था और बिना भाभी के बताये उसने तुरंत कहा " आप ही वो बुआ हो जिन्होंने मुझे बोलना सिखाया था " यह शब्द जैसे मेरे सीने में गड़े से रह गए आज तक | आज वो नवयुवक बन चूका होगा क्या मैं आज भी उसकी यादों में हूँगी ? खुदा जाने पर मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे ऊपर रहेगा मेरे वही नन्हे भतीजे गगन पांडेय उर्फ़ गुगु पांडेय (इलाहाबाद )#Gagan Pandey

Monday, January 29, 2018

आईना और आदमी
एक दूजे को निहारते |
खूबसूरत आदमी |
आईना बदरंग चेहरा | 
कौन उपटन
लगाए आदमी |
पोंछ पोँछ थका आईना |
आदमी सूखा चूका
आँखों में नमी |

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फिर की है कोशिश
गुलाब उगाने की |
बस काँटों तुम सच्चे
दोस्त बन पाओ

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देख इंसानी सोच, काश गजब हो जाए |
रास्ता, खुद रास्ता बदलना सीख जाए |

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राहें भी अब,
इंसानो से परहेज,
करने लगी हैं |
देखते ही साया,
भीड़ बने इंसानो का,
अपनी ही राह बदलने,
लगी हैं ||
डरी हैं..
सहमी हैं |
होली बेमौसम,
होने लगी है ||
जानें कौन सा
साया आ जाए |
मेरे रुखसारों पर रक्तरंजित
गुलाल बहा जाए |

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अपने ही कांधे,
शव अपना लादे चले हैं |
उसपे अफवाह ये है,
कि, ज़िंदा है आदमी || 

Friday, April 7, 2017


तराश कर पत्थरों से,  ज़िंदा बोलते बूत बनाये गए |
बूत बन,  गूंगे इंसानो ने,  खुद को पत्थर साबित किया || 

Tuesday, July 14, 2015

हे अतिथि ! ना खोजो । ना खोजो, मेरा गांव ॥

फिर छत की मुंडेर 
काक करें है कांव । 
इस कलयुग दौर में 
ना खोजो मेरा गांव ॥ 

ना  गंगा इतनी 
पावन रही । 
ना सागर में ठहराव । 
काठ भी फफूंद रखे 
देख अपना चाव । 
 देख महंगाई
काँप रही  
मेरी टूटी नाव । 
हे अतिथि !
ना खोजो  । 
ना खोजो,  मेरा गांव ॥ (रामेश्वरी )

Saturday, May 2, 2015

फिर खिले हैं 
 इस बार 
 अनेको स्वेत पुष्प 
 पहाड़ों में । 
 शायद मौन समझौता 
 हुआ
 प्रकृति, मानव बीच 
जाड़ों में । 




क्यों क्रोधित ज्वलित है 
दुल्हन । 
क्यों सीना चीर 
 रक्त बहा 
नदी नालों में । 
सुना हमने 
ग्रहण लगा 
कहारों में । रामेश्वरी