Search My Blog

Friday, December 30, 2011

a few line i wrote for my rameshwari ji ,


ये कैसा जीवन का आगाज प्रिये , 
बंजर धरती पर पहली पावस की बूँद ज्यों करती है नवजीवन का संचार प्रिये 
देखा तुम्हे जब मन मोहिनी , ह्रदय में अंकुर फूटे , हुए प्रेम में अभिसार प्रिये 
तुम्हे भी होगा इसका अहसास मृदु भासिनी ? सुहासिनी ?
मृद होठो की हंसी पीड़ित ह्रदय की आस हुई , नव्योवना तुम अपना आराध्य हुई , 
राग रंग , वसंत तुम मेरा , ह्रदय के वीणा के तारों की तुम झंकार हुई , 
अब सुध नहीं , बैरन दुनिया सही, तुम ही हो अपना संसार प्रिये , 
क्या होगा तुम्हे भी यह अहसास प्रिये ?
इधर अपना सर्वस्व समर्पण , इस मिटटी पर है तुम्हारा अधिकार प्रिये , 
जीवन दो इस प्रेम लता को , होगा बड़ा उपकार प्रिये , 
साँसे थमती है , दर्शन दो , कैसे तुम बिन जाना होगा उस पार प्रिये 

थैंक्स दीपक अनसूया

मैं सहरा तू सागर.... 
तू नदिया मैं गागर...
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
तुझमे मैं समाऊँ तो कैसे ?.....
मैं इक छोटी चिंगारी..
तू विशाल आसमां ....
इतने तारों में...
अब बता तू ही ऐ-खुदा...
जगह बनाऊं तो बनाऊं कैसे...?
मैं श्रृंगार, तू माला है मोती भरा हार...
श्रृंगार करूं कैसे.....
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
तेरी माला मैं अपनी चमक पाऊँ कैसे?
मैं फूल तू बाग़ है भरा फूलों का....
काँटों  भरा.....
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
इन काँटों से दामन अपना बचाऊँ कैसे?
मैं किनारा तू दरिया........
साथ२ बहूँ तेरे...
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
महासागर से तेरा मिलन करूं कैसे?
मैं साध्हिका तू बने अपने को खुदा ..
अब बता तू ही ऐ- खुदा .
इस अहंकारी के आगे मस्तक झुकाऊँ कैसे?........
मैं सूखी झाड, तू बेला ऐ बहार ...
इस सूखे गुलशन में..
अब बता तू ही ऐ- खुदा ....
मैं भी बेला ऐ बहार खिलाऊँ कैसे?
मैं ईमान तू ईमान की दूकान ...
इस बेरहम दुनिया में..
अब बता तू ही ऐ- खुदा ....
अपना ईमान बिकाऊँ  किसे?
मैं सत्या तू असत्य  ...
दबाना चाहे आवाज़ हर असत्य  मेरी ...
अब बता तू ही ऐ- खुदा ....
गला दबा मेरा.....
सत्य क्या है का शोर मचाऊँ कैसे ?
.(रामेश्वरी )

Sunday, December 25, 2011


संसार के सारे बंधन तोड़...
मिले हैं जब हम तुम..
अब कैसे कहते हो..?...
आओ इक बंधन में...
इक रिश्ते में बंध जाएँ हम ....


प्यार के दरिया के नाविक हैं हम...
अब कैसे कहते हो..?...
इस नाव को पार भी लगाएं हम....


प्यार एक  आग का दरिया है..
जल जल ही इसे  पाते हैं..
अब कैसे कहते हो?
दामन इस जवाला से बचाएं हम.....


ये कनक है वो..
जो अग्नि से गल गल निखरा है..
ये इश्वर के पसीने की ओंस है..
जो हम सभी में भरने को ...
इश्वर ने इस धरा पर बिखेरा है.....
अब कैसे कहते हो?
इस धरा पर,  ओंस पर पैदल ...
न चला करें हम...............रामेश्वरी 

Thursday, December 22, 2011

अक्सर ऐसा होता है...
भीड़ में, मेले में......
कोई अपना ही खोता है...
हम रोये जब जब अपनों के लिए..
बेदर्द ज़माना बड़े चैन से सोता है......रामेश्वरी
बेईमानी के युग में ..
इमानदारी की बातें.....
क्यूँ करते हो तुम ?

पतझड़ में झड़े पात पात..
तुम उसमे सावन लाने की बातें..]
दुनिया बदल दोगे तुम....ऐसी बातें 
क्यूँ करते हो तुम ?

जब सब हो कौरव युद्ध स्थल में...
इस युग में मुझे पांडव बनने की बातें ..
क्यूँ करते हो तुम ?

अंधेर नगरी चौपट राजा है..
उस पर हमें आँखें देने की बातें ...
क्यों करते हो तुम ?

चोर चोर मौसेरे भाई ...
उस पर मुझे भी मौसी बनाने की बातें..
क्यूँ करते हो तुम ?

सब अपना पेट भर रहे..
तिजौरी अपनी भरे हैं.....
मुझे करण. बनू मैं की बातें ...
क्यूँ करते हो तुम?

बह रही दरिया जब..
सब हाथ अपने धो रहे...
इस युग में मैले हाथ ...
क्यूँ करते हो तुम?..................रामेश्वरी 

Wednesday, December 21, 2011

कितनी अजीब सी बात है...
आंसू पानी हैं पर, पानी 
आंसू नहीं.......

पानी दरिया को किनारा नसीब है...
मेरे आंसुओं का  देखो कोई किनारा नहीं...
जो साथ बैठे किनारों के..
वो किनारे ही रह गए...
जो हमराज हमराही बने..
वो दरिया के साथ बहते ...
मंजिल तक पहुँच गए...रामेश्वरी...
KEEP FLOWING FRIENDS ....

जो बहते हैं वही अपनी गंदगी किनारे करते जाते हैं...
जो ठहरे रहे वो कीचड बन गंद खुद में समां जाते हैं...
लोगो के निकट उजाला दोपहर का...
मेरे करीब अँधियारा क्यूँ पहर का..

आगे सभी के मय है..
मदिरा के प्याले हैं..
मेरे आगे हलाहल ...?
हलाहल के प्याला क्यूँ ?

शायद सजा है सच बोलने की...
मीरा बन कृष्ण को पूजने की...
झूठ मदमस्त रहे....
साजिश ये हुकमरानो की ..
जमूरियत नाचे जमूरा अँधेरे में..
मदारी बन नचाने की......रामेश्वरी ......
दुआ करें हम...
दुआओं में उठे दो हाथ खाली ना रहे...
दुआ करें हम...
दुआओं के लिए उठे फिर खाली वही दो हाथ....रामेश्वरी
लम्बी लम्बी सर्द रातों में..
रातें कटी बातों बातों में ..

संगीत सुना रहे किटकिटाते दन्त..
नृत्य करती अँगुलियों का नहीं अंत..
गालों में देखो कैसी बिना लाली के लाली है..
ये सर्दियां बड़ी सर्द, जालिम, मतवाली है...

बिना संगीत बजे...शरीर कांपे, करे रोक एंड रोल है...
जला कर सब अंगीठियां, घेरा बनाये बैठे सब गोल हैं..

बिना मिर्ची डाल जीहवा में देखो श्श्शश्श की धुन है....
करें स्त्रियाँ आजकल कैसे स्वेअटर की उधेड़ बुन हैं...

आजकल दिवाकर भी बदलियों से इश्क फरमा रहे..
देख देख बदलियों की चालें दिवाकर भी शरमा रहे..

धन्यवाद भी देना चाहूं तुझे ऐ सर्दी...
जो लड़ते अलग2अब इक ही रजाई में आराम फरमा रहे..

गरम जलेबी, गर्म मूंगफली, गर्म समोसे, गरमा गर्म चाय है..
फ़िदा थे कभी जिस आईस क्रीम पर अब कहाँ वो भाय हैं....

छत की मुंडेर देखो, कैसे भरी है महिलाओं की चुगलियों से...
अब हटते नहीं, उंगलियाँ चलती रहती बुनाई की सिलायिओं से...
कहते है इश्क रब है...
तो उसे दे फांसी लटकाया क्यूँ गया?

कहते हैं इश्क बेजुबान है...
उसका चर्चा गली गली उड़ाया क्यूँ गया?

कहते हैं इश्क हीर है राँझा है...
फिर उन्हें पठरों से मारा क्यूँ गया?

कहते है इश्क इबादत है..
इसकी इबादत से सबको फिर, दूर रखा क्यूँ गया?

कहते हैं इश्क में दिल इक मंदिर है...
फिर इसमें किसी देवता को क्यूँ बसाने ना दिया गया?

कहते हैं इश्क में अनारकली चिन्वायी गयी...
उस सच्चे प्यार को फिर दरो दिवार से रिहा क्यूँ ना किया गया?

कहते हैं सच्चा इश्क खुदा की नेमत है...
इस नेमत से हर किसी का रूख मोड़ा क्यूँ गया?.............

कहते हैं इश्क इक दरिया है ....
इसमें सच्चे आशिकों को फिर सोहनी महिवाल जैसे बहाया क्यूँ गया?..............रामेश्वरी

Friday, December 16, 2011

कडकडाती ठण्ड में..
पथ्हर का सिरहाना ..
फुटपाथ का बिस्तर ...
मिटटी की रजाई ...
देखो कैसे मैंने सजाई ...
फिर भी सारा आसमा हम ख़ुशी2ओड़ते हैं..
सुबह फिर श्रम करने चुस्ती से दौड़ते हैं ....रामेश्वरी
बन्दों से अब बंदगी कहाँ होती है....
हाँ,  गंद हैं समाज का ...
गंदगी अब हर कोने में होती है...

पाप करने से डरता कौन है...
जब गंगा पावन अभी बहती है ....

पीने को लहू भाई का है अभी...
पीने वाले कहाँ अभी जल पीते हैं.....

इमानदारी शरमा रही समाज में..
जब छल कपटी खुले घूमते हैं.....रामेश्वरी 

Thursday, December 15, 2011

गर खादी ओड़ने से बने नेता..
मैं ओडू जुट ....
तुम कहो तो सच...
मैं कहूं तो झूठ....
घमंड है उन्हें अपने चाँद पर...
कोई हमारे चाँद को भी देखे...
उनका चाँद उनको अहंकार में आंके है...
हमारा चाँद भोलेपन से आकाश से हमें झांके है..
महफ़िल में सिर्फ रंगीन वही थे...
सब मसरूफ नशे में थे...
हमे पीने की ज़हमत ही नहीं..
वो तो सिर्फ ग़मगीन हम ही थे...रामेश्वरी
उड़ता धुंआ कहे मैं प्रतीक हूँ आजादी का...
उडती पतंग कहे मैं भी प्रतीक आज़ादी का...

फर्क कितना दोनों की आजादी में..
इक की आज़ादी छीनो तो दम घोट देती है..
दूजी की आज़ादी छीनो तो पतंग का वजूद नहीं रहता..
अनाथ बच्ची ने चाहा तन ढकना अपना..
माँगा उसने भीख में वस्त्र इक रईस से....
वो चादर भी क्या ठाकती उसमे छेद थे..
रईस की नीयत के भी खोलती वो कई भेद थे.....रामेश्वरी
क़तर दो पंख हमारे...
बांधो सीमायें आसमान में..
हम वो पंछी हैं नए पर उगायेंगे..
धरा तो धरा हम..........
अपने उड़ने को नया आसमां बनायेंगे
(रामेश्वरी)
मैं बल हूँ बला हूँ..हलाहल नहीं....
जलजला हूँ ..अबला अब नहीं मैं ..
गीता का सार हूँ मैं..
महाभारत के पद हूँ मैं..
द्रौपदी पर अब नहीं मैं ..
मैं अब सर्प दंड धारी हूँ..
सच्चाई से बंद गांधारी नहीं मैं.
अब मैं सीता नहीं अब मैं..
मंदोदरी भी नहीं....
जिसका लोहा दुनिया माने वो..
सुन्दर सी भारतीय परी हूँ मैं...
कुछ करने का, एवेरेस्ट पर चड़ने का ..
लावा जिसके ह्रदय में भरा ....वो
सौन्देर्यमुखी जवालामुखी हूँ मैं..
रोने से मेरे ये तू ना समझ...
कमजोर आहात हूँ मैं..
आहात तेरी कायरता से हूँ मैं..
दो जून रोटी को दांव ....
जिसने मेरा खेला है...
उस वक़्त तू दुशाशन था
अब कलयुगी पिता है तू...
अस्मिता पर लगे जो सवाल..
धरती दो कर दूं .वो सीता हूँ मैं....
चीरहरण जो हो मेरा...
नारायणी खुद हूँ मैं.........रामेश्वरी
हमने आशियाना बनाया वहीँ...
जहाँ आँगन में बड़ा सा पेड़ था...
अब कैसे किसी को कहें..
कि झांकते वो हमें रोशनदानो से...रामेश्वरी
कहा जलती लौ ने बुझती लौ से...
बोल और जलेगी....
खुद को तू और कितना छलेगी..
जली तू जिसके लिए अंतिम षण तक ..
देख आज वो फ़ेंक तेरी बुझी राख..
अब मुझे जलाए हैं..........रामेश्वरी
अर्थी पर माँ की...

जिसने किया था छलनी हृदय माँ का...
चडाने श्रधांजलि माँ को..
वो बन्दूक लाया था...

जिसने पायी ढेरों दुआएं माँ की...
वो भरा दुआओं से ...
खाली संदूक लाया था ..........रामेश्वरी

इन्द्र इसकी लटाओं में..
शिव इसकी जटाओं में..
सुंदर यह रति सी है...
छोटा रूप है या माँ दुर्गा का..
सरस्वती इसकी तोतली सी..
 बोली में......
पग इसके लक्ष्मी के हैं...
पावन अनसुइया ये..
काली का इसमें अंश है...
यह भी किसी का वंश है...
छोटी सी राधा ये कान्हा की..


अन्नपूर्णा यह अभी से है...
बचाओं इन्हें प्राथना ये सभी से है ...रामेश्वरी 

Tuesday, December 6, 2011

वो सब कुछ कह सुन कर कहते हैं, हम कुछ भी नहीं कहते....
वो सब बयाँ कर कहते हैं, हमारे पास लफ्ज नहीं रहते...
कभी तेज धूप बन रोज जो आँगन में मेरे खुला घुमा करते थे....
आज किसी और के दर दिवार पर ट्यूब लाईट बन लटके पड़े हैं..
जो बहानी पड़े वो हवा कि रवानगी नहीं..
जो लैला से ही हो वो दीवानगी दीवानगी नहीं...
जो भाव रहित सिर्फ शब्दों से भरी हो.जो ..
वो कहानी भी कहानी नहीं....
प्रेम सिर्फ प्रेमिका का हो जो...देश से ना हो..
वो प्रेम कहानी भी प्रेम कहानी नहीं....
भाई पर खंजर उठे जो..
दुश्मन संग कंधा मिले...
वो जवानी भी जवानी नहीं...
जैसे बिना ठण्ड धूप सुहानी नहीं..
बिना धूप हवा की शीतलता नहीं...
व्यर्थ ना करो ये जो ज़िन्दगी है..
बिना स्वार्थ भी कुछ करो दोस्तों..
बिना करम भी ज़िन्दगी जिंदगानी नहीं..

Monday, December 5, 2011

लेके सपने वो सुनहरे बड़े शहर आते हैं..
मधुर आकांशाओं के गीत वो गाते हैं...

सर्द बड़ी रातों में ठिठुरता तन लिए..
जीने की उमंग लगन वो मन में लिए...
चौराहों में सोये नज़र आते हैं....

सब्जी वाले भाई...ओ रिक्शे वाले भाई..
भाई भाई सब उसे पुकारे...
पर भाईचारा उससे कहाँ निभाते हैं..

आओ इतना सा ही भाईचारा निभाते हैं..
किसी ठिठूरती देह को इक कम्बल ओड़ाते हैं...

कभी लावारिस सा गाड़ी के नीचे..
कभी किसी पुलिया के नीचे..
रोज उसके चर्चे अखबार में नज़र आते हैं....

बड़े शहरों में बनाने आशियाना देखो ना...
कब ज़िन्दगी उनकी कट जाती है...
बने गर आशियाना ऐ खुदा तब उनकी उम्र ...
रहने उस आशियाने में कहा बच पाती है....