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Thursday, September 27, 2012

समीप सागर के खड़े हो...
गहराई मापना चाहते थे हम...
सागर है कि, हमें निगल बैठा...
और कहता रहा यही...
मापनी है गहराई प्रेम की..
तो ए आशिक पूरा डूब कर देख......रामेश्वरी
जब मन करा मर मिटे हम ...
पतंगा बन नूर में तेरी आ बैठे ...
रात भर का साथ रहा हमारा ..
पहल पहर खुद को राख बना बैठे ....रामेश्वरी

Wednesday, September 26, 2012

हर आएना दिखाता है तस्वीर सूरत की, चीर सीना आएना निहारा न कर ....
दिल की असल सूरत दिखा सके, ऐसा आएना ए खुदा तू भी इख्तियार कर.....रामेश्वरी

पात शाखाओं के, हवा के झोंकों से जो हिले..
हम समझ क़दमों की आहट तेरी,  जब निकले ...
बेसुध से कदम हर बार टकराए,  पत्थर दिल से...
तेरा दिल था नहीं, गली में हज़ार पडे दिल मिले ....
अब शायद चोट नाम ही हमारी ज़िन्दगी को मिले ...
रामेश्वरी 

Tuesday, September 25, 2012

अक्सर सुना है संगत का असर होता है..
धरती के करीब रहकर, सागर खारा क्यूँ..
बदलियों के आंसुओं से, मीठा दरिया क्यूँ ...
लिपट संग सर्प, चन्दन में इतनी महक क्यूँ..शु प्रभात रामेश्वरी
शब्द एक है..
एक उसकी भाषा है ..
पर भेद ज़मीन आसमान का है..
एक को सोने का पालना..
दूजे घर खून से लहूलूहान पालना है...
एक झूला कर सोने का पालना ..
देता सुकून की नींद है...
दूजा चीर कर शरीर, लगा मौत गले..
कारण............
वही संतान को अपनी पालना है...

हे इश्वर एक पालना तू भी रख...
इश्वर होने का फ़र्ज़ पालन कर ...
भूखे अधरों पर दो रोटी डाला कर....रामेश्वरी ....कई लोग रोज खून भरा खेल दर्शकों को दिखा कर अपने बच्चों के लिए दो जून की रोटी कम पाते हैं....
डोली से आई जब..
चाह सभी की..
उनकी खुशियों को ..
आसमान मिले..
स्वपन चकनाचूर होए ..
जब कन्या को ना आस ना मान मिले......रामेश्वरी
हैरान हूँ मैं, दो शख्स एक सी सोच अब रखने लगे हैं...
जब से दोनों बेवफाई का ख्याल दिल में रखने लगे हैं....रामेश्वरी
भीड़ में तन्हाई में...
दिल की रहनुमाई में ..
एक चेहरा अपना सा लगा है ..
लगता है प्यार अब ..
दोजख में भी मिलने लगा है ....रामेश्वरी
अनजाना शहर है, तो अनजाने ही बसर होंगे...
मुखौटे ओडे चल रहे, कुचे२ नफरत ए चेहरे हसर होंगे ...

प्यार खोजोगे कैसे काफिर, मुखौटे प्यार पर बेअसर होंगे ..
गली2बिकती नफरत है, दिलों में प्यार के पंछी बसर होंगे ..रामेश्वरी ...
पुन्य बंट रहे ..
अब तो पाप करने की छुट है ..
सुना है इस बार गंगा में पानी अटूट है ...रामेश्वरी ..गंगा माँ का आदर कीजिये उसे मैला न कीजिये...
आज फिर सोचा..
खींच आकाश को..
धरती पर पटक दूं...
रख लाखों तारे वो..
अपनी मुस्कान में ..
जैसे हमें जलाता है वो ..
जलती उल्काएं फ़ेंक..
दीपावली मनाता है वो ...रामेश्वरी

सांस लेना भी दूभर है अब

सांस लेना भी दूभर है अब...
रोक रखी है वर्षों से..
चहुँ और बू है ..
कहीं किसी नाले में ..
सड़ी गली लाशों की...
कहीं कोई अबला फूंकी गयी..
घून लगी कपासों सी...
कहीं धूंआ है हवा में ..
दंगे निगल गए, जले घर कई ..
मिटटी पलित हुई, जिंदा लाशो से ..

ह्रदय अक्सर पूछता मुझसे मेरा ..
बता अब कब सांस मिलेगी मुझे ....
कैसे जीवित रखूं तुझे......रामेश्वरी ..शु प्रभात सभी मित्रगनो को...
दर दर खायी हैं ठोकरें इतनी,  अब दर्द का असर नहीं होता...
ज़िन्दगी अब बंज़र बेजान हुई, इसमें खुदी का बसर नहीं होता....

Sunday, September 16, 2012

मेरी एक दोस्त के पिता का देहांत हुआ, मैं भी श्रद्धा सुमन अर्पित करने वहां गयी थी | मेरी दोस्त बहुत दुखी थी, वो चुपचाप एक कोने में बैठी रो रही थी |   उसके परिवारजन और सगे सम्बन्धी भी वहीँ शोकाकुल अवस्था में थे |   मैंने अपने दोस्त की आँखों में न भरने वाला जख्म देखा और महसूस किया जो उसके पिता की मृत्यु से उसे मिला | वो अपने पिता से बहुत स्नेह रखती थी उसके लिए वही उसकी माता भी थी |  पर तभी उसकी बड़ी बहिन आई और जोर जोर से चिल्ला कर रोने लगी, सारा घर उसने सर पर उठा लिया |  वो ये शोर तब तक मचाती रही जब तक अर्थी को अंतिम संस्कार के लिए नहीं उठाया गया|  लोग कहने लगे देखो कितना प्यार स्नेह रखती है अपने पिता से|   क्या शोर मचाना चिल्ला२ कर रोना ही सच्चा स्नेह का प्रतीक था, मेरी दोस्त जो आज तक वो हादसा भुला नहीं पायी, उसका स्नेह कम था| उस दिन यकीन हुआ वाकई ज़माना दिखावे का है जब कुछ ही पल बाद वो हंस रही थी  और शमशान घाट  से सम्बन्धियों का इंतेज़ार किये अपने घर लौट गयी |  ......रामेश्वरी 
बांटे प्रसाद ...
मार बालक लात ...
कैसा ये धर्म .....
रूठे हैं भगवान् ..

पूजा पाथर ..
पूजा बाल हृदय ?
क्या भक्ति मर्म ?
ओढ़ी डोंगी चादर .
भरा पाप सागर ..

रामेश्वरी
ये दौर है मजहब और मतलब का..
क्यूँ मोहब्बत की उम्मीद लगाते हो....
ये वो ख्वाब हैं, जो पूरे न होंगे कभी...
कोई न पोछेगा आंसू तेरे, मत बहा..
क्यूँ इन्हें खवाबों की दुनिया में बहाते हो ......रामेश्वरी

Thursday, September 13, 2012

जो मैं रंग्रेजन बन पाती .

काश जो मैं रंगरेजन होती...
ये हथेलियाँ, दुःख भरे जीवन को...
रंगने में तेज न होती ?..
रंग पाती अंधेरों को ..
मद्धम पड़ चुके स्वप्नों को ..
वो इन्द्र धनुष जो जाता था ..
मेरे ह्रदय से तेरे ह्रदय तक..
फीका अब पड़ चुका ..
रंग भर पाती उस क्षितिज को ..
जो माध्यम था मिलन का हमारा...

अब तो समग्र रंग एक हो ..
ह्रदय पर धूल कालिख भरी बन चुके हैं .....
काश उमंग का रंग भर पाती..
जो मैं रंग्रेजन बन पाती ........रामेश्वरी....

एक सिरा

एक सिरा तुम्हारे हाथ..
एक सिरा मेरे साथ साथ ...
लहराते रहे दोनों सिरे हम .
लहराती पवन में ..
फिर भी देखो...
ह्रदय है कि गिला सिला सा पड़ा है .....
जैसे रूठा सा है वो धूप से..रामेश्वरी

Tuesday, September 11, 2012

क्यूँ खड़ी की इमारत इतनी ऊँची अपने हृदय तूने ..
ताउम्र बीत गयी मेरी, सीढियां लाँघ तुझ तक आने में  ...
मखौल उड़ाते हैं संगी साथी मेरे, बोले क्या किया तूने.?
कहते हैं इबादत को यही इमारत मिली तुझे ज़माने में ....
रामेश्वरी 
कड़ी धूप, हाथ टिकाये माथे.
तेरी बाट जोहती हूँ मैं...
नहीं आएगा तू, यह भी जानती हूँ मैं ..
फिर क्यूँ उम्मीद का  बीज ..
अपने बाँझ ह्रदय में बोती हूँ मैं....
शायद तू आये, फूटे कोपलें ह्रदय मेरे...
सोच सारी रात, सींचने बंजर ह्रदय ...
आँगन के किसी कोने में रोती हूँ मैं ....
आज भी महसूस करती हूँ ...
खुशबू तेरी इन हथेलियों में ..
आओ तुम या भूल जाऊं तुम्हें ..
कई बार जगकर नींद से..
अपनी हथेलियाँ धोती हूँ मैं..
शुभ संध्या ...सभी को...


Monday, September 10, 2012


ज़िन्दगी गुल लगी कभी, लगी कभी छलिये का छल ..
ज़हर लगी कभी, कभी अमृत सी, कभी प्याला हलाहल ..
सहज हो ना सके आज तक, पी देखा दो घूंट पीने का बल........रामेश्वरी 


जुगनू से ली रोशनी..
रजनी से गोपनीय अन्धकार ..
चंदा से रूप लिया ..
सूरज से आग ..
फूलों से खुशबू ली..
हवा से राग ..
दरिया से ली अल्हड़ता ..
चंदा से दाग ..
सागर से प्रीत ली...
हिम से ली शीतलता .
हिमालय से श्रृंगार ..
वर्षा से लिया संगीत..
बूंदों ने छेड़ा ज्यूँ राग ...
नृत्य दिया मोरनी ने..
कोयल गाये मेघ मल्हार ..
निहारे प्राणी सारे ..
यूँ रंगा प्रकृति ने धरा दरबार ....रामेश्वरी ..शु प्रभात सभी मित्रगनो को..










Sunday, September 9, 2012

कह गए महान संत और ज्ञानी..
सफल हुआ न कभी वो प्राणी ..
जो गुरु कहे पूरब को पश्चिम जानि.......रामेश्वरी ....
तेरे बादलों की ज़रुरत है अब किसे ...
मेरे दो नैन ही खारा समंदर समेटे है......
हैं नीर मेरे नैनो में बेरंग तो बेरंग सही..
तू तो धरती का ज़हर खुद में लपेटे हैं ....रामेश्वरी
अब तो चेहरे पर नित नया मुखौटा रखने की हमें आदत हो गयी...
आलम देखिये, खुद को भी हम आएना निहारने पर पहचानते नहीं..........रामेश्वरी
डाला आँखों का नीर..
कोमल ढले माटी के मटके, रख धीर ...
शायद आकार ले नीर ..
ढल सके उस माटी बर्तन के गर्भ में ..
बिसरा सके धारा में लगी पीर..
पर जै तन राँझा तै तन हीर ...
बहा फिर भी नीर......रामेश्वरी
आसमा की ऊंचाई, नाप सका है कौन...
दिलों में उतरना, बस धारण किये मौन.....रामेश्वरी ..
तह लगा कर रख लिया है आकाश ..
अपने आँगन मैंने...
पर खोलने नहीं देते, ज़माने वाले..
जब मन होगा खोल आकाश...
अपने आँगन उड़ा करेंगे.....

क्षितिज भी होगा..
इन्द्रधनुष बनेगा ..
आँगन मेरे..
रखूंगी फिर विशाल ह्रदय...
जिसकी उड़ान हो अधूरी..
आ जाओ आकाश मेरे.....रामेश्वरी
वो धूप पर अपना हक ज़माता रहा...
जब चाहा हमने सुखाना नासूर अपना ..
धूप पर बादल सजाता रहा..
उसे कहाँ थी खबर, आंधी से वो टकराता रहा...
टकरा हम से वो धरती पर आंसू बहाता रहा....रामेश्वरी
ना नुमाईश कर भरी महफ़िल, अपने हुस्न की..
ना जाने किस किस के नैनो में तेज़ाब भरा हो....
इंकार रख अपनी आँखों में, जुबान हिज़ाब धरा हो ...
.(रामेश्वरी )
अभी फैसला सुनाते हो क्यूँ?
हमें गुनाह करने दो अभी...
सुना है तेरे दरबार में ..
भरे पड़े हैं, न्याय प्रिये सभी...
(रामेश्वरी)
उसकी प्रेम पाती में..
आखर ढाई थे..
लिख डाला ग्रन्थ हमने ..
वो समझे हम कसाई थे.....हाहहहः...


JUST FOR FUN....HASIYE HASNA SEHAT KE LIYE BAHUT ZAROORI HOTA HAI....PAR DIL SE...SIRF SHOR MACHANE SE SACHI HANSI NAHIN MILTI HAMARE DILO DIMAG KO....
खुशबू खुद महसूस करेगी, खुशबू अपनी..
जब जब नज़दीक तुम गुल बन गुलशन सजाया करो...
क्यूँ सजदा करो तुम आगे खुशबू के, गुल हो तुम...
बस मुस्कुरा कर खुशबू को नज़दीक लाया करो.....रामेश्वरी
होंगे सभी के अपने चाँद आकाश पर...
पर मेरे चाँद को लुभाया ना करो..
पूनम में अमावास छाया कैसे ?

भरम ना हो नैनो को मेरे कहीं..
रो रो धो डाले नैन अपने ...
तुम ग्रहण बन उन पर छाया ना करो...रामेश्वरी
गर तुम राम होते, अवश्य मैं सीता होती..
तुम पतित हुए ना सदियों से, मैं कैसे पतिता होती ?
(रामेश्वरी)
एक सीमा दोउ खड़े..
दोउ जान मान पर अड़े ..
दोउ राखे अपनी मातृभूमि पर मान..
दोउ राखे हाथों में प्राण ...
फिर काहे मान लूं मैं..
मैं देशभक्त तू दुश्मन बेईमान ...रामेश्वरी ...


ऐसा क्यूँ होता है की हम जानते हैं की सामने वाला भी एक सच्चा सिपाही है अपने वतन का...वो भी अपना फ़र्ज़ निभा रहा है...पर इस बात पर मान करने की बजाय हम उससे नफरत करते हैं..
वो दोस्ती का वास्ता मुझे कुछ यूँ दे गया...
जाते जाते कानो में मेरे कुछ यूँ कह गया ...
लिखो सच गर, धार तेज रखना रोशनाई ए कलम की ..
पर धार कम रखना छुरे की, लाज रखना कसाई की रहनुमाई की....रामेश्वरी

Saturday, September 8, 2012

हर धमाके में..
किसी का हाथ गया..
किसी का पैर गया..
किसी का लखते जिगर गया है..
मैं खोजूं खुद को अब कैसे..
मेरे भीतर से इंसान गया है....रामेश्वरी