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Sunday, September 9, 2012

एक सीमा दोउ खड़े..
दोउ जान मान पर अड़े ..
दोउ राखे अपनी मातृभूमि पर मान..
दोउ राखे हाथों में प्राण ...
फिर काहे मान लूं मैं..
मैं देशभक्त तू दुश्मन बेईमान ...रामेश्वरी ...


ऐसा क्यूँ होता है की हम जानते हैं की सामने वाला भी एक सच्चा सिपाही है अपने वतन का...वो भी अपना फ़र्ज़ निभा रहा है...पर इस बात पर मान करने की बजाय हम उससे नफरत करते हैं..

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