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Saturday, May 18, 2013
तू गरीबी ।
ज़िन्दगी मुस्कराहट देगी, नींद से स्वार्थ की जागो, ज़रा सोने वालों ।
स्वार्थी नींद में अदावत ए ज़लज़ला सोने नहीं देता, लाख नर्म बिस्तर लगा लो…। रामेश्वरी
स्वार्थी नींद में अदावत ए ज़लज़ला सोने नहीं देता, लाख नर्म बिस्तर लगा लो…। रामेश्वरी
वो कुछ ऐसे गरज कर, गुजरे आँगन से मेरे ।
निगाह धुंधली हैं, पड़ा नैनो में सावन तब से ॥ रामेश्वरी
निगाह धुंधली हैं, पड़ा नैनो में सावन तब से ॥ रामेश्वरी
Tuesday, May 14, 2013
Saturday, May 11, 2013
इन सर्द धुंधली राहो में ..
देखो कैसे ये वृक्ष तने से हैं ..
झड चुके हैं पात, शाखों से इनकी ..
उग रहे ख्वाब, कोमल टहनियों में ...
आएगा सावन फिर से .
पड़ेंगी बूँदें, प्यासी धरा पर ..
उड़ेगी मृत्तिका श्वास फिर से ..
लिए मंद मंद खुशबू मटैली ..
फिर नाचेगी, प्रकृति फैला छटा नखरेली ..
मिट रहे शाख, राहों से फिर बंट जायेंगे ..
सब्र करना सीखो मानुष, मुफलिसी के दिन भी ..
बदलते मौसम से कट जायेंगे ..
धुंध से आगे भी जीवन है ..
ना इसको ठहराव कहो ..
समय की अविरल धारा .
सदैव संग बहो ......रामेश्वरी
देखो कैसे ये वृक्ष तने से हैं ..
झड चुके हैं पात, शाखों से इनकी ..
उग रहे ख्वाब, कोमल टहनियों में ...
आएगा सावन फिर से .
पड़ेंगी बूँदें, प्यासी धरा पर ..
उड़ेगी मृत्तिका श्वास फिर से ..
लिए मंद मंद खुशबू मटैली ..
फिर नाचेगी, प्रकृति फैला छटा नखरेली ..
मिट रहे शाख, राहों से फिर बंट जायेंगे ..
सब्र करना सीखो मानुष, मुफलिसी के दिन भी ..
बदलते मौसम से कट जायेंगे ..
धुंध से आगे भी जीवन है ..
ना इसको ठहराव कहो ..
समय की अविरल धारा .
सदैव संग बहो ......रामेश्वरी
सर्द दिन, सन्नाटा गहन पसरा है ।
चल पथिक, पथ कितना संकरा है ।
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है ।
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है ।
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है ।
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...रामेश्वरी
चल पथिक, पथ कितना संकरा है ।
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है ।
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है ।
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है ।
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...रामेश्वरी
मैंने जनम लिया ।
वो स्त्री से माँ हो गयी ॥
मैंने पग धरे, धरा पर ।
वो मेरी नींव का, सामान हो गयी ।
प्रथम शब्द, माँ से लिया ।
वो माँ से, गुरु हो गयी
यूँ प्रथम शिक्षा शुरू हो गयी ।
मैं यौवन की प्रथम सीढ़ी पर ...
माँ आखिरी सीढ़ी, खड़ी हो गयी ।
आज भी वो देख बैचेनी मेरी ..
सोती नहीं ।
मैं बूढ़ा अब हो चूका हूँ ।
माँ फ़र्ज़ से बूढ़ी होती नहीं ।
दवा देने से पहले आज भी ।
माँ ......मुख में दाना धरती नहीं ।
माँ ....कभी मरती नहीं ।
अब माँ नहीं है दुनिया में ।
छवि उनकी अब देखूं मुनिया में ।
बिटिया भी मन से माँ जैसी होती है ।
अब वो दवा देकर सोती है ..रामेश्वरी
Thursday, May 9, 2013
जमुरियती सरकार
सुनो सुनो जमूरों !
ये जमुरियती सरकार है ।
मिटने वाले मिटे वतन पर ।
इन्हें गद्दियों से प्यार है ।
सुनो सुनो जमूरों !
ये जीव शाकाहार हैं ।
चारा निगलें क्षण भर में ।
कहाँ लेते डकार हैं ।
ये कुदरत का अनोखा आविष्कार है ।
सुनो सुनो !
महंगाई की डोर खींच।।
तमाशा हमारा देखते हैं ..
तपन से भूख की हमारी ..
अपनी राजनितिक रोटियाँ सेंकते हैं ।
ये सूरते निराकार हैं ।
जमूरों की भरमार है।
ये ज़मुरियती सरकार है ।
ना अब हिंदी ना हिन्द की बातें हैं ।
फैला रहे, समाज में मज़हबी बातें हैं ।
झूठ बोल रहा, सच को पड़ी लातें हैं ।
निगल रहे सभ्य समाज ये तो ।
ये तो दैत्याकार हैं ।
ये जमुरियती सरकार हैं । रामेश्वरी
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