सुनो सुनो जमूरों !
ये जमुरियती सरकार है ।
मिटने वाले मिटे वतन पर ।
इन्हें गद्दियों से प्यार है ।
सुनो सुनो जमूरों !
ये जीव शाकाहार हैं ।
चारा निगलें क्षण भर में ।
कहाँ लेते डकार हैं ।
ये कुदरत का अनोखा आविष्कार है ।
सुनो सुनो !
महंगाई की डोर खींच।।
तमाशा हमारा देखते हैं ..
तपन से भूख की हमारी ..
अपनी राजनितिक रोटियाँ सेंकते हैं ।
ये सूरते निराकार हैं ।
जमूरों की भरमार है।
ये ज़मुरियती सरकार है ।
ना अब हिंदी ना हिन्द की बातें हैं ।
फैला रहे, समाज में मज़हबी बातें हैं ।
झूठ बोल रहा, सच को पड़ी लातें हैं ।
निगल रहे सभ्य समाज ये तो ।
ये तो दैत्याकार हैं ।
ये जमुरियती सरकार हैं । रामेश्वरी

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