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Saturday, March 28, 2015
मन की भड़ास
(मुन्नवर राणा जी से प्रेरित )
Saturday, March 14, 2015
आम आदमी
Friday, March 6, 2015
ना जाने क्यों लोगों को साफ़ सुथरे और उज्जवल वस्त्र धारण किये मानुष ही सुन्दर लगते हैं और भाते हैं ? वह माँ कितनी खूबसूरत है जिसके चेहरे पर किसी सेठ की नवनिर्मित भव्य इमारत की मिटटी लिपी हो । जिसके वस्त्र मैले हैं दिनभर अपने मासूम बच्चों का पेट भरते२, झूठे बर्तन धोते२ । उनके मैले कुचले और पसीने से लबालब वस्त्र क्यों उन्हें सुगंध नहीं दे पाते ? क्या यह माँ सुन्दर नहीं उस माँ से, जो अपने पसीने को सिर्फ जिम जाकर इसीलिए बहाती है ताकि उसका बाहरी सौंदर्य बना रहे । क्यों लोग बाहरी सौंदर्य को तवज़ु देते हैं, और खूबसूरत मन, सांवले तन मन को ताउम्र घुटघुट कर जीने को मजबूर करते हैं ? यदि मासूम बच्चे से पुछा जाए तो वह सबसे खूबसूरत अपनी माँ को ही कहेगा । शायद सच्ची खूबसूरती की परख मासूम बच्चे ही रखते हैं । ये विश्वव्यापी सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ झूठ मात्र । रामेश्वरी
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