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Monday, January 30, 2012


जग  का रूल ..
जीते जी जाए भूल.. 
मरे तो  फूल ...........रामेश्वरी  

पीली छटा है ..
आया है यूँ बसंत
पीले है फूल ...

धूप भी पीली
खिलेंगे अब प्लाश...
खिली सरसों ...

बसंत मेले ...
लगे हैं गांव झूले ...
हँसे यौवन ....

पीछे पतंगे ..
छेड़े बीच बाजार ..
हरी चूड़ियाँ ...

बिके खिलौने ..
बच्चों में है उमंग..
चाट पकौड़ी ..

माँ आई दौड़ी ..
पिता की जेब ढीली ..
पगार गयी ....

नयी ब्याहता ..
लजाये पिया संग ..
पहली प्रीत ... ...

(रामेश्वरी ..इक कोशिश हायकू बनाने की)

सत्य कथन ..
कल्याण ही है धर्म ..
तजो अधर्म .........रामेश्वरी (hayku)

होती मैं शक्ति ..
दौडती मैं तुझमे ...
लाचार मन .....

उड़ सके वो ...
खेल सकता वो भी ...
चाह दफ़न ...
.

हे ईश्वर तू..
तू क्यूँ लाचार है ..
शक्ति दर्पण .....

रामेश्वरी ...(haykoo..)

उडती हवा ..
रंगीन है फिजा ये..
मन बेचैन.....

चुप हो तुम ..
चुप से हैं हम भी ..
ये है शोर क्यूँ .....

फूल खिले हैं ..
कांटे रक्षा को तने .
प्रेम हो तो यूँ .......

ये मधुमास ..
गयी खिज़ा है अभी ..
मिलन की आस ........
..........रामेश्वरी (हायकू)
जले हर शमां परवानो के लिए, ये ज़रूरी तो नहीं !
जलती हैं कुछ शमाएं, सिर्फ तमस मिटाने के लिए 


कह दो मचलते परवानो से, ये शमां नहीं दीवानों के लिए |
ये शमां बैरागी है, जले कभी मंदिर कभी मस्जिद के आँगन |
धर्म का सही ज्ञान, जाति धर्म का भेद दिलों से मिटाने के लिए|
जाओ परवानो ढूँढो कोई और शमां, अपने2आशियाने के लिए|  (रामेश्वरी----स्पर्धा के लिए  )

Wednesday, January 25, 2012

मिट गयी शताब्दियाँ, मिट गयी कई आबादियाँ ...
मिटते गए करने वाले जुल्मियों के जुल्म-ओ-सितम ...
गौरी आये गोरे गए, मिटे मुगलों के महल-ओ-हरम ...
ये देश है कबीर का, ग़ालिब का, गौतम का, राम का....
रहा अमर हमारा नाम, मिट गए कई खाक में रहे नाम का...रामेश्वरी 
बादल कहे अभिमान भरे शब्दों से...
ढक लूँगा सारी धूप और लो मैं तेरी ...
कहे प्रभाकर विनम्र शब्दों में बादल से..
"निर्मित है तू मेरी ही गर्मी से "
बिना मेरे तू जम जाता, वहीँ धरा पर..
धूनी रमाता...
छट गया फिर बादल का अभिमानी रूप..
खिली खिली फिर से धरा पर रवि की धूप.
जिस कुरूप माँ ने चलना सिखाया उसके रूपवान बच्चों के 
लडखडाते क़दमों को....
आज वही रूपवान बच्चे सम्भाल नहीं पाते लडखडाते कदम ..
अपनी कुरूप माँ के....
जिनके कदम सही पड़े सोचकर चली वो मीलों पैदल..
आज दो कदम साथ उसके शर्म से चल नहीं पाते ..
हर धूप में छाँव दी उसने अपनी ममता की...
आज भरी दोपहरी छोड़ आये उस दामन को...
बीच चौराहे पर................
रात कटी, दिन ना कटे...
कटे अब कैसे दिन रैन....
पिघलाऊँ कैसे, जिन टकटकी लगी..
जैसे द्वार पर जम गए मेरे नैन....
अभी २ आई तुम्हारे आने की ज्यूँ ..
ताजा खबर, कुछ झपके थे नैन मेरे ...
कहीं कानो सुनी अफवाह ना हो..
सोच कर जम गए द्वार पर फिर नैन मेरे .....रामेश्वरी
अंधेरों से करो न दिल्लगी ....
पर्दानशी करे वो ज़माने की गंदगी .....
रोशनी पे करो न यूं तुम गुमां..
भोर होते ही वो उज्जागर करे..
दरिंदो की दरिंदगी..........रामेश्वरी
तेरे भरोसे की डोर थामे उड़े हम इस बेरहम जहां में...
धरातल तू कोमल रहना गिरे जब कट तेरे आगोश में
yah shahar yakeen tahe dil se hai mera hai......par viswas karoon kaise isme basta koi begaana nahin..
khuda ki khudai ek taraf hai....teri meri judai ek taraf hai......milane ka tere aasar to nahin....par khudai par yakeen ek taraf hai...rameshwari...
शांति थी देश में मेरे, नफरत इस फिजा में घोलता है कौन ?
ये हवा बही है किस देश से, नमक उस देश का यहाँ बेचता है कौन ?

होगी आज बरसात ख़ूब..
सुना है टकराए थे विचार बड़ी जोर से..रामेश्वरी

आज मेरा आँगन गीला नम क्यूँ है?
शायद वीरानी पर रोई रात भर वो भी है..रामेश्वरी
पवन की इठलाते वेग को, थाम सका है कौन..
हज़ारों तूफ़ान लिए बैठा है, उसका इक2 मौन ..

हर मौन पर उसके तूफ़ान का अंदेशा है..
शांत बैठी जैसे हर इक पात...
चपल वेग पर, वही पात करे उत्पात ...
जाने वो मौन कैसा था, जाने ये वेग कैसा है...रामेश्वरी

आज सैयां को लुभाने सजनी को सजना होगा....
बिना कजरवा सजे कैसे?
फिर किसी दीपक की लौ में बाती को अपना ..
सर्वस्व तजना होगा................रामेश्वरी

इक दिया काफी नहीं था घर के इस चिराग के लिए..
सो जाते२"रामी""वो तेरा तमाम आँगन जला गया.....रामेश्वरी
क्यूँ ऐसी चैन सुकून की नींद हमें नहीं आती है..
क्या चाहिए हमें क्यूँ नींद में हमें वो सताती है...
देखो यह बालक नींद में कैसे मुस्कुरा रहा है..
शायद वो खुश है सो कर ही सही कुछ पल को...
वो इस दुनिया से, दुनियादारी से दूर जा रहा है.............रामेश्वरी
जिस माटी से बने हम,बना हमारा लहू ..
ऐसी माटी दिखी नहीं,देखि दिशा चहुँ .....

हर मौसम यहाँ से आकर गुजरते हैं, सभी धर्मं यहाँ बसते हैं ...
विदेशी भी इसकी विभिन्नता पर नतमस्तक हो शीश यहाँ धरते हैं ...

माँ का दर्जा यूँ ही दुनियावालों इसे हमने नहीं दिया है..
इस माँ ने कई अनाथों को ममता की शरण में लिया है ...

Thursday, January 19, 2012


कैसे वो पहन खादी, लगा कला चश्मा ...
दुनिया को अंधकारमय देखना चाहते हैं..
पर उनके काले चश्मे से भी दुनिया देखो..
कितनी उज्जवल धवल दिखती है.........
ये तो मन की कालिख है जो उज्जवल चश्मे ..
पर उनके चिपके खड़ी है.....रामेश्वरी

टुटा था दिल उसका वैसे तो बड़ी जोर से...
दूर तलक आवाज़ गूंजी थी.........
पर हम ही गुनाहगार निकले, अहसास हमारे बहरे थे...रामेश्वरी
जब हम बच्चे थे...
अक्ल से कितने कच्चे से थे..
खवाब बड़े थे उन्हें पूरा करने को..
चाहते बड़े होना जल्दी थे....
अब हम बड़े हैं ...
ज़िन्दगी छोटी है ...
अब हम बच्चा बनना चाहते हैं ...
जिन अरमानो को पूरा करने की चाह में ..
बड़े होना चाह समय से पहले...वही 
अरमान दबा कर रखे हैं...
अब उसी उम्र को देखो..
रोकना हम चाहते हैं...
ज्यूँ ज्यूँ साल साल बढते हैं..
ज़िन्दगी छोटी छोटी होती जा रही...
उतना प्यार सा हो गया है ज़िन्दगी से...
इक इक लम्हा कीमती होता जाता है....
इन लम्हों को प्यार और अपनेपन से जियें...तकरार की बात क्यूँ और किसलिए .................सुप्रभात मित्रों...
खुदा की खुदाई पर शक ना करो...
रोज मिलने की खातिर वो दर्द हजार देता है..
जब सुख हो करीब सभी के, खुदा की ओर..
ऐतबार-ऐ-नज़र कौन करता है........रामेश्वरी

ख़ुशी खुद से ही मिलती..
ना इसको तू मोल तोल..
गर बिकती ये हाट पर ..
कुछ दो चार हमें भी तोल ........रामेश्वरी

कौन..


पड़ोस में बस्ता है कौन..
दोस्ती, दुश्मनी में सस्ता है कौन ...?
देखा नहीं कभी ..
पड़ोस में लाश बन सड़ता है कौन ?

कितना गरीब वो,प्रकृति का उसे एहसास नहीं
..
शीतल हवा, सर्द धूप होती है क्या, समय पास नहीं ..
जब हो पास लिमोजीन,  पैदल राह चलता है कौन? 

साए से अपने उन्हें डर लगता है क्यूँ?
डाकू के घर डाकू घुसा है कहीं?
ज़रा सी आहट में रातों को देखो
 ..
इस मोहल्ले में निंद्रा से जगता है कौन ?

चंद कागज़ के टुकडो की खातिर
 ..
लहू बहाया ये किसने रिश्तों का ?
कौन फिर भी बेचैन है, चैन हासिल नहीं..
उसकी बेचैनी का अब सबब है कौन?

शोर अपनों का, गरीब की गली में ..
सन्नाटा है अमीर मोहल्ले में ...
इस सन्नाटे को चीर,
 फिर इतना हँसता है कौन?

Wednesday, January 18, 2012

जब२ खुदा से हमारी मुलाकात होगी...
न जाने कितनी शिकायतें होगी.....
जाने कितनी ही फरियादें होंगी.......
जाने उनके आगे कितने अनगिनत ..
सवालिया निशाँ होंगे?
सोच सोच खुदा भी यूँ ही परेशान होंगे...

पंछी सा ह्रदय दिया तो पंख दिए क्यूँ नहीं?
निश्चल बहती गंगा सा स्वाभाव दिया...
तो इतने रिवाजो रीतियों के बाँध बनाये क्यूँ?

शीतल हवा सी  चंचलता दी ........
तो इस हवा पर इतने पहरे और जंजीरे जकड़ी क्यूँ?

बना हमें खुद,   तुम खुद से तो खुदा हो गए...
हम पत्थरदिल दुनिया से टकरा२ पत्थर हो गए...
अब इस पत्थर को प्रेम दरिया में बहाते हो क्यूँ?
गर रखना था गहन अँधेरे में, इतनी चपलता दी ही क्यूँ?...रामेश्वरी 









जिसे वो कहती रही भाई भाई..
कैसे  वो निकला देखो कसाई ..

करनी थी रक्षा जिस भाई ने ..
की आबरू उसी ने तार तार है..

करा कैसे उसने विस्वास का विस्वासघात ..
करा कैसे उसने उसके तन पर यूँ आघात ..

जिस राखी की डोर से बंधे वो दोनों थे...
 उधाड़ दी उस डोर से बनी लाज उसने ....
आज तक वो शायद डरी सहमी होगी..
भाई शब्द ही जैसे लगता हो उसे डसने..

रिश्ता रिश्ता है..खून का मोहताज नहीं..
रिश्तों को कैसे विस्वास का मोहताज उसने किया .......

कुछ दिनों पहले के लड़की की कहानी क्रैईम पेट्रोल में आ रही थी...कैसे वो भाई के दोस्त को भाई की समझती थी और कहती भी थी....कैसे उसने उसकी अस्मत तार२ तो की ही उसकी हत्या भी कर दी थी..........विस्वास इतना मजबूत था की माता पिता और भाई को उसे दूंदने में बहुत वक़्त लगा तब तक उस लड़की की हत्या हो चुकी थी.......
दिल्ली शहर है दिलवालों का, हर प्रांत, भाषी, जाति, धर्म के लोगो का ..
ये उम्मीदों के सपनो को पूरा करे, लाखों का ये भूखा उदर भरे..
ये तुगलक, शाहजहाँ, कुतुबुदीन ऐबक, की दिल्ली..मजनू का टिल्ला दिल्ली ...
ये ग़ालिब के शेरो-ऐ-ग़ज़लों की गवाह है हमारी दिल्ली ...
यहाँ की चमचमाती दौडती सड़कों पर दौडती ज़िन्दगी ..
यहाँ शांति से सब करें अपने२ दीन और धर्म की बंदगी .....रामेश्वरी
जो कहा करते थे हमें अक्सर ज़िन्दगी अपनी ....
देखो कैसे बेवफा ज़िन्दगी उजाड़ हमारी चल दिए....

हमने संभाल कर रखा उनकी ज़िन्दगी को, हमसफ़र ना चुना...
उन्होंने देखो कैसे किताब-ऐ-ज़िन्दगी के फलसफे ही बदल दिए ........रामेश्वरी
जब जब निगाहें की उस रोशनी की ओर!
पलकें मेरी झट से झुक गयीं...
जाने वो नूर तेरी खूबसूरती का था..
या चकाचोंध रोशनी लटके बनावटी गहनों .
की थी...
या तेज था तेरे ज्ञान का फैला चहुँ ओर..

(अब यह आपके ऊपर निर्भर करता है की आप ज़िन्दगी में किसी तेज ओर नूर को महत्व देते हैं....रामेश्वरी )
कल कल बहते झरने की..
कू कू करना मैयने की...
वो हल्कापन लिए ठंडी शीतल हवा..
वो कन्द मूल का साग...
वो कोयल का मधुर राग..
ढके जैसे कपास से ईश्वर ने .
वो सफ़ेद ऊँचे परबत पहाड़ . ..
देख देख प्रकृति के भिन्न2रूप..
मन हुआ क्यूँ यूँ बाग़ बाग़...
नित नए पुष्प दिखे ...
जाऊं जब भी प्रकृति के द्वार..
जुदाई सहन करू कैसे..
इन नाज़ुक कोमल फूल पौधों से...
रम्हाते अपने भोले से ..
नीले२ अम्बर पर बिखरे लाखो ..
टिम-टिमाते..तारों से..
बरसों हो जाते हैं देखे ऐसा आकाश पटल
हवा की सर्रर्र, दरियाओं का स्वर कल कल...
चलती जाती जैसे2 गाडी..
आये संग संग जैसे इक पुकार ..
जल्द आना लौट कर मेरे बच्चों..
अपनी इस माँ के आँचल में..
खुला है मेरा ह्रदय द्वार...
(रामेश्वरी)

दोस्त ..दो अस्त हो बने इक जान वो दोस्ती है...
सुख ना देखें भले ही, दुःख भुला दे जो वो दोस्ती है..
दोस्ती ना रूप है ना रंग है...दो आत्माओ का संग है..
निभा दे तो सागर है वरना मतलब का अथाह दलदल है......रामेश्वरी

मिटटी गूंथ रोटी बनायीं..
अश्रू घोल दाल...........
लाचार ऑंखें जैसे अचार ...
चूल्हा तो जला नहीं..
फिर भी पेट जल रहा...
लपटे भूख की ममता फूँक रही ...
हम खुद मिटे पड़े...
वो कहते हैं हम गरीबी मिटायेंगे...
जहाँ मर चुकी भूख अब..
वहां चूल्हे जलाएंगे..
गरीबी के दलदल में दबे हम...
वो कहते हैं उठाने को हाथ वो बढाएंगे..
गर उठे ना सही तो ना सही...
मगर कहते हैं कि फूल हम वहां खिलाएंगे....
(रामेश्वरी)

Wednesday, January 11, 2012

अब हाथ हो या हाथी हो...
किसी का भी वो साथी हो..
पड़ना हमी को है..
दबना पीसना हमी को है..
साइकिल हो या कुर्सी हो...
उनकी उड़ान का भी बिल...
पेट्रोल की कीमती मार..
पड़नी हमी को है...
फूल खिले कहीं भी...
शहीद होना हमी को है..
झोपड़ा हो या झोपडी हो..
शिकार होना चतुर लोमड़ी का..
देखो हमी को है..
फिर ना कहना भ्रस्त हो तुम ...
अनशन पर रहना हमी को है...
कीमतें छोड़ो अभी ..
दोड़ो अभी...इक साथ ..
वक़्त तुम्हारा आया है..
(रामेश्वरी )
चुप्पी उसकी कई अफसाने बयाँ कर गयी......
इक हम थे बेफिजूल शोर किये जा रहे थे....
हुई नोटों की बरसात, नाचे जमकर चोर...
इक हम थे नाचा मोर २ किये जा रहे थे..
.रामेश्वरी
फलो की खड़ी रेहड़ी में ...
जांच रहा बच्चा कुछ बार बार...
निगाह उसकी चंचल सी थी..
जुबान उसकी विकल सी थी..
लालायित जैसे कुछ खोजने में था ..
पुछा फल वाले ने,"क्या खोज रहे हो "?
बच्चा बोला,"इतने फलों में बाबा-
कैसे ढूँढू वो मेहनत का फल?"
सुना है, बड़े लोग भी कहते हैं..
बहुत मीठा होता है मेहनत का फल...
सुन उसका मासूम सवाल...
दिया इक मीठा फल उसके हाथ...
बोला फलवाला ,"लो बेटा..
यही है वो मीठा फल...
जो इतनी मेहनत से कब से ..
तुम ढून्ढ रहे थे!.........रामेश्वरी
पलकें मेरी झट से झुक गयीं...
जाने वो नूर तेरी खूबसूरती का था..
या चकाचोंध रोशनी लटके बनावटी गहनों .
की थी...
या तेज था तेरे ज्ञान का फैला चहुँ ओर..

(अब यह आपके ऊपर निर्भर करता है की आप ज़िन्दगी में किसी तेज ओर नूर को महत्व देते हैं....रामेश्वरी )

Tuesday, January 10, 2012

जहाँ दिखे लाल परी...
वहीँ आँखें ठहरी हैं.. 
जहाँ बंटे हरे हरे नोट हैं..
वहीँ ठ़प से पड़े वज़नदार वोट हैं ..
कैसे कहेंगे फिर आप दोस्तों...?
कि नेता की ईमान में खोट है ..?
फूल मुस्कुरा कर खिला रहता है..
महक अपनी उड़ा देता दूसरों के लिए!
दिया तिलतिल जलता रहता है..
देता रहे रौशनी करने रोशन आँगन दूसरों के लिए!
लो आज हमने भी उड़ा दी हंसी अपनी...
फूँक दिया घर, करने रोशन मोहल्ला अपना!...........रामेश्वरी

चप्पे-चप्पे,कदम-कदम पर ....
पग फूँक-फूँक कर रखना...
माटी के कणकण में दबा..
मासूम ऐतबार ऐ दिल है मेरा.....रामेश्वरी 
ईमान ना राम  और ना ही राकिब है!
गर डोला ईमान तुम्हारा  इक मय की ..
बोतल और चंद सिक्कों से...
उनका सत्ता की मय और सिहासी खजाने ..
से डोलना क्यूँ नहीं मुनासिब है  ??...रामेश्वरी 

कदम कदम पर उनके नखरे थे...
हम मिटेंगे उन्हें गुमान था कितना..
क़तर क़तर कर हमने नखरे उनके..
अपना उन्हें हमजुबां बना लिया .

Saturday, January 7, 2012

आईना बोला देख उसे..
कल तलक में समझी नहीं...
मैं क्यूँ इतनी परेशान सी थी..
तेरी सूरत क्यूँ आजतक अनजान सी थी 
आज समझी कल तक तो तेरी जात एक इंसान थी..?
(रामेश्वरी)
बादलों ने कर गडगडाहट ..
हमें प्राकृतिक संगीत सुनाया है...
गड़ गड़ बादलों ने गाया..
ओलो ने टनटन कर वाद्ययंत्र ..
बजाये है ...
वर्षा ने कलकल मधुर धुन...
छेड़ी है...
शीत लहर ने श्ह्श्श कर नृत्य ..
सा करवाया है....
न जाने इतने पर चाँद क्यूँ..कर..
लज्जाया है..रामेश्वरी 
चाहत ...
होती क्या है परिभाषा इसकी...
क्या है निराकार, या है क्या आकार इसका...
क्यूँ यह अलग२रूप लेती ?

भूखे की चाहत रोटी....
नग्न देह की चाहत धोती...
नेता की चाहत वोट.
कांपते बदन को कोट ..की
बहते दरिया को सागर की..
उफनते पानी को बांध की ...
योगी को योग की..
रोगी को निरोग की..
प्रेमी को प्रेम..
कफ़न बांधे युवा को..
देशप्रेम की..
बच्चों को नेह की..
कोडी को देह की......
प्यासे को सागर की...
बेशर्म को गागर की...

माया अनंत ..चाहत अनंत है..
धन्यवाद् मेरी चाहत का भी यहीं अंत है....रामेश्वरी