बादल कहे अभिमान भरे शब्दों से...
ढक लूँगा सारी धूप और लो मैं तेरी ...
कहे प्रभाकर विनम्र शब्दों में बादल से..
"निर्मित है तू मेरी ही गर्मी से "
बिना मेरे तू जम जाता, वहीँ धरा पर..
धूनी रमाता...
छट गया फिर बादल का अभिमानी रूप..
खिली खिली फिर से धरा पर रवि की धूप.
ढक लूँगा सारी धूप और लो मैं तेरी ...
कहे प्रभाकर विनम्र शब्दों में बादल से..
"निर्मित है तू मेरी ही गर्मी से "
बिना मेरे तू जम जाता, वहीँ धरा पर..
धूनी रमाता...
छट गया फिर बादल का अभिमानी रूप..
खिली खिली फिर से धरा पर रवि की धूप.
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