मिटटी गूंथ रोटी बनायीं..
अश्रू घोल दाल...........
लाचार ऑंखें जैसे अचार ...
चूल्हा तो जला नहीं..
फिर भी पेट जल रहा...
लपटे भूख की ममता फूँक रही ...
हम खुद मिटे पड़े...
वो कहते हैं हम गरीबी मिटायेंगे...
जहाँ मर चुकी भूख अब..
वहां चूल्हे जलाएंगे..
गरीबी के दलदल में दबे हम...
वो कहते हैं उठाने को हाथ वो बढाएंगे..
गर उठे ना सही तो ना सही...
मगर कहते हैं कि फूल हम वहां खिलाएंगे....
(रामेश्वरी)
अश्रू घोल दाल...........
लाचार ऑंखें जैसे अचार ...
चूल्हा तो जला नहीं..
फिर भी पेट जल रहा...
लपटे भूख की ममता फूँक रही ...
हम खुद मिटे पड़े...
वो कहते हैं हम गरीबी मिटायेंगे...
जहाँ मर चुकी भूख अब..
वहां चूल्हे जलाएंगे..
गरीबी के दलदल में दबे हम...
वो कहते हैं उठाने को हाथ वो बढाएंगे..
गर उठे ना सही तो ना सही...
मगर कहते हैं कि फूल हम वहां खिलाएंगे....
(रामेश्वरी)

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