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Thursday, October 17, 2013

यूँ तो हर फूल खुशबू ही समेटे है । 
पर कुछ फूलों ने जैसे यादें समेट लीं ॥ 

यूँ तो कुछ पर्वत भीतर आग समेटे हैं । 
पर कुछ पर्वतों ने शीतल स्वेत चादर लपेट लीं । 

कुछ अज्ञानियों ने,  पढ़ा कुछ नहीं,  पोथी रटें हैं ।
"कबीर" ज्ञानी पंडित भया वही, जोउन ढाई आखर रट लीं ।  रामेश्वरी 

Tuesday, October 15, 2013

भागीरथ बना, बैठा है कौन ?




लहराती,
इठलाती,
धरा सहलाती,
मधुर गान गुनगुनाती,
मैं सुघोषा,
फिर !
दे रहा कौन,
आज ये मौन ?

ढोती पापी,
धोये पाप । 
आज यही संताप 
सदियों रही वही मैं । 
स्वयंभू भागीरथ बना,
बैठा है कौन ?  रामेश्वरी 

(गंगा माँ का इतना रौद्र रूप देखने के बाद भी क्या उत्तराखंड की सरकार ने कुछ भी सबक नहीं लिया ।  इतनी भारी मात्रा मैं जान माल की हानि हुई,  फिर भी इन सब के बावजूद हर की पौड़ी तक जल स्तर बहुत कम कर दिया गया है ॥  अगले वर्ष कहीं माँ का रौद्र रूप इससे भयावह ना हो ?  प्रकृति से छेड़छाड़ बुरी है क्यूँ अहंकार पाल रहा है इंसान ।)रामेश्वरी 

Saturday, October 12, 2013

रावण क्यूँ परेशान ?




रावण क्यूँ परेशान ?

हैरान है रावण . 
दुनिया की कार्यवाही से। .  
खुद कलयुगी रावण। . 
फूँक रहे.  .
मुझे! 
कितनी वाह वाही से। . 

तुलना करूँ,  कभी जो.. 
कृत्यों की.. 
न्याय चाहूँ मैं ?
दुशासन स्वछंद फिरे . . . 
क्यूँ युगों अग्नि समाऊँ मैं ?
अब शायद प्रकृति भी। . 
गवाह रहेगी मेरी 
अब ना अग्नि समाऊँ मैं ?
सम्मान दिया राम ने। . 
तुमसे मुखाग्नि ना चाहूँ मैं ?

स्तब्ध हूँ। . 
न्यायिक कार्यवाई से ॥ रामेश्वरी। 


(संस्मरण )


बचपन मैं जो उत्साह रामलीला देखने को हमारी दिलों में होता था वो शायद अब की पीढ़ी के बच्चों में नहीं दिखाई देता ।   मुझे आज भी अपने मोहल्ले की रामलीला के सभी लोग अच्छे से याद हैं जो भिन्न भिन्न पात्र निभाया करते थे ।   एक दो बार मैंने खुद भी रामलीला  की शुभारंभ आरतीयों में हिस्सा लिया था ।   हमारे मोहल्ले में  रावण का पात्र निभाने वाले युवक जो की मेरे बड़े भाई के मित्र भी थे, मोहल्ले में बहुत लोकप्रिय थे ।  जब भी वह गली मोहल्ले से गुजरते,  हम सभी बच्चे यकायक ख़ुशी से कह उठते" देखो रावन जा रहा है " ।   उस दौर में वह हमारे लिए जैसे एक बड़ी फ़िल्मी हस्ती जैसे थे ।   वह बहुत ही सभ्य इंसान थे ।   

बात उन दिनों की है जब कंप्यूटर युग शुरू ही हुआ था और सभी टाइपिंग सीखा करते थे ।   हमारी क्लास में एक युवक था, जो की बहुत ही हसमुख और शरारती था ।   लड़कियों से फ़्लर्ट करना जैसे उसकी आदत थी ।  मैं सांवली रंगत की थी सो मेरे से उसका व्यवहार सिर्फ दोस्त वाला था ।  एक दिन अचानक सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी और संयोगवश दरवाजा खोलना भी मुझे ही पड़ा ।   सामने जिस शख्स को देखा तो हैरान ।   वहां कोई और नहीं वही युवक था जो मेरे साथ टाइपिंग सीखा करता था ।   मुझे देखते ही वो  बिल्डिंग से नीचे उतर गया ।  संयोग वह मेरे बडे भाई साहब से रामलीला के बारे में जानकारी हेतु आया था ।   मैंने अपने भाई साहब से पुछा तो उनसे मालूम हुआ की यह वही युवक था जो राम का पात्र निभाता आया है ।   मैं उस युवक को राम के पात्र में कभी पहचान नहीं पायी,  क्यूंकि उस समय वह भारी भरकम मेक-उप में हुआ करता था ।   आज भी मैं इस बात पर हँस देती हूँ कि  यह भी अजब संयोग रहा की राम जैसा सभ्य इंसान रावण पात्र निभाता आया था ।   और कुछ कुछ रावण जैसा युवक राम का पात्र निभाता आया था ।   वो भी सिर्फ चेहरे मोहरे के कारण ।    क्या चेहरा इतना मायेने रखता है ?   रामेश्वरी 

Thursday, October 10, 2013

ना मस्जिद गिरी 
ना मंदिर गिरा
गिरा तो बस इंसान
जानवर की नज़र से गिरा। ।



पिछले वर्ष मैं सपरिवार चिड़ियाघर की सैर को गयी थी । वहां भिन्न भिन्न जंतुओं को देख मन बहुत प्रसन्न सा था । पर उनकी क़ैद भरी ज़िन्दगी मन को चुभ रही थी । आप शायद हँसेंगे पर उनकी जगह खुद को खूंटी से बंधा महसूस करने पर उनकी पीड़ा का सही सही आंकलन हुआ ॥ वहीँ करीब में, एक बाडे में एक गोरिल्ला भी बैठा हुआ था जो की बच्चों के लिए मुख्य आकर्षण था । बच्चों का शोर, युवाओं की सीटियों की आवाजें, लोगो का उसे पुकारना जैसे उसे रास नहीं आ रहा था । वह सभी की ओर पीठ किये बैठा रहा । मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो नाराज़ सा था, इंसानों की इस हरकत से कि उन्होंने उसकी आजादी छीन ली । हमने इतनी भाग दौड़ कर क्या पा लिया जो जानवरों के पास नहीं । जानवर हमसे कहीं बेहतर हैं । रामेश्वरी।।।
खुद से गुम इस कदर रहता हूँ, कि गुमशुदगी दर्ज करवाने कोतवाली गया था । 
पहचान ढूँढते कैसे वो मेरी,  पहचान को अपनी हाथों में लिए आएना गया था ।। रामेश्वरी