यूँ तो हर फूल खुशबू ही समेटे है ।
पर कुछ फूलों ने जैसे यादें समेट लीं ॥
यूँ तो कुछ पर्वत भीतर आग समेटे हैं ।
पर कुछ पर्वतों ने शीतल स्वेत चादर लपेट लीं ।
कुछ अज्ञानियों ने, पढ़ा कुछ नहीं, पोथी रटें हैं ।
"कबीर" ज्ञानी पंडित भया वही, जोउन ढाई आखर रट लीं । रामेश्वरी
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