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Wednesday, August 24, 2011
Tuesday, August 23, 2011
आज फिर घटा जोरो से बरसी है..
फिर बदली घुमड़ घुमड़ कर लहराई है
इन्दर्धनुष ने दौड़ लगाई...
बह पुरवाई आई है...
बूंदे छम छम थिनक२ नाची हैं...
बूंदों का नृत्य देख रवि लजाया है
सावन आया है, सावन आया है..
मनवा इतना हर्षाया है....
पपीहा बन बरसात में ...
ईत उत डोल आया है...
नदी अपने में जल रुपी प्रेम भर..
सागर से मिलन को बेसुध दौड़ी है...
मन करे इसे पकड़ लूं...
इस सावन की उम्र थोड़ी है ....
(रामेश्वरी )
Saturday, August 20, 2011
Friday, August 19, 2011
naari
बंद दरवाजो में दबी नारी की आह है..
कहीं रोशनदानो के भीतर भी ..
उनके जीवन का गहन अँधियारा है..
झरोखों के गिरे परदों में ...
कहीं मिटती उनकी अस्मत है...
वो कोश रही अपनी नारी होने की किस्मत है.
वाह रे नारी क्या किस्मत है ...
जुबान खोले तो बेहयाई है..
दबा जुबान जान पर बन आई है....
एक बात आम है...
वो अपने ही घर गुलाम है...
न ढोर न ढिकाना है...
वो पिता का आशियाना था ...
ये पति का आशियाना है....
जुबान दबाने को अपने अड़े खड़े हैं..
बाहर दुनिया में कितने ही गिद्ध खड़े हैं....
क्यूंकि जहाँ जुबान चलाई है ..
उसी ने बाहर की राह दिखलाई है...
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