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Wednesday, December 26, 2012

है कौन.




पड़ोस में बसता है कौन..
दोस्ती, दुश्मनी में सस्ता है कौन ...?
देखा नहीं कभी ..
पड़ोस में लाश बन सड़ता है कौन ?

कितना गरीब वो,प्रकृति का उसे एहसास नहीं..
शीतल हवा, सर्द धूप होती है क्या, समय पास नहीं ..
जब हो पास लिमोजीन, पैदल राह चलता है कौन? 

साए से अपने उन्हें डर लगता है क्यूँ?
डाकू के घर डाकू घुसा है कहीं?
ज़रा सी आहट में रातों को देखो ..
इस मोहल्ले में निंद्रा से जगता है कौन ?

चंद कागज़ के टुकडो की खातिर ..
लहू बहाया ये किसने रिश्तों का ?
कौन फिर भी बेचैन है, चैन हासिल नहीं..
उसकी बेचैनी का अब सबब है कौन?

शोर अपनों का, गरीब की गली में ..
सन्नाटा है अमीर मोहल्ले में ...
इस सन्नाटे को चीर फिर इतना हँसता है कौन?

सुबह की प्रभा लाली ।
डोल डाली डाली ।
उड़ी चिरैया,  तिनका मुख डारि ।
घने पातों की ओंट में ..
गिद्ध नज़रों से छुपा ..
सपनो का घौंसला सजा ..
 
बह रही शीत लहर ..
घुमती निगाह, ज़रा ठहर ..
माँ का पहरा,..
चारों  पहर ..

बना ढाल पंखों की ..
सेंक रही नवजात चूजे ..

मान मेरी ऐ इंसान ..
दो दाने तेरी थाल के..
इन मासूमों का सारा जहाँ ..रामेश्वरी 

Friday, December 14, 2012

उनका पता

कागज़ पर उनका पता लिखा था ।
लफ्ज़ उजागर थे नहीं, बस उनका चेहरा दिखा था ।
हैरां थी ..वो ये क्या लिख गए ।
पूछा "जनाब " ..
ये कौन नगरी, कैसा देश ..
जो दिखता नहीं।
बोले जनाब ।
दुनिया एक बाज़ार ।
बिकाऊ नहीं मेरा आचार ।
मेरे ह्रदय तक आने का रास्ता ।
इस दुनिया से आता नहीं ।
.. ।रामेश्वरी
नंगी वहशी निगाह उनकी ।
हिजाब जो हम न ओडे ।
बेहया हमें कह गए ।।।रामेश्वरी
माटी फूटा प्रेम अंकुर ।
दो हथेलियाँ में ।
तुम्हारे लिए ।

दो नैनो का आँगन ।
प्रेम का बिछौना ।
तुम्हारे लिए ।

बिन सजना काहे सजना ।
विरहन का इंतज़ार ।
तुम्हारे लिए ।


दो पल का मिलन ।
रणभूमि की पुकार ।
तुम्हारे लिए ।

सीप तुम, हम मोती ।
प्रीत का हार ।
तुम्हारे लिए ।

नन्हा दिया रखा द्वार ।
इस आँगन अन्धकार।
तुम्हारे लिए ।

सजन चुपके आना पार ।
आँगन ऊँची दीवार ।
तुम्हारे लिए ।

विष पिया, पत्थर पड़े।
अपनी जिद अड़े ।
तुम्हारे लिए ।

झलक को, साँसे थमी ।
विरही नैन निष्प्राण ।
तुम्हारे लिए ।

रामेश्वरी

Thursday, December 13, 2012

कडकडाती ठण्ड में..
दांतों का गुनगुनाना ..
नसीब अपने ..
पत्थर का सिरहाना ..

फुटपाथ का बिस्तर ...
मिटटी की रजाई ...
देखो सेज़ ये कैसी
मैंने सजाई ...

खुला नीला आसमान  ..
ओड़ते हैं हम ..
भोर भये ..
चुस्ती से दौड़ते हैं हम ....
बड़ी सी गरीबी का ..
ये छोटा सा है गम ...
इक माँ की कोख से ..
लिया था जन्म ..
दूजी की  आगोश में ..
निकलेगा ये दम ...रामेश्वरी

Sunday, December 9, 2012

वही टेडी गलियाँ गौरी की, वही उसका गाँव ।
वही निर्जल नैन उसके, वही कीकर की छाँव ।
वहीँ शीतल वाणी उसकी, वहीँ फूंके मेरे पाँव ।
(रामेश्वरी )

गैरों की महफ़िल में कोई गैर ना मिला ।
अपनों की भीड़ में, बता क्यूँ गुमसुम थे हम ।।
जो भी गम मिला, छिपने को दिल तलाशता मिला ।।रामेश्वरी 

Sunday, November 18, 2012

वो पगली ।।

बेसुध थी वो ..
अबोध बच्ची सी ..
वो पगली ।।

ढांप सके लाज अपनी ..
ये सुध कहाँ .
सीने से कतरा ..
लहराती फिर रही .
मासूम तितली सी ..
वो पगली।।

दुप्पटा कहाँ,  वो अब कतरन हो गया ।
वहशी हावी उस पर जबरन हो गया।
योवन बालपन की ओर ..
एक कदम और उतर गया ।
फिर भी निश्छल।।
हंस रही ..
वो पगली।।

घर नहीं द्वार नहीं।
दुनिया से खुदी से ..
उसे सरोकार नहीं।
रिश्ते नहीं, 
धर्म जातें नहीं।
मिटटी का टीला ..
लोट पॉट जिस पर वो।
वही उसका ..19/11/12
घरौंदा हो गया ।
ठण्ड से सिकुड़ रही।।
वो पगली।।


ले वो किसकी आड़ ।.
ललचाई जीभ ..
खड़ा वहसी,  नज़रें  गाड़ ..
ह्रदय देख ये सब।।
होशमंद होने पर।
"रामी" शर्मिंदा हो गया ।
हमसे तो भली ।
वो पगली।।।।।रामेश्वरी 19/11/12






Saturday, November 10, 2012

वो पूछते हैं कितना करती हो याद हमें ।
जनाब, कह उठे कशमकश में हम ।।
दूरियां यादें लाती हैं पर यादों में दूरियां नहीं होती ।।। रामेश्वरी 

रुखसती पर मेरे

रुखसती पर मेरे ए हमसफ़र ।
जो था पास जिसके, वही तोहफा लाये ।।
लाखो तारें बरसाए आसमान ने ।
ज़मीन ने पत्थर राहों में बिछाये ।।।।
दरिया ने दिए आंसू मुझे।।।
बाबुल से दूर बहा लेई जाए।
लाया पवन उड़न खटौला बिदाई को मेरी।।
अग्नि दे गयी जलन सखियों को मेरी।।।
इस बरस बाबुल करे, हमारी बिदाई।।।।
रामेश्वरी

Friday, November 9, 2012

apna apna yudh

अपनी अपनी  महाभारत सबकी ..
अपनी अपनी लडाई ।।
अपना अपना कुरुक्षेत्र सभी का ।
अपनी अपनी चडाई ।।
अपना अपना लक्ष्य ..
अपना अपना  भेद सभी का ।
अपने अपने  रावण सब..
अपना अपना  राम सभी का।
अपने अपने  मंदिर सबके ..
अपनी अपनी खुदाई..
अपने अपने रब सबके ।..
कलयुगी हनुमान ने
लंका की की बडाई।।
गर्म की जेब अपनी।।
अयोध्या में आग लगायी।।।
अपनी अपनी तिजोरी सबकी।।
अपने अपने खीसे ..
कोई किसी को रोटी पूछता नहीं।।
अपना अपना अन्न सभी का।।
अपनी अपनी पिसाई।।।
दौड़ रहे सब अंधी दौड़ में ..
कौन किसी का पिसे ।।
अपने अपने पत्थर, हाथ सभी के।।
अपने अपने शीशे ।।
अपना अपना श्रम सभी का।।
अपना अपना करम।।
आज के श्रवन को।।
गरीब बाप पर शरम ।।।
अमिताभ को उसने देखो।।
पिता से ऊँची पदवी दिलाई।।।
अपने अपने आँगन सबके ।
अपनी अपनी लुगाई ।।
बंटवारे में बंट रहे।।
माता पिता ने मौत की गुहार लगाई।।। रामेश्वरी 9/11/12

Thursday, November 8, 2012

बिन कजरा, सजन को, नैन मेरे भाये ना ।
खिंची लक्ष्मण रेखा नैनो में कजरारी, बिन तेरे इन नैनो में कोई समाये ना ।।
हमने कहा, गुज़र जाओ, हमारी भी राहों से ...
सुना है, उनके आने से बहार आती है।।
सुन आरजू मेरी वो फरमा गए
गुज़र जाते हम तेरी राहों से ।।।

पर सुना है, सच्चे आशिक की राहों में कांटे होते हैं ....
गुज़रा जो तेरी राहों से मैं, लहूलुहान मेरा पाँव होगा ।
लेकर झोली में आरजू, खड़ा द्वार मेरे सारा जहाँ होगा ।।रामेश्वरी

Tuesday, November 6, 2012

शीतल ओंस की बूँदें, गिरी गुल पर जब।।।
गुल हया से पिघल गया।।।
किसी ने समझा मोती हमें ..
कोई नीर समझ हलक से निगल गया ।।।।रामेश्वरी ..गुड नाईट फ्रेंड्स 

Monday, November 5, 2012

होंगे अंदाजे बयां एक दिन कुछ ख़ास , 
हम फकीरों के , 
होके तुझ पे कुर्बान ख़त्म होंगे जब निशान 
हम फकीरों के, 
भरता रह जाएगा तू कोने बे हया तिजोरी के, 
साथ मगर जायेंगे बस काम 
हम फकीरों के, 
कर ले इजाफा दुआओं में अपनी , 
दर्द बाँट ले किसी का , बेरहम सुन पैगाम
हम फकीरों के,

न रहे मालिक इन किलों और मीनारों के,
याद कर - कर के सजदों में हैं लोग, खड़े हैं बुत सरे आम ,
हम फकीरों के ,
 
मेरे एक मूर्ख मित्र ने पुछा , 
यार इन बड़ी-2 , गाड़ियों ,में कौन बैठा होता हैं, 
कौन रहता हैं इन बड़े -2 आलिशान बंगलों में ..
कौन करता हैं खरीददारी इन बड़े- 2 माल्स में 
कौन खता हैं मैकडी , और kfc के बरगर या चिकन 
कौन नाचता है रात भर इन पञ्च सितारा होटल -क्लबों में ?

मैंने कहा धत्त 
इतना भी नहीं पता ?
इनमे एक रहता है नेता जिसे दिन रात गरीबों की चिंता रहती हैं , 
एक रहता हैं सरकारी खजाने का मालिक जो नेता को जनहित में पैसा खर्च करने के लिए देता हैं,
एक रहता हैं ठेकदार ,और एक इंजिनियर जो ठेके पास करता है गरीबों के कल्याण के लिए
देश की तरक्की के लिए
एक रहता हैं जो बिल पास करता है ये कह कर की काम हो गया है ,
गरीब खुश हो गए हैं और मैंने खर्चे का हिसाब ले लिया हैं,
वहीँ बगल में गरीबो के लिए जन कल्याण की सोसाईटी चलाने वाला रहता हैं
वहीँ रहता है वो पुलिस वालों का अफसर जिसे डंडे चलने होते हैं
निरीह जनता पर जो पूछती हैं की हमारा हक़ कहाँ गया ?
वहीँ एक उनका वकील भी हैं ..उसका काम है न्याय मांगले वालों को जवाब देना
वहीँ कहीं उनके गुरु खलीफाओं की मजारें भी हैं,
जिन पर वो गाहे बगाहे मालाएं चढ़कर प्रेरणा लेते हैं ..
वहीँ बगल में रहता हैं उनका विपक्षी जो बार -2 चिल्लाता हैं
अभी गरीबी टूर नहीं हुई , घोटाला हुआ हैं, सर्कार गिराओ , इस्तीफा दो !

अपनी बड़े-2 बंगलों से निकल अपनी बड़ी -2 कारों में शान से बैठे
ये घृणा की दृष्टि से देखते हैं हम गरीबों को
और ये भी पूछते हैं की ये कौन सड़कों पर कीड़ों के तरह रेंग कर चलते ,
गंदे नाले के पास टाट के झोपड़ों में, दिन बिताते
पेट पीठ एक किये हुए ?
और फिर उनके होठों पर एक मंद हंसी आती हैं ..
अभी बहुत कुछ करना हैं गरीबों के लिए ..!
विजय मलय जी को ..
देल्ली ऑटो रिक्शा चालकों से सलाह ..
मलाया साहब परेशान न हों...हमारे सुझाव माने 

१. जहाज को दो शिफ्ट में चलायें , और पेट्रोल की जगह CNG का इस्तेमाल करें 
२. जहाज को ड्राईवर को ही किराये पे दे दो .
३. पहले मीटर डाउन न करें..बीच हवा में किराया मांगे 
४. डेल्ही से दुबई जाने वाले जहाज को साइबेरिया से घुमा कर पहुंचाए इससे किराया बढ़ा मिलेगा 
५. जहाज ओवरलोड चलायें, और कॉकपिट में पायल
ट के दोनों बगलों में भी सवारी बिठाओ
६. सब देशों की पुलिस एक सी है ,अतः आस पास के बॉर्डर देशों में एंट्री बंधवा कर सवारी छोड़ आओ
७.सवारी से वेटिंग का चार्ज लें , और नाईट चार्ज डबल कर दें.
८.सवारी से किराया मांगने से पहले उन्हें अपनी किंगफ़िशर की एक बोतल जरूर पिलायें और फिर जब मौसम बन जाए तो हाथ जोड़ कर किराया मांगे और कहने घर पे बच्चे भूखे हैं,,, आपकी शानो शौकत देख कर सवारी कहती है इन्हें भाड़े के क्या जरूरत हैं ...किंगफ़िशर में ८०-९०% पानी ही तो होता है सिर्फ ८% (अल्कोहल ) खरा माल ..कितना बड़ा गुनाह करते हो ...
थैंक्स

Thursday, November 1, 2012


रहस्य राखे चरखा भी,  बैठा कुम्हार रहे जोउन ।
माटी आई किस घाट की, ना जान सका ये कोउन ।।

ज्यूँ सम्बन्ध शब्द का जिह्वा से, एक चले दूजी आये।
त्यूँ पाट चले जब चरखे के, भांडे माटी से आकार लेई जाये ।।रामेश्वरी।।।।।।

वो मंदिर गया, मस्जिद गया।।
किसी के दिल तक वो गया नहीं।।।।।
कहा था किसी शायर ने।
दिल एक मंदिर है।।।।।।

Monday, October 29, 2012

एक अच्छाई सौ बुराई पर भारी होती है और एक बुराई हज़ार अच्छाई को मिटा भी देती है।।।।।।। राम और रावन इसके अच्छे उदाहरण हैं।।।।।
तारें टूट चुकीं, पाप रूपी छिद्र भर चुके, धुन मधुर बजा रहे हैं साज़।।।
राम हैरान हैं, हाथ रंगे भ्राता लहू से जिनके, वही मुझे पूज रहे हैं आज ।।।
रावन मंद 2 मुस्काये देख, अरे रावन ही रावन को जला रहे हैं आज ।।।
सच देशद्रोही है, झूठ पहने हैं देखो शहंशाह का ताज ....रामेश्वरी
तेरी बेरुखी से देख हम खाक भये , काजल बन गए।।।
इन नैनो पर अब फ़िदा हैं वो, मेरी मय्यत उठने के बाद।।।।।।।रामेश्वरी
खून के रिश्ते ।
खून यूँ कर गए ।।
रंग डराता ।।।

रिश्ते हैं सस्ते ।
ये बेरंग हो गए ।।
घर सताता ।।।

देख फरिश्ते ।
भाई2 यूँ कट गए ।।

धर्म डराता ।।।

द्वार दो रास्ते ।
रंग हीर, वो पीर।।
सूफी ये गाता ।।। रामेश्वरी
हरीतिमा, किरणे, खुशगवार

ताक सकी जहाँ तक,..
दो नयनों की सीमा ..
धरा ओढ़े चादर हरीतिमा ..
मृत्तिका भी लिपटी अब।।
धरा से यूँ मुंह खोले।।।
दिनकर अब गर्म किरणे छोड़े ..
देख मौसम खुशगवार ...
बावरे बादल इत उत डोले ....

सुन सको तो सुनो रख धीर ..
बहता नीर कोउन धुन बोले।।। रामेश्वरी
GOOD MORNING FRIENDS
कोई अश्क बहा कर रो दिया।
कोई अश्क छुपा कर रो दिया ।
हम रोये ऐसे देख मेरे दोस्त ..
हम जब हँसे सारा ज़माना रो दिया ।। रामेश्वरी
उजाड़ दी वो सीडियां जिनसे उतरे थे वो दिल ओ ज़मीन पर, नासूर देने के वास्ते ।
अब गर्द लिए हाथ फिरते हैं हम, सुना है नया मकां बना रहे हैं वो बसर के वास्ते ।। रामेश्वरी
खफा था वो मुझसे, हर गुल उसकी जुबां से जुदा जुदा सा हो गया।
आज बहता लहू चूमे कदम उसके, सुना उसका कद अब बड़ा हो गया ।। रामेश्वरी
पुराने खंडहर फिर कोई बेल लटकी है।
लगा कभी, जैसे, किसी की जान आज भी अटकी है ..
हर क्षण हरीतिमा सा रंग सूखे तन पर चाहती है वो ..
हर भूले भटके राही को क्यूँ लुभाती है वो।
शाख अब झड़ चुके हैं उसके।
अब हर सावन से दूर है वो, 
इतनी लाचार मजबूर क्यूँ है वो ?..
पात अब शीत लहर से भी कंपकपाते नहीं ..
बस थोडा सा और जीने को मजबूर है वो ? ...रामेश्वरी 26/10/12
रोक लो वक़्त है।।
अब मेरे पर खुलने लगे है।।।
आकाश विशाल सही।।
ये उडने को मचलने लगे हैं ।।।
नयी उमंग, नयी उड़ान है अभी मेरी ।।
ये बादल संग उलझने लगे हैं ।।।
रंग भरे हैं इसमें सभी मन के मैंने ।।
रोक लो बारिश की बूंदों को ।।।
ये नीर से उसके पिघलने लगे हैं ।।।
वो लाये हैं जकड़ने पर मेरे, जंजीरे संग ।।
हुआ आज यकीन, वो अब नारी से डरने लगे हैं .......रामेश्वरी
आये न कोई ख्वाबों में, लो हमने खुली आँखें मूंद लीं ।
बंद थे द्वार नैन के, देख किसी ने नयी दुनिया ढूंढ ली ।।।
ये बेजुबान लफ्ज़ मेरे,..
तड़प रखते हैं भीतर अपने।।
फिर क्यूँ कोई आता है।।
लफ़्ज़ों में लिए खार अपने।।
खोजा घट।
तज सगर पट ।।
जग सराय ।।।

रूह बसे हो ।
जे कौन मार पाए ।।
विष पिलाये ।।

श्वेत वस्त्र हैं ।
कौन रंग चढ़ाये ?

ये मैला जाए ।।।

हाथ वीणा ।
सबहूँ मोह छीना ।।
लो समझाए ।।।

मीरा दीवानी ।
राधे सौत ना जानी।।
राणा मनाये ।।।

(रामेश्वरी )
कान्हा सा सांवला सलोना रूप ।
कोउन कोसे, कोउनों मन ये भाये ।।
अपने हिस्से की धूप सबहूँ पाए।।।
(रामेश्वरी )
जब से कह दिया,  आंसू बेशकीमती मोती होते हैं ।
आलम ये है अब दोस्तों, देने सौगात मोतियों की उन्हें, हर रोज हम रोते हैं।। रामेश्वरी 
ना करो नुमाईश खुद की, यहाँ कोई खुदा नहीं है ।
पंथ भिन्न हैं राही सुन ले, ऊपर वाला जुदा नहीं है।।
उठे हाथ ऊपर दुआ को, दो गज ज़मीं काफी यहीं है ।।। रामेश्वरी ...

आत्मसात करें।
सुगंध महकते पुष्पों की ।
करें संगत ।
इन मचलती पुरवाई की ।
समां ली है अब ।
मद्धम2 उठती सुगंध माटी की ।
बन जाऊं जी भर इंसान कुछ पल ।
जाने कौन ..
गला घोंट दे, इस इंसानियत की ।
आ गया समय अब ..
पुकार लूं नीलकंठ को।
जाने कौन इच्छा रखता  है आज भी ।
खुली हवाओं में  ज़हर मिलाने की।।।।।रामेश्वरी 

Thursday, October 25, 2012

तेरी बेरुखी से देख हम खाक भये , काजल बन गए।।।
इन नैनो पर अब फ़िदा हैं वो, मेरी मय्यत उठने के बाद।।।।।।।रामेश्वरी
किसी ने कहा कुछ भी हो लिख बयाँ किया करो।।।
आज वो खफा है क्यूँ फिर, बेवफा लिखने के बाद ।।। रामेश्वरी
बूँद2 ने भरा सागर, सागर में तन्हाई नहीं होती ।
तन्हाई का आलम पूछो, सीप में तनहा कैसा है मोती ।। रामेश्वरी ..

खून के रिश्ते ।
खून यूँ कर गए ।।
रंग डराता ।।।

रिश्ते हैं सस्ते ।
ये बेरंग हो गए ।।
घर सताता  ।।।

देख फरिश्ते ।
भाई2 यूँ कट गए ।।
धर्म डराता ।।।

द्वार दो रास्ते ।
रंग हीर, वो पीर।।
सूफी ये गाता ।।। रामेश्वरी 

Monday, October 15, 2012

क्या होगा इस देश का...


क्या होगा इस देश का...
भरोसा नहीं यहाँ  किसी भेष का ...

देशप्रेमी जहाँ देशद्रोही कहलाये जाएँ...
कालिख चेहरों पर हो जिनके...
श्वेत उनका भेष होगा...
सोच क्या उस  देश का होगा ?

चंद ईंटो के लिए भाई भाई में द्वेष होगा...
फर्क बस इतना होगा...
कुछ ईंटो में मंदिर लिखा होगा, कुछ में मस्जिद लिखा होगा..
बचा सिर्फ भट्टी में, खाक  ए इंसानियत शेष होगा......

सोयी है गहरी निन्द्रा प्रजा अभी..
नींद का थोड़ा समय अभी शेष होगा...
जाग जाओ मिटा दो तिमिर भीतर का ..
जनता का जल्द फिर क्रांति का उद्घोष होगा...

नवरात्र हैं...
अधर्म से फिर धर्म का कलेश होगा...
दस सर फेंको अपने धड से...
अहंकार मिटेगा,  जल कर भस्म होगा..
कुछ न फिर अवशेष होगा..


हर गली कूचे अब हिंसा बिखरी है...
एक भाई के हाथ तलवार, दूजे हाथ खुकरी है 
यकीं क्या होगा, आने वाली पीढ़ी को...
अहिंसा परम धर्म..
कभी इस देश का रहा सन्देश  होगा.....

रामेश्वरी .

Thursday, September 27, 2012

समीप सागर के खड़े हो...
गहराई मापना चाहते थे हम...
सागर है कि, हमें निगल बैठा...
और कहता रहा यही...
मापनी है गहराई प्रेम की..
तो ए आशिक पूरा डूब कर देख......रामेश्वरी
जब मन करा मर मिटे हम ...
पतंगा बन नूर में तेरी आ बैठे ...
रात भर का साथ रहा हमारा ..
पहल पहर खुद को राख बना बैठे ....रामेश्वरी

Wednesday, September 26, 2012

हर आएना दिखाता है तस्वीर सूरत की, चीर सीना आएना निहारा न कर ....
दिल की असल सूरत दिखा सके, ऐसा आएना ए खुदा तू भी इख्तियार कर.....रामेश्वरी

पात शाखाओं के, हवा के झोंकों से जो हिले..
हम समझ क़दमों की आहट तेरी,  जब निकले ...
बेसुध से कदम हर बार टकराए,  पत्थर दिल से...
तेरा दिल था नहीं, गली में हज़ार पडे दिल मिले ....
अब शायद चोट नाम ही हमारी ज़िन्दगी को मिले ...
रामेश्वरी 

Tuesday, September 25, 2012

अक्सर सुना है संगत का असर होता है..
धरती के करीब रहकर, सागर खारा क्यूँ..
बदलियों के आंसुओं से, मीठा दरिया क्यूँ ...
लिपट संग सर्प, चन्दन में इतनी महक क्यूँ..शु प्रभात रामेश्वरी
शब्द एक है..
एक उसकी भाषा है ..
पर भेद ज़मीन आसमान का है..
एक को सोने का पालना..
दूजे घर खून से लहूलूहान पालना है...
एक झूला कर सोने का पालना ..
देता सुकून की नींद है...
दूजा चीर कर शरीर, लगा मौत गले..
कारण............
वही संतान को अपनी पालना है...

हे इश्वर एक पालना तू भी रख...
इश्वर होने का फ़र्ज़ पालन कर ...
भूखे अधरों पर दो रोटी डाला कर....रामेश्वरी ....कई लोग रोज खून भरा खेल दर्शकों को दिखा कर अपने बच्चों के लिए दो जून की रोटी कम पाते हैं....
डोली से आई जब..
चाह सभी की..
उनकी खुशियों को ..
आसमान मिले..
स्वपन चकनाचूर होए ..
जब कन्या को ना आस ना मान मिले......रामेश्वरी
हैरान हूँ मैं, दो शख्स एक सी सोच अब रखने लगे हैं...
जब से दोनों बेवफाई का ख्याल दिल में रखने लगे हैं....रामेश्वरी
भीड़ में तन्हाई में...
दिल की रहनुमाई में ..
एक चेहरा अपना सा लगा है ..
लगता है प्यार अब ..
दोजख में भी मिलने लगा है ....रामेश्वरी
अनजाना शहर है, तो अनजाने ही बसर होंगे...
मुखौटे ओडे चल रहे, कुचे२ नफरत ए चेहरे हसर होंगे ...

प्यार खोजोगे कैसे काफिर, मुखौटे प्यार पर बेअसर होंगे ..
गली2बिकती नफरत है, दिलों में प्यार के पंछी बसर होंगे ..रामेश्वरी ...
पुन्य बंट रहे ..
अब तो पाप करने की छुट है ..
सुना है इस बार गंगा में पानी अटूट है ...रामेश्वरी ..गंगा माँ का आदर कीजिये उसे मैला न कीजिये...
आज फिर सोचा..
खींच आकाश को..
धरती पर पटक दूं...
रख लाखों तारे वो..
अपनी मुस्कान में ..
जैसे हमें जलाता है वो ..
जलती उल्काएं फ़ेंक..
दीपावली मनाता है वो ...रामेश्वरी

सांस लेना भी दूभर है अब

सांस लेना भी दूभर है अब...
रोक रखी है वर्षों से..
चहुँ और बू है ..
कहीं किसी नाले में ..
सड़ी गली लाशों की...
कहीं कोई अबला फूंकी गयी..
घून लगी कपासों सी...
कहीं धूंआ है हवा में ..
दंगे निगल गए, जले घर कई ..
मिटटी पलित हुई, जिंदा लाशो से ..

ह्रदय अक्सर पूछता मुझसे मेरा ..
बता अब कब सांस मिलेगी मुझे ....
कैसे जीवित रखूं तुझे......रामेश्वरी ..शु प्रभात सभी मित्रगनो को...
दर दर खायी हैं ठोकरें इतनी,  अब दर्द का असर नहीं होता...
ज़िन्दगी अब बंज़र बेजान हुई, इसमें खुदी का बसर नहीं होता....

Sunday, September 16, 2012

मेरी एक दोस्त के पिता का देहांत हुआ, मैं भी श्रद्धा सुमन अर्पित करने वहां गयी थी | मेरी दोस्त बहुत दुखी थी, वो चुपचाप एक कोने में बैठी रो रही थी |   उसके परिवारजन और सगे सम्बन्धी भी वहीँ शोकाकुल अवस्था में थे |   मैंने अपने दोस्त की आँखों में न भरने वाला जख्म देखा और महसूस किया जो उसके पिता की मृत्यु से उसे मिला | वो अपने पिता से बहुत स्नेह रखती थी उसके लिए वही उसकी माता भी थी |  पर तभी उसकी बड़ी बहिन आई और जोर जोर से चिल्ला कर रोने लगी, सारा घर उसने सर पर उठा लिया |  वो ये शोर तब तक मचाती रही जब तक अर्थी को अंतिम संस्कार के लिए नहीं उठाया गया|  लोग कहने लगे देखो कितना प्यार स्नेह रखती है अपने पिता से|   क्या शोर मचाना चिल्ला२ कर रोना ही सच्चा स्नेह का प्रतीक था, मेरी दोस्त जो आज तक वो हादसा भुला नहीं पायी, उसका स्नेह कम था| उस दिन यकीन हुआ वाकई ज़माना दिखावे का है जब कुछ ही पल बाद वो हंस रही थी  और शमशान घाट  से सम्बन्धियों का इंतेज़ार किये अपने घर लौट गयी |  ......रामेश्वरी 
बांटे प्रसाद ...
मार बालक लात ...
कैसा ये धर्म .....
रूठे हैं भगवान् ..

पूजा पाथर ..
पूजा बाल हृदय ?
क्या भक्ति मर्म ?
ओढ़ी डोंगी चादर .
भरा पाप सागर ..

रामेश्वरी
ये दौर है मजहब और मतलब का..
क्यूँ मोहब्बत की उम्मीद लगाते हो....
ये वो ख्वाब हैं, जो पूरे न होंगे कभी...
कोई न पोछेगा आंसू तेरे, मत बहा..
क्यूँ इन्हें खवाबों की दुनिया में बहाते हो ......रामेश्वरी

Thursday, September 13, 2012

जो मैं रंग्रेजन बन पाती .

काश जो मैं रंगरेजन होती...
ये हथेलियाँ, दुःख भरे जीवन को...
रंगने में तेज न होती ?..
रंग पाती अंधेरों को ..
मद्धम पड़ चुके स्वप्नों को ..
वो इन्द्र धनुष जो जाता था ..
मेरे ह्रदय से तेरे ह्रदय तक..
फीका अब पड़ चुका ..
रंग भर पाती उस क्षितिज को ..
जो माध्यम था मिलन का हमारा...

अब तो समग्र रंग एक हो ..
ह्रदय पर धूल कालिख भरी बन चुके हैं .....
काश उमंग का रंग भर पाती..
जो मैं रंग्रेजन बन पाती ........रामेश्वरी....

एक सिरा

एक सिरा तुम्हारे हाथ..
एक सिरा मेरे साथ साथ ...
लहराते रहे दोनों सिरे हम .
लहराती पवन में ..
फिर भी देखो...
ह्रदय है कि गिला सिला सा पड़ा है .....
जैसे रूठा सा है वो धूप से..रामेश्वरी