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Wednesday, December 26, 2012


सुबह की प्रभा लाली ।
डोल डाली डाली ।
उड़ी चिरैया,  तिनका मुख डारि ।
घने पातों की ओंट में ..
गिद्ध नज़रों से छुपा ..
सपनो का घौंसला सजा ..
 
बह रही शीत लहर ..
घुमती निगाह, ज़रा ठहर ..
माँ का पहरा,..
चारों  पहर ..

बना ढाल पंखों की ..
सेंक रही नवजात चूजे ..

मान मेरी ऐ इंसान ..
दो दाने तेरी थाल के..
इन मासूमों का सारा जहाँ ..रामेश्वरी 

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