Search My Blog

Wednesday, December 26, 2012

है कौन.




पड़ोस में बसता है कौन..
दोस्ती, दुश्मनी में सस्ता है कौन ...?
देखा नहीं कभी ..
पड़ोस में लाश बन सड़ता है कौन ?

कितना गरीब वो,प्रकृति का उसे एहसास नहीं..
शीतल हवा, सर्द धूप होती है क्या, समय पास नहीं ..
जब हो पास लिमोजीन, पैदल राह चलता है कौन? 

साए से अपने उन्हें डर लगता है क्यूँ?
डाकू के घर डाकू घुसा है कहीं?
ज़रा सी आहट में रातों को देखो ..
इस मोहल्ले में निंद्रा से जगता है कौन ?

चंद कागज़ के टुकडो की खातिर ..
लहू बहाया ये किसने रिश्तों का ?
कौन फिर भी बेचैन है, चैन हासिल नहीं..
उसकी बेचैनी का अब सबब है कौन?

शोर अपनों का, गरीब की गली में ..
सन्नाटा है अमीर मोहल्ले में ...
इस सन्नाटे को चीर फिर इतना हँसता है कौन?

सुबह की प्रभा लाली ।
डोल डाली डाली ।
उड़ी चिरैया,  तिनका मुख डारि ।
घने पातों की ओंट में ..
गिद्ध नज़रों से छुपा ..
सपनो का घौंसला सजा ..
 
बह रही शीत लहर ..
घुमती निगाह, ज़रा ठहर ..
माँ का पहरा,..
चारों  पहर ..

बना ढाल पंखों की ..
सेंक रही नवजात चूजे ..

मान मेरी ऐ इंसान ..
दो दाने तेरी थाल के..
इन मासूमों का सारा जहाँ ..रामेश्वरी 

Friday, December 14, 2012

उनका पता

कागज़ पर उनका पता लिखा था ।
लफ्ज़ उजागर थे नहीं, बस उनका चेहरा दिखा था ।
हैरां थी ..वो ये क्या लिख गए ।
पूछा "जनाब " ..
ये कौन नगरी, कैसा देश ..
जो दिखता नहीं।
बोले जनाब ।
दुनिया एक बाज़ार ।
बिकाऊ नहीं मेरा आचार ।
मेरे ह्रदय तक आने का रास्ता ।
इस दुनिया से आता नहीं ।
.. ।रामेश्वरी
नंगी वहशी निगाह उनकी ।
हिजाब जो हम न ओडे ।
बेहया हमें कह गए ।।।रामेश्वरी
माटी फूटा प्रेम अंकुर ।
दो हथेलियाँ में ।
तुम्हारे लिए ।

दो नैनो का आँगन ।
प्रेम का बिछौना ।
तुम्हारे लिए ।

बिन सजना काहे सजना ।
विरहन का इंतज़ार ।
तुम्हारे लिए ।


दो पल का मिलन ।
रणभूमि की पुकार ।
तुम्हारे लिए ।

सीप तुम, हम मोती ।
प्रीत का हार ।
तुम्हारे लिए ।

नन्हा दिया रखा द्वार ।
इस आँगन अन्धकार।
तुम्हारे लिए ।

सजन चुपके आना पार ।
आँगन ऊँची दीवार ।
तुम्हारे लिए ।

विष पिया, पत्थर पड़े।
अपनी जिद अड़े ।
तुम्हारे लिए ।

झलक को, साँसे थमी ।
विरही नैन निष्प्राण ।
तुम्हारे लिए ।

रामेश्वरी

Thursday, December 13, 2012

कडकडाती ठण्ड में..
दांतों का गुनगुनाना ..
नसीब अपने ..
पत्थर का सिरहाना ..

फुटपाथ का बिस्तर ...
मिटटी की रजाई ...
देखो सेज़ ये कैसी
मैंने सजाई ...

खुला नीला आसमान  ..
ओड़ते हैं हम ..
भोर भये ..
चुस्ती से दौड़ते हैं हम ....
बड़ी सी गरीबी का ..
ये छोटा सा है गम ...
इक माँ की कोख से ..
लिया था जन्म ..
दूजी की  आगोश में ..
निकलेगा ये दम ...रामेश्वरी

Sunday, December 9, 2012

वही टेडी गलियाँ गौरी की, वही उसका गाँव ।
वही निर्जल नैन उसके, वही कीकर की छाँव ।
वहीँ शीतल वाणी उसकी, वहीँ फूंके मेरे पाँव ।
(रामेश्वरी )

गैरों की महफ़िल में कोई गैर ना मिला ।
अपनों की भीड़ में, बता क्यूँ गुमसुम थे हम ।।
जो भी गम मिला, छिपने को दिल तलाशता मिला ।।रामेश्वरी