फिर छत की मुंडेर
काक करें है कांव ।
इस कलयुग दौर में
ना खोजो मेरा गांव ॥
ना गंगा इतनी
पावन रही ।
ना सागर में ठहराव ।
काठ भी फफूंद रखे
देख अपना चाव ।
देख महंगाई
काँप रही
मेरी टूटी नाव ।
हे अतिथि !
ना खोजो ।
ना खोजो, मेरा गांव ॥ (रामेश्वरी )





