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Tuesday, July 14, 2015

हे अतिथि ! ना खोजो । ना खोजो, मेरा गांव ॥

फिर छत की मुंडेर 
काक करें है कांव । 
इस कलयुग दौर में 
ना खोजो मेरा गांव ॥ 

ना  गंगा इतनी 
पावन रही । 
ना सागर में ठहराव । 
काठ भी फफूंद रखे 
देख अपना चाव । 
 देख महंगाई
काँप रही  
मेरी टूटी नाव । 
हे अतिथि !
ना खोजो  । 
ना खोजो,  मेरा गांव ॥ (रामेश्वरी )

Saturday, May 2, 2015

फिर खिले हैं 
 इस बार 
 अनेको स्वेत पुष्प 
 पहाड़ों में । 
 शायद मौन समझौता 
 हुआ
 प्रकृति, मानव बीच 
जाड़ों में । 




क्यों क्रोधित ज्वलित है 
दुल्हन । 
क्यों सीना चीर 
 रक्त बहा 
नदी नालों में । 
सुना हमने 
ग्रहण लगा 
कहारों में । रामेश्वरी 











Sunday, April 5, 2015

कल और आज

आज भी 
अकाल है, बाढ़ है 
भूखे बच्चे हैं 
भूख है 
लाचार माँ है 
सूखे खेत हैं
खलियान हैं
पर वो लंगड़ा बाप नहीं

मय हैं
मयखाने हैं
हर ओर शराबी बाप कहीं ।
अब ना हल है
ना वो कल है
ना वो मदर इंडिया
गली कूंचे वेश्यालय  

 हर कहीं ॥ 

क्षणिकाएं ( एक कोशिश )

सड़कें वहीँ रहती हैं, 
प्रदर्शनकारी बदल जाते हैं । 
डंडा वही , पटवारी वही, 

कुछ नए , घाव उभर आते हैं । 
मंच वही, खादी वही, 

ऊँचा स्वर, भाषण वही... 
समानांतर एक बात, 

सबके वादे बदल जाते हैं ॥ 

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कल था इश्क़, 
आज है इश्क़, 
कल होगा इश्क़,
रहता इश्क़ अमर, 

गर रोशन है इश्क़
फिर क्यों गुप नफ़रती अँधेरा है 
हर सांवरा कन्हैया है,
हर गोरी राधा है

कयूँ गौर वर्ण बिन प्रेम आधा है 

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मेरी बगिया में
गुलाब नहीं खिलते 
फिर जाने क्यों
किसकी हिफाजत को 
कांटे उग आये हैं । 



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माँ की गोद से उठे 
रेंगते रेंगते 
फिर खड़े हुए । 
अब गिरते गिरते 
ईमान से न गिर इंसान 
रेंगने वाले प्राणी 
धरती पर अपनी सीमायें 
बाँध लेंगे । 


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उसकी महक 
अपनी फुलवारी में 
बिखरायी जब से । 
कैक्टस मेरे 
अब गुल खिलाने लगे हैं 
जड़ें वो छोड़ते नहीं 
अब इधर उधर 
शायद अपनी कीमत 
जताने लगे हैं । 
(रामेश्वरी )

॥ रामेश्वरी

Friday, April 3, 2015

वो मुफ़लिसी में,  मेरा  कुछ यूँ  मददगार था । 
हाथ खाली थे उसके,  गले मोहरों का हार था ॥ 

जग कहता मीठी जुबां करो,  सच्चाई से उन्हें क्यों इंकार था । 
वो खंजर जुबां पर रखते हैं,  हमें यूँ बार२ मरने से इंकार था ॥  

लटें बिखरी बिखरी उसकी,  चेहरा पसीना सरोबार था । 
आलन मेहँदी उसकी, माँ है ना, यही उसका श्रृंगार था । ।  

रामेश्वरी शुभसंध्या दोस्तों 

Saturday, March 28, 2015

मन की भड़ास

जिस शाख ए गुल पर कभी झूला झूला था मैंने । 

जाने वो दरख़्त आम का, कब निम्बोरियां देने लगा ॥ रामेश्वरी 

(मुन्नवर राणा जी से प्रेरित )


ओढ़ तिरंगा, महबूब (वतन) से अब कहाँ मिला जाए । 

क्यों न सियासत गारों से लुकछुप,  इंकलाबी इश्क़ लिखा जाए ॥ रामेश्वरी

Saturday, March 14, 2015

आम आदमी




नेता बनने का,  ज्वार अभी,
थमा नहीं । 
आम आदमी बनने का,
चढ़ा ऐसा बुखार । 

बने त्रिशंकु, 
लटके बस में,
चले  कोसों   दूर । 

त्याग क़ीमती कार । 

हाल ऐसा, बस...
 कहा नहीं । 
 रक्त बस, जमा नहीं । 

हाँ की,  हुज़ूरी की । 
बेईमानो से दूरी की । 

प्राणी बन गए,  हम तो न्यारे । 
टोपी पहना गए,  अपने सारे ॥  

Friday, March 6, 2015







ना जाने क्यों लोगों को साफ़ सुथरे और उज्जवल वस्त्र धारण किये मानुष ही सुन्दर लगते हैं और भाते हैं ?      वह माँ कितनी खूबसूरत है जिसके चेहरे  पर  किसी सेठ की नवनिर्मित भव्य इमारत की मिटटी लिपी हो ।  जिसके वस्त्र मैले हैं दिनभर अपने मासूम बच्चों का पेट भरते२,  झूठे बर्तन धोते२ ।  उनके मैले कुचले और पसीने से लबालब वस्त्र क्यों उन्हें सुगंध नहीं दे पाते ? क्या यह माँ सुन्दर नहीं उस माँ से, जो  अपने पसीने को सिर्फ जिम जाकर इसीलिए बहाती है ताकि उसका बाहरी सौंदर्य बना रहे ।  क्यों लोग बाहरी सौंदर्य को तवज़ु देते हैं,  और खूबसूरत मन, सांवले तन मन को ताउम्र घुटघुट कर जीने को मजबूर करते हैं ?   यदि मासूम बच्चे से पुछा जाए तो वह सबसे खूबसूरत अपनी माँ को ही कहेगा ।  शायद सच्ची खूबसूरती की परख मासूम बच्चे ही रखते हैं ।  ये विश्वव्यापी सौन्दर्य  प्रतियोगिताएँ झूठ मात्र ।   रामेश्वरी 

Monday, February 2, 2015

क्या करूँ?   उस कब्र का . ..  
जिनमे हम दफ़न नहीं। 
जमाना आया मय्यत पर मेरी। . 
बस मुझ ही को खबर नहीं !!!! रामेश्वरी।