वो मुफ़लिसी में, मेरा कुछ यूँ मददगार था ।
हाथ खाली थे उसके, गले मोहरों का हार था ॥
जग कहता मीठी जुबां करो, सच्चाई से उन्हें क्यों इंकार था ।
वो खंजर जुबां पर रखते हैं, हमें यूँ बार२ मरने से इंकार था ॥
लटें बिखरी बिखरी उसकी, चेहरा पसीना सरोबार था ।
आलन मेहँदी उसकी, माँ है ना, यही उसका श्रृंगार था । ।
रामेश्वरी शुभसंध्या दोस्तों
रामेश्वरी शुभसंध्या दोस्तों
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