सड़कें वहीँ रहती हैं,
प्रदर्शनकारी बदल जाते हैं ।
डंडा वही , पटवारी वही,
कुछ नए , घाव उभर आते हैं ।
मंच वही, खादी वही,
ऊँचा स्वर, भाषण वही...
समानांतर एक बात,
सबके वादे बदल जाते हैं ॥
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कल था इश्क़,
आज है इश्क़,
कल होगा इश्क़,
रहता इश्क़ अमर,
हर गोरी राधा है
कयूँ गौर वर्ण बिन प्रेम आधा है
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मेरी बगिया में
गुलाब नहीं खिलते
फिर जाने क्यों
किसकी हिफाजत को
कांटे उग आये हैं ।
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माँ की गोद से उठे
॥ रामेश्वरी
प्रदर्शनकारी बदल जाते हैं ।
डंडा वही , पटवारी वही,
कुछ नए , घाव उभर आते हैं ।
मंच वही, खादी वही,
ऊँचा स्वर, भाषण वही...
समानांतर एक बात,
सबके वादे बदल जाते हैं ॥
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कल था इश्क़,
आज है इश्क़,
कल होगा इश्क़,
रहता इश्क़ अमर,
गर रोशन है इश्क़
फिर क्यों गुप नफ़रती अँधेरा है
हर सांवरा कन्हैया है,हर गोरी राधा है
कयूँ गौर वर्ण बिन प्रेम आधा है
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मेरी बगिया में
गुलाब नहीं खिलते
फिर जाने क्यों
किसकी हिफाजत को
कांटे उग आये हैं ।
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माँ की गोद से उठे
रेंगते रेंगते
फिर खड़े हुए ।
अब गिरते गिरते
ईमान से न गिर इंसान
रेंगने वाले प्राणी
धरती पर अपनी सीमायें
बाँध लेंगे ।
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उसकी महक
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उसकी महक
अपनी फुलवारी में
बिखरायी जब से ।
कैक्टस मेरे
अब गुल खिलाने लगे हैं
जड़ें वो छोड़ते नहीं
अब इधर उधर
शायद अपनी कीमत
जताने लगे हैं ।
(रामेश्वरी )
॥ रामेश्वरी
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