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Sunday, June 24, 2012

गिरा दिया पलकों से मुझे...


जब भी आया, गिरा दिया पलकों से मुझे...
अब ना आऊँगा कभी, नैनो के दर पर तेरे...
तू बस खुश आबाद रहे, अपने सजन के डेरे ..
जलन बस अब सीने में, करीब जब साजन तेरे...
भीतर नैनो में छिपकर रहूँगा, सजन से तेरे ...
करूंगा नज़ारा तेरा, जब2 देखे तू आएना प्रिये मेरे...

काश वजूद होता गर मेरा, ले सकता मैं भी संग फेरे तेरे ..
सुख नमक बन जाऊंगा, जुदाई में मैं प्रियतमा देख तेरे ...
कह कर वो मोती सा बूँद, गिर गया धरा पे बिदाई में मेरे...रामेश्वरी 

Friday, June 22, 2012

वो रोटी बहुत ही स्वाद है.

वो रोटी बहुत ही स्वाद है...
जिससे किसी गरीब का घर आबाद है....
इक रोटी जिसमे गरीब का पसीना है..
इक रोटी जिसमे लगाया गया गरीब का पसीना है...
है पसीना दोनों तरफ...
इक पसीने में लहू है..
इक पसीने में नमक...
इक से जान आई है..
इक से चेहरे में दमक.....
इक को सेंका है गैस में..
इक को निगला भूख ने तेश में...
क्या रूखा क्या सूखा है..
जब भूख से मर रहा भूखा है...
इक ने रोटी को माखन से चुपड़ा कहूँ से .....
शायद ये फेंटा है उसने भूखे के लहू से....
इक की रोटी में सुखी सी मिठास है...
इक की रोटी में निगल कर भी प्यास है..........
ऐ रोटी तू अमीर के घर फिर भी क्यूँ उदास है............

Tuesday, June 12, 2012

ना खींचो ये लक्ष्मण रेखा ..

ना खींचो ये रेखा ..
क़दमों के आगे मेरे..
ना तुम लक्ष्मण हो ..
जिसकी खिंची रेखा से..
ये सीता रावन से बच पाएगी..
ना मैं सीता हूँ उस  देव युग की..
क्या आज की सीता ..
रावन के धन वैभव से बच पाएगी...?
भ्रमित हो धन वैभव से..
वो खुद रावन संग घर बसाएगी..
राम वध करे तो करे कैसे..
आज के रावन प्राण अपने..
नाभि में कहाँ, स्विस बैंक में रखते हैं...
पार की थी कभी सागर पट्टिका एक..
अब सात समंदर जाना होगा..
स्विस बैंक से धन तो आ ना सका..
रावण के प्राण ....असंभव ....
खुद के प्राण को बचाना होगा...



(रामेश्वरी )..ram ek imaandar aur sachcha insaan



Monday, June 11, 2012

ये उम्र

ये उम्र परेशान करती है मुझे...
दिल लांघना चाहता है सीमा सभी...
बच्चों संग बच्चा बन खेलूँ..
बूढों संग मैं बतियाऊँ ...
जोश यौवन का भर, इन्कलाब को ..
मैं चिल्लाऊं ...
नन्हा शिशु बन ...
मांग को अपनी ...
सारा जहाँ सर पर उठाऊँ...
किसी उम्र सीमा में, मैं बंध ना पाऊँ ...
क्या होती है कोई उम्र सीमा..
ह्रदय में उठती लहरों की.....?
ना डालो फेरे गली के मेरे...
मेरी गली में बसेरा करते मुसाफिर हैं...
जो हो इसी गली का, डारे फेरा वही..
बाकी सभी इस गली में ऐ नासमझ, काफिर हैं........

Sunday, June 10, 2012

थोड़ा सा सो लेने दो..

चलो अब मुझे थोड़ा सा सो लेने दो...
परेशान हूँ थोड़ा सा, अमन ओ चैन के बीज बो लेने दो...
शायद अंकुरित हो, पौध वृक्ष बन सके..
छाया देने धूप घनेरी वो तन सके....
शायद कोई पुरवाई यहाँ भी बह सके.............

मैं

मैं उस कांटे की तरह हूँ..
कोई कुछ कहे..
देखे ना देखे..
पर सूख कर भी वहीँ खड़ा हूँ...
फूल की रक्षा को तत्पर अड़ा हूँ ...
फूल नहीं जो सुख कर..
पंखुड़ियां दूर तक धूल में मिला देते हैं..........

बनाना मुझे.

बनना नहीं मुझे रेत..
जिसका मिजाज़  बदलता रहता है..
दिन में गरम रात में ठंडक देता है...
निशान तक तो जो पग के सहेज सकता नहीं...
दरिया आये गर समाने ..
खुद को वो रोक सकता नहीं...
धीर खो बह जाता है संग दरिया...

बनाना ईश्वर मृत्तिका मुझे..
समाती भीतर अपने अनगिनत बीजों को...
जन्म देती फिर उन्हें पौध रूप ..
जलजले आये ..आये सो तूफ़ान ..
धरा वहीँ रहती है...
कई दिनों तक पद चिन्हों को सीने पर सहती है..
धैर्य वो खोती नहीं...
फट कर, सीता को भी समाती खुद में..
बहा लावा कलेजे से ..
निर्मित करे नव द्वीप ...
लज्जा सहेज कर रखती,  है तो इक स्त्री...




.




होते गर हर ख्वाब हंसीं, यथार्थ में फिर जीता कौन...
दे सकता गर सच यकीन, सच रखता क्यूँ जिह्वा मौन.........

है मुझे भी इश्क ...


कौन कहता है हम इश्क नहीं जानते..
हाँ मुझे भी इश्क है, पर ज़िन्दगी से...
इश्क है चेहरों पर मुस्कुराते होठों से...
घिन है बेपेंदे के लोटों से...
इश्क है खिलखिलाते बचपन से...
रक्त में स्पंदित लड़कपन से..
संघर्ष करती उम्र पचपन से...
घिन है दोहरेपन से...
है  मुझे भी इश्क ...
भीड़ में अनजान चलते चेहरों से ...
घिन बच्चियों पर लगे पहरों से..
प्रकृति के बदलते पहरों से..
मत मिटती हूँ मैं भी..
हर उस पल..
जब भीड़ में गैर,  गैर को अपनेपन से हाथ बढाता है..
रोम रोम मेरा प्रेम से भर सा जाता है....
इश्क है बहती हवाओं से ..
पवन संग नृत्य करती शाखाओं से..
बहते झरनों से...
पहाड़ों में गूंजते अनजाने से संगीत से..
प्रकृति को भी मनमीत बनाओ...
बस इश्क को जिस्मानी न बनाओ...
कभी किसी गैर की और हाथ तो बढाओ ...
इश्क स्त्री पुरुष पर निर्भर नहीं..
जन्नत से नसीब है..
इससे सुफिआना बनाओ..
इश्वर की इबादत सा बनाओ..
जिस दिन बना पाओगे..
हर ज़र्रे में इश्क पाओगे......रामेश्वरी 





Tuesday, June 5, 2012

मासूम...बचपन

हैरान सा था वो मासूम...
होश भी थे उसके बचपन में गुम..
वो जानता नहीं मौत क्या होती है...
वो तो अर्थी पड़ी देख...
मासूमियत से हँस रहा था...
बार बार प्रश्न यही कर रहा था...
माँ ये धरती पर सोये क्यूँ?
दुनिया सोने पर इनके रोये क्यूँ?
माँ मासूम का समझती भी क्या...
मासूम को मौत की परिभाषा करती कैसे बयाँ...
बस उसका जवाब यही था...
बेटा, ये गहरी नींद सोये हैं..
उठेंगे अब नहीं ...
इसीलिए सब रोये हैं...
झट मासूमियत से बोला वो बच्चा...
माँ स्कूल जाना नहीं लगता अच्छा..
मुझे भी सोना है हमेशा को..यही अच्छा .......बच्चों के भोले से सवाल और जवाब...जहाँ कुछ कहते नहीं बनता...रामेश्वरी 





डाल २ शाख २ पुकारती हैं क्रान्ति अब तो...
हरा करे डाल शाख जो, वो आँखों का पानी कहाँ गया है?..........
जब जब रात के सन्नाटे से,  यूँ मेरा सामना हुआ है...
देखो हर कोई अपना बन, इस ज़माने में खड़ा हुआ है......रामेश्वरी 
हुई थी झमाझम बरसात यहाँ भी...
भीगे थे तन मन तर पर नीर से उसके....
कहीं कुछ फिर भी सुखा सुखा सा है.............रामेश्वरी
धन पूजे है...
रति पुजारी कोई...
पूजूं ईमान ....

तंगहाली है...
चहुँ और कंगाली ...
भूख फैली है...

आंख के अंधे ...
स्वार्थ का चश्मा चढ़ा ...
सावन देखें ........

देश महान ....
बेईमान महान ..
घूमें जापान ......

जनता रोये..
कहाँ उम्मीद बोये...
ईमान सोये....................रामेश्वरी (हायकू विधि) इक कोशिश मात्र
कौन कहता है कि आकाश कभी पिघलता नहीं...
अकडन होती जो उसमे, बरसती नहीं बदली यूँ......रामेश्वरी
रोटी हुई बेशकीमती यूँ कि, हर कोई अपना आप बेचता है....
जहाँ लहू बिका लहू बेचा, कोई तो अपना बाप भी बेचता है.....रामेश्वरी
वो अक्सर कहते थे, तुझसे मिलकर खुद को यूँ बदल देंगे हम..........
बदले वो इतना कि आज खुशियाँ दुसरे के आँगन, पास हैं गम....रामेश्वरी
आज तुम उड़ान भरते हो इतना..
कि हम तक आते तुम्हें सदियाँ बीत जाती हैं...
भूल गए क्या? काट पर अपने दी थी उड़ान तुम्हें.........रामेश्वरी
मय, और मयखाना मिटा दिया, सब जालिमों ने ...
मेरे पीने की वज़ह भी, बनकर मेरा मिटा देता कोई.....
पूछता सबब पीने का मेरे, प्रेम प्याला भर देता कोई....रामेश्वरी

रख न सहेज कर मुझे,  इन किताबों में...
अब वो ज़माना कहाँ, खुशबू चुरा लेती हैं अब किताबें भी....रामेश्वरी 
 बंद हैं दरवाजे मयखाने के, गया प्यासा जब जब वहां |
जवाब हर बार आया यही,  साकी के खड़े पहरेदारों से ||
पहले वो खुमारी तो उतार, जो चढ़ी है हूर के दीदार से|||..............रामेश्वरी 


खोज पंख, बनायीं कलम, रंगने लफ़्ज़ों को ..
हर पंछी हक जताए पंख पर तो क्या होगा ||
रोज रंगे लफ्ज़, इन ज़िन्दगी के फलसफों के...
भर गयी जब किताब, सोचो तो क्या होगा.....||
खोलों न फलसफे यूँ अपनी  ज़िन्दगी के...
गैरों ने पढ़ लिए ये लफ्ज़, तो क्या होगा...||.....रामेश्वरी 

Saturday, June 2, 2012

वृधावस्था

जब जब ..
किसी हरे भरे वृक्ष की..
पीली पत्तियों को झडते देखा है..
देखा है उन्हें..
रौंदते युवा पांवों को ..
चीख भी ना सके वो..
था ही नहीं साहस उनमे..
सहम गयी ...
क्या ऐसा ही होता है...
जब जब वृधावस्था जकड़ती है...
क्षण क्षण क्या ?
हमें भी झड़ना होगा..
क्षीण होगी क्या शक्ति हमारी भी?
क्या हमें भी रौंदेंगे युवा पाँव ...
सह पायेंगे इस पीड़ा को?....
मौन होती इस जिह्वा को...
क्या चीत्कार कोई सुनेगा हमारी? 
या दब जायेंगे ह्रदय भाव हमारे...
या फिर गिरना होगा ....
जैसे सूखे डाल वृक्ष के..........रामेश्वरी 
 खफा हूँ मैं, चाँद से...
रात  के अंधेरों में वो..
किस अदा से ..
गुफ्तगुं करता है..
अनगिनत तारों से....
ज़ाहिर करूं जो प्यार अपना...
चुप रहो कह देता है इशारों से....
भोंर भये जब जब पहली..
डारे फेरे फिर से गली के मेरे..............
मैं भी धरा हूँ...
ना आऊंगी तेरे फेरे में..
काट लूंगी मैं भी, भानु के फेरे......रामेश्वरी