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Saturday, June 2, 2012

 खफा हूँ मैं, चाँद से...
रात  के अंधेरों में वो..
किस अदा से ..
गुफ्तगुं करता है..
अनगिनत तारों से....
ज़ाहिर करूं जो प्यार अपना...
चुप रहो कह देता है इशारों से....
भोंर भये जब जब पहली..
डारे फेरे फिर से गली के मेरे..............
मैं भी धरा हूँ...
ना आऊंगी तेरे फेरे में..
काट लूंगी मैं भी, भानु के फेरे......रामेश्वरी 

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