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Friday, September 30, 2011

निरंकार नीले नीले है मेरे आराध्य मीत ..
निरंकार है मेरी आस्था, निरंकार है मेरी प्रीत .

प्रेम में वो विष पी गए ...
शिव कहो या मुझे मीरा ..
जिस लागे यह दर्द ...
वही समझे इसकी पीरा .(रामेश्वरी)
तू ना रहम कर, ना दवा कर...
बस मेरे जख्मो को हरा ना कर...

ये दौर है घौटालों का...
तू मेरे बे.ईमान होने पर शक ना कर ..

तू मांग जो मांगता है ...
मेरे भगवान होने पर सवालिया निशाँ ना कर...

रोता दिल, नम होती आँखें मेरी भी हैं...
तू मेरे इंसान होने पर सवाल ना कर...

कभी इस डाल कभी उस डाल ...
कूद सकता हूँ मैं....
तू डाल डाल पात पात हो सकता हूँ मैं.
बस मेरे नेता होने पर बवाल ना कर.....
(रामेश्वरी)

Thursday, September 29, 2011

उम्मीद के द्वार देखो..
ह्रदय के कपाट खोलो..
मेरा अहं बड़ा या तेरा अहं बड़ा है..
आज भी सड़ी गली कुरीतियों से ..
किसका वजूद सड़ा है...
देखो द्वार कौन खड़ा है..|

खोलो इन द्वारों को..
खुली सोच की हवा का झोंका ..
ह्रदय में आने दो....
कुरीतियों को नष्ट करो...
अपने भीतर के रावन को ...
अग्नि में समाने दो....
इक नयी सोच की किरण आने दो..

जब तक हमारे अन्दर ही रावन का वास होगा ..
बाहर के रावन के पुतले को जलने से समय का हराश होगा...

(रामेश्वरी)
तुम्हारे पास नोट है..
हमारे हाथ वोट है..

तुम्हारा पास कोष है ..
हमारे अन्दर भरा आक्रोश है..

तुम्हारे पास सिर्फ भाषण है..
हमारे हाथ सिर्फ राशन है..

तुम्हारे हाथ खाली तख्ती है..
जो तुम पर नहीं फब्ती है...
हमारे अन्दर नस2 में देशभक्ति है..

तुम्हारा पास रोज बदलते आवरण हैं ..
आडम्बर हैं...
हमारे पास उड़ने को खुला अम्बर है..

तुम इतने बेचारे हो...
चारे को भी प्यारे हो...
कभी हम तुम हो और वारे न्यारे हो...

झूठ का अम्बार हो...तुम
सच्चाई दूर दूर तक गुम..
वो राजनीति का करिश्मा हो तुम...

तुम्हारा पास तैरने को ताल है..
हमारे पास लड़ने को भूक हड़ताल है...
बस तुम अद्वैता हो ...
भूले से देश के नेता हो...रामेश्वरी
चुपके से इक किलकारी मेरे कानो तक आई है..
कैसे खुलकर हँसू, दफ़न होती बच्ची की यही..
फ़रियाद आई है...
न हरो प्राण मेरे....
एक छोटी सी दुआ मैं नन्ही हथेली उठी है...
मान लो इस दुआ को मेरी...
अभी भी खुदा की तुम्हें नसीहत आई है..

(रामेश्वरी )
ये वक़्त तो वक़्त होता है..
पर कभी बेवक्त होता है..
कभी इस वक़्त और कभी-
उस वक़्त होता है....
कभी जब होता है बड़ा ही बेवक्त-
होता है..
कभी ये निर्दयी कभी सुहाना वक़्त-
होता है...
जहां चाहो इसे वहां बेमूरावत बेवफा होता.
जहां न चाहो इससे ये हर वक़्त वक़्त होता है..
क्यूँ ये वक्त होता है...
कर्मठ मेहनती के लिए हमेशा संघर्षशील -
होता है..
प्रेमी युगलों के लिए मीठा इन्तेजार भरा -
होता है..
विद्यार्थी के लिए परीक्षा मैं शिकन भरा-
होता है..
बच्चे की किलकारी मैं माँ को ममता-
भरा होता है...
निठ्हलो को वक़्त ही वक़्त होता है...
पकड़ सको तो पकड़ लो क्यूंकि---
यह वक़्त बहुत चंचल होता है....
करो सदुपयोग इसका बहुत हठी है वक्त-
मोड़ सके न वापिस इसकी दिशा कोई ....
वक़्त इतना मनचला होता है...
(रामेश्वरी )

Friday, September 23, 2011

वो यूँ ही बहती गंगा में पाप धोते हैं...
उन्हें क्या इल्म इस गंगा को भरने को..
कैसे सारी पहर हम रोते हैं...(रामेश्वरी)

khuda

तू किसी के पैर ना पड़..ना किसी से फ़रियाद कर...
आत्मसम्मान का दिया जला कर रख सीने में..
खुदा तेरे घर और दर पर ही तुझे मिलेगा..
चारो और तू बस सच्ची निगाह तो कर....(रामेश्वरी)
बहती ठंडी ठंडी पुरवाई शायद पैगाम ये दे रही ..
धरती सावन से उब अब ठंडी रजाई ओड़ रही ..
धूप मद्धम मद्धम है...मौसम खिला खिला ....
आने वाला अब फूलों का मौसम है पीला पीला ..
सरसों फूलेगी फूलेंगे गेंदे के फूल...
गन्ना खड़ा होगा खेतो में अब ..
कहे जैसे इंसान चूस सके मुझे तो चूस
मूंगफली गरम गरम सौंधी खुशबू देगी ...
फूलेंगे मक्का के फुलले .......
धूप सकेंगे सब छत की मुंडेर पर बैठे ...
सखियाँ बतियाएंगी ....
गर्मी की सुस्ती दूर जायेगी और...
ठंडी हवा सताएगी ...
खेतो में फूटती कपास और ...
आती हलकी धूप शायद पैगाम यही दे रही....(.रामेश्वरी)
बचपन याद आता है....
सुकून भरा..निर्भय बचपन याद आता है...

वो गीटे, वो सांप सीडी का खेल..
वो इक दुसरे के पीछे बनाते हम रेल..
बिना जाति-पाती के हम बच्चों का मेल..

वो इक दुसरे का दुःख चुटकी में भाम्पना..
वो छत पर हमारा सबका रस्सी टापना..
वो मम्मी की डांट पर हमारा कांपना...
सच बचपन याद आता है..............

वो पल भर में कुट्टी होना..
पल भर में अब्बा होना...
ना कोई मार पिट ना रोना धोना ...
सबके हाथों में सस्ता सा खिलौना ..
सच बचपन याद आता है...

वो तख्ती पर लिखना...
गाची से लीपना...
तख्ती तख्ती सुख जा...शोर मचाना ..
सच बचपन बहुत याद आता है...

हम हिन्दू हैं या मुस्लिम....का अज्ञान
बचपन और प्रेम ही उस वक़्त अपना ज्ञान ...
पड़ोसियों का भी आदर सम्मान .....
सच बचपन बहुत याद आता है ....

इक गलती पर किसी का मार खाना..
हम सभी का खिलखिला कर हँसना ...
कभी आमिर खान की फिल्म देखने जाना..
देखने पर मार खाना ....
सच बचपन बहुत याद आता है...

कभी क्लास में टीचर्स की ड्रेस पर जयादा धयान ...
कभी उसका बालों का फूल देखना...
कभी उसकी सेंडल पर मन का आ जाना....
देख उनकी शान हम भी कभी बड़े होंगे..
जागना यह अरमान...
सच बचपन बहुत याद आता है....(रामेश्वरी)

Sunday, September 18, 2011


कितना जुल्म वो करते हैं...
जमती मेरी नब्ज में सांस वो भरते हैं..
एक मांग रखी थी आगे उनके..
देखो मांग सिन्दूर से वो भरते हैं......
इतना जुल्म वो करते हैं करते हैं ....
मांगो जो उनसे उनका चाँद सा चेहरा..
वो झोली ही चाँद तारों से भरते हैं..
जो चाहूं वो देखें बस मुझे ...
वो मेरे अक्स को आईने मैं जी भर देखते हैं..
कितना जुल्म वो करते हैं.
.(रामेश्वरी)

Monday, September 12, 2011

मिट मिट कर इतना मिटी मिटटी बन गयी..
देखो वो हवा बन मुझे उड़ा ले जाए..
जल जल कर ख़ाक ऐ सुपुर्द हुई...
देखो लगाये वो मुझे इत्र की तरह...
काश  वो हो जाए शर्म से लाल सुर्ख ..
भरूँ उन्हें मांग में सिन्दूर की तरह..
वो हैं सागर गहरे, भावनाओ भरे..
मैं संग चलने उनके,  इठलाती लहर बन गयी...
.(रामेश्वरी)

Tuesday, September 6, 2011

जिस माँ को नसीब ना थी..
पार करे घर की चौखट..
आज मर कर उस माँ की..
तस्वीर उस चौखट के पार है..
जीते जी मिला ना माँ का ..
सम्मान जिससे..
आज तस्वीर पर टंगा इक...
दिखावे का हार है..
यदि यही माँ के प्यार का ..
अंजाम है..ईश्वर..
मोहे अगले जन्म माँ ही .
ना कीजियो...........
माँ किसी भी रूप में हो आज...
देश या इन्शान
सभी का यही हाल है.
माँ प्यार की दौलत लुटा ..
संतान पर कंगाल की कंगाल है..
देख मुझे माँ की तस्वीर..
रोना भी आया..
हंस पड़ी मन भीतर ही भीतर .
देख उस औलाद को...
क्या भरा उसके अन्दर दिखावे
का मान है...(रामेश्वरी)

Sunday, September 4, 2011


आज मर कर भी देखा 
शांति वहां  भी कहाँ थी ..
हाय अब क्या होगा..
हाय कैसे होगा..
हाय मेरे बच्चे कौन पालेगा ..
हाय कितना अच्छा आदमी था .
हाय अब मेरा ख्याल कौन रखेगा..
हाय हाय से ख्याल ये आया..
मेरा क्या होगा ख्याल किसे था ..
जीते जी पीटा,  मर कर भी पीट रहा.. 
जब सीने में मार मार मेरे  कोई रो रहा ..
हाय काश में मारा ही न होता...
सोचा था मर कर तो शांति मिलेगी..
पर शांति देवी ने ही सबसे अधिक ..
शोर कर रखा था.....

कभी सोचा अर्थी से खड़े हो इन्हें समझाता...
थोड़ी देर और चुप हो जाते तुम्हारा क्या जाता..
कुछ देर में बस, मैं शांति से मिटटी में विलीन हो जाता..

Saturday, September 3, 2011

यादें मेरी आएँगी ..
द्वार खुला रखना..
रोशनी नूर बन ..
निहारूंगी तुम्हें ..
बस झरोखे को थोडा..
खुला रखना...
रूह दब ना जाएँ ..
कदमो तले  ज़रा  र्र्रर्र्र्रर्र्र...
कदमो को धीमे रखना..
बिन पर मैं उड़ सकूंगी...
पकड़ने की उम्मीद न रखना 
बेड़ियाँ खुद ब खुद....
खुल जाएँगी ...
मुक्त प्राण हो जायेंगे..
सफ़र में मेरे संग तुम भी...
आओगे यह ख्याल न रखना..(रामेश्वरी)