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Sunday, September 18, 2011


कितना जुल्म वो करते हैं...
जमती मेरी नब्ज में सांस वो भरते हैं..
एक मांग रखी थी आगे उनके..
देखो मांग सिन्दूर से वो भरते हैं......
इतना जुल्म वो करते हैं करते हैं ....
मांगो जो उनसे उनका चाँद सा चेहरा..
वो झोली ही चाँद तारों से भरते हैं..
जो चाहूं वो देखें बस मुझे ...
वो मेरे अक्स को आईने मैं जी भर देखते हैं..
कितना जुल्म वो करते हैं.
.(रामेश्वरी)

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