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Monday, September 12, 2011

मिट मिट कर इतना मिटी मिटटी बन गयी..
देखो वो हवा बन मुझे उड़ा ले जाए..
जल जल कर ख़ाक ऐ सुपुर्द हुई...
देखो लगाये वो मुझे इत्र की तरह...
काश  वो हो जाए शर्म से लाल सुर्ख ..
भरूँ उन्हें मांग में सिन्दूर की तरह..
वो हैं सागर गहरे, भावनाओ भरे..
मैं संग चलने उनके,  इठलाती लहर बन गयी...
.(रामेश्वरी)

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