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Monday, July 29, 2013

मैं चंपा

मैं चंपा,  
रूप यौवन भरी,  
ह्रदय उदास । 
बीते मौसम ।
बिन भँवरे कैसा मधुमास । 


हर मौसम । 
खिलते पुष्प हज़ार । 
अटरिया कांटो भरी । 
प्रेम कहीं खिलता नहीं । 
घर घर नफरत का वास । 
ये कैसा बनवास … 

हर मुस्लिम ईद करे । 
हर दिवाली सजे बाज़ार । 
जिसमें सबका मन मिले ।  
जन जन को ऐसे पर्व की आस । 


चिरैया तू लुप्त कहाँ । 
कोउन देश, कोउन धर्म  तेरा । 
नहीं अब डेरा तेरा । 
उगा ली घास मैंने । 
जिससे घौसला तेरा हरा मिले 
लोहे की छड़ रोके बैठा स्वास 
बस तेरे लौटने की आस … रामेश्वरी 


Thursday, July 25, 2013

फेस बुक पे आजकल कुछ हिन्दू मुस्लिम ज्यादा हो रहा है, सभ्यता गुम होती जान पड़ती हैं 
इस पर मैंने कुछ लिखा हैं,…. ठीक लगे तो बताना 

अब कुछ असाधारण करने की जरूरत नहीं , 
इतना बहुत है कहदो दिल में नफरत नहीं 

मेरे हिन्दुस्तान के , मेरे वतन के मेरे अजीजों, 
खुद के कहर से ये देश न ख़त्म हो जाए कहीं 

जो नफ़रत का पाठ पढाये वो धर्म नहीं हैं,
क्या नुक्सान है जिस किताब में वो पाठ नहीं है

जन्मे है , पले है , पढ़े हैं बढे हैं इसी धरती पे
क्या मै और तुम इस मिटटी के कर्जदार नहीं हैं ,

एक मुसलमान गर गीता को इज्ज़त बक्शे ,
और हिन्दू कुरान की आयतों को समझे ,

मै सही औत तू गलत पे हो जाएँ कत्ले -आम
मेरे मुल्क इतना भी तंगदिल नहीं हैं.

जो रखते है कुछ मौलवी और संतो की फ़िक्र
उनके जेहन में सिवा सियासत के कुछ नहीं है ,

मेरी बेटी की शादी में एक मुसल्मान था हलवाई,
मैंने हर रोज नमाज एक ब्राह्मण की छत पे पढ़ी हैं



Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)

Thursday, July 18, 2013

ख़त के पन्नों में

ख़त के पन्नों में, दफ़न फूल, दिखेगा तुम्हें ...
छिपी महक मेरी, बस इत्र समझ तुम लगा लेना ....


जिनमे जिक्र नहीं तेरा, शब्द वो दिखेंगे तुम्हें ..
मेरे मूक गुमशुदा शब्दों की तुम आवाज़ सुन लेना ....


लफ़्ज़ों की माला पिरो लाया हूँ मैं,  ब्याहने तुम्हें ..
हो जब फेरे अग्नि के,  प्रेम अग्नि तुम जला लेना ...रामेश्वरी
फिर अफरातफरी करे लंगूर ..
ना जाने कलयुगी रावण कितनी दूर ....रामेश्वरी 


जब तक बच्चियों को जान गंवानी है। 
स्वत्रंत्रता प्रतीक तिरंगा बेमानी है ......



रातरानी हूँ,  
महकती,  तेरी क्यारी हूँ ..
पहली पहर वजूद मेरा ..
इंतज़ार दोपहर तेरा ...
मिलन हो कैसे ?






लताबद्ध हूँ,
कोमल देह ..
पाने झलक तेरी ..
लाख जतन कर ..
तेरे झरोखे चढ़ी हूँ ..
महकता मदिरालय मेरा ..
निन्द्रा नशा तेरा ..
अब तुझे जगाऊँ कैसे ?



रामेश्वरी