मैं चंपा,
रूप यौवन भरी,
ह्रदय उदास ।
बीते मौसम ।
बिन भँवरे कैसा मधुमास ।
हर मौसम ।
खिलते पुष्प हज़ार ।
अटरिया कांटो भरी ।
प्रेम कहीं खिलता नहीं ।
घर घर नफरत का वास ।
ये कैसा बनवास …
हर मुस्लिम ईद करे ।
हर दिवाली सजे बाज़ार ।
जिसमें सबका मन मिले ।
जन जन को ऐसे पर्व की आस । .
चिरैया तू लुप्त कहाँ ।
कोउन देश, कोउन धर्म तेरा ।
नहीं अब डेरा तेरा ।
उगा ली घास मैंने ।
जिससे घौसला तेरा हरा मिले
लोहे की छड़ रोके बैठा स्वास
बस तेरे लौटने की आस … रामेश्वरी
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