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Monday, July 29, 2013

मैं चंपा

मैं चंपा,  
रूप यौवन भरी,  
ह्रदय उदास । 
बीते मौसम ।
बिन भँवरे कैसा मधुमास । 


हर मौसम । 
खिलते पुष्प हज़ार । 
अटरिया कांटो भरी । 
प्रेम कहीं खिलता नहीं । 
घर घर नफरत का वास । 
ये कैसा बनवास … 

हर मुस्लिम ईद करे । 
हर दिवाली सजे बाज़ार । 
जिसमें सबका मन मिले ।  
जन जन को ऐसे पर्व की आस । 


चिरैया तू लुप्त कहाँ । 
कोउन देश, कोउन धर्म  तेरा । 
नहीं अब डेरा तेरा । 
उगा ली घास मैंने । 
जिससे घौसला तेरा हरा मिले 
लोहे की छड़ रोके बैठा स्वास 
बस तेरे लौटने की आस … रामेश्वरी 


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