Search My Blog

Monday, November 28, 2011

मालूम था होगी नैनो से अश्रुओं की बरसात..
झट से हमने भी देखो सूखे अरमान समेट.लिए...रामेश्वरी
यह लकीरें जो पड़ी इस माथे पर हैं...
पथ चिन्ह हैं वो दुःख सुख के आने जाने के..
बालों की सफेदी भी यूँ ही नहीं...
सुबूत हैं यह बच्चों को छांव करने का ..
ये कदम यूँ ही लड़खड़ाते नहीं...
थक कर चूर है...फ़र्ज़ उठा कर सभी का...
कमर यूँ ही धनुष की तरह तनी नहीं..
आज भी तीर सह सकती है....
बच्चों तक आने पर दुविधा कभी........रामेश्वरी
सास और सास में फर्क इतना..
जितना कनक कनक में..
मनका मनका में...
बहु की सास, जमाई की सास में ..

जमाई करे बेटी सेवा सास फुला ना समाये है..
बेटा करे बहु सेवा जहाँ सर पर उठाए है....

बेटी को जन्नत मिले..
बहु को जहनूम दिखाए है...

बेटी रानी राज करे...
बहु नौकरानी बनाये है..

उस दिन इस धरती पर स्वर्ग होगा..
जब बेटी बहु में फर्क नहीं रती भर होगा....रामेश्वरी .......समाज की इक sankiran सोच ..जिससे सभी स्त्रियों को उभरना चाहिए...तभी घर स्वर्ग बनते हैं......स्त्रियों पर अत्याचार पहले स्त्री ही करती है..पुरुष नहीं...
कितनी अजीबो गरीब ये किताब और फलसफे ज़िन्दगी हैं ...
इसके लेखक भी हम...इसके पाठक भी हम ही हम हैं ....
फलसफो में देखिये...भरे पड़े फलसफे गम ही गम हैं (रामेश्वरी )
आज फिर सर्द धरती पर तेरी धूप चाही थी....
पर आज तू भी दिखा मुझे...
तनहाइयों के बादलों में ढका२ सा....रामेश्वरी
ताबूत में संग मेरे तस्वीर अपनी रख देना...
जब जब होंगे खौफ में तस्वीर तेरी देखेंगे.......रामेश्वरी
यूँ ही दिल ने ....................
इश्वर अस्तित्व की आजमाईश की थी...
दुनिया में हो शांति...
प्रेम भाई भाई में हो..
डिग्गे न ईमान किसी का..
बच्चियों का अस्तित्व बचे ..
इश्वर ने कहा..
चल पगली एक और इश्वर चाहती है...
पर मैंने भी क्या किया था...
बस इतनी सी तो इश्वर से फरमाईश की थी......रामेश्वरी
जब जब दीन को ईमान से स्नेह हुआ है..
तब तब दुनिया में भला भला ही हुआ है..

जब जब दीन की ईमान से तकरार हो गयी..
इंसानियत इंसानियत पर शर्मसार हो गयी.. ...रामेश्वरी
जब बेगाने देश से, अपमान की तपिश में तप कर आये थे...
वापसी पर देश अपने, माँ के अश्रुओं में तर नहाये थे ..रामेश्वरी
आये दिन बढ रहे आम आदमी के हाथों से परेशान..
घबराएं हुए कहाँ बचे अब जान ..

बोले आला ऐ कमान..
"बोल कहाँ रहता है आम आदमी और
कैसा है उसका आकार?"
क्या उसकी पहचान है ..?
क्या उसका धर्म रंग रूप?
भीड़ में कैसे जाने हम..
कौन आम आदमी?

चपरासी साहेब बोले..
हे मेरी सरकार ..
हम बताते है उसका रूप और आकार ..
शायद वो सरदार से थे..
सर में उनके पगड़ी थी...
दुसरे बोले...नहीं नहीं सरकार..
वो लम्बे थे...
बिना पगड़ी के थे..
हमने तो ऐसा ही देखा था ..
पिछली बार उसका आकार..
तीसरे बोल पड़े..
हे मेरी सरकार..मैं बताता हूँ..
चरणों मै आपके बा मुलाय्हजा ..
सलाम बजाता हूँ..
आम आदमी सबसे पहली बार...
मैंने ही देखा था...
वो जवान था...
pada लिखा था खूब..
किसी ने उसको पागल कह कर ..
पुकारा था..
जब हिफाजत के स्त्रियों के लिए ..
उसने पहली बार हाथ बढाया था.
में वहीँ पहली बार आम आदमी पाया था ..

मंत्री बोले...
अब क्या होगा..
कैसे आम आदमी पहचानेगे..?
कैसे उसके बढते हाथ रोकेंगे..
"जाओ अभी..दूंद कर आम आदमी लाओ.."
जब तलक मैं फरमान जारी karwata हूँ..
हाथ काट दिया जाए आम आदमी के ....
और अब से...चुनाव में.....
अब से पैर का अंगूठा वोट पर लगवाता हूँ...रामेश्वरी
वो बहे हैं पर हवा नहीं...
वो खुदा सा दिखे...
पर वजूद उसका हर जगह नहीं..
वो पथहर सा भी लगे..
पर वो पसीजा हर कहीं...
वो धुंआ भी लगे .....
पर वो ईर्ष्या में जला कभी नहीं..
वो गंगा जल सा भी लगे..
पर वो इतना वफ़ा में पाक साफ़ भी नहीं...
वो मजनू सा, राँझा सा भी लगे..
पर मैं कभी लैला..हीर लगी नहीं...
वो बादल सा भी कभी लगे..
पर वो सुखी धरातल पर बरसा कभी कभी नहीं..
वो नमक सा भी लगे...
पर किसी घायल के घाव हरे उसने किये कभी नहीं...
कभी शहद भी लगे..
पर चापलूसी की उसने कभी नहीं...

अब तू ही बता तेरा वजूद क्या है..
तेरी सूरत और आकार क्या है ?
कहीं तू भी निराकार तो नहीं ?..रामेश्वरी ...
चलो सच को फिर से बे हया किया जाए...
उसकी अस्मत को तार तार किया जाए...
झूठ को बेशकीमती ओडनी ओडायी जाए...
हया वो सब की है..सबकी वो लाज है...
आओ उसका दुल्हन सा श्रृंगार किया जाए.....रामेश्वरी
आओ दो दो हाथ करते हैं.....
हम भी चुप क्यूँ रहें...
थोड़ा सा अत्याचार ....
थोड़ा सा भ्रस्टाचार..
थोड़ा सा बस थोड़ा सा...
हम भी करते हैं.....

सब ने बैंक भरे अपने...
हम अपना सिर्फ बक्शा ही भरते हैं...
आओ आओ अत्याचार करते हैं....

गर तुम हो मेरे मौसेरे भाई...
फिर काहे को में अरज करूं...
चलो चलो भ्रस्टाचार करते हैं...

राशन सब खाते हैं...
हम भाषण खिलाते हैं...
देश भक्तो में देशद्रोही अच्छे से मिलाते हैं..
भागो भागो देश का बंटाधार करते हैं...रामेश्वरी

Tuesday, November 22, 2011

दुनिया चाहे कोई मेरी..
मिले उसे दुनिया मेरी..
हम दुनिया नयी बसा लेंगे गर...
मुझे मिले खवाब मेरे.... 
चाँद को दिखे ना चांदनी...
सूर्य को दिखे ना उसका तेज..

गुण अपने बहने दो..
अवगुण अपने सहेज सके तो सहेज .....

स्त्री रूप सरस्वती स्त्री रूप लक्ष्मी ...
यही रूप सर्वोतम है, यही समझ दहेज़...रामेश्वरी
यह अहसान नवाजी हम पर क्यूँ हुई, वज़ह क्या है ...
जिसपर हँसे हम ता उम्र ...
आज वही सबसे जयादा हम पर रोया है ...रामेश्वरी
मालूम था होगी नैनो से अश्रुओं की बरसात..
झट से हमने भी देखो सूखे अरमान समेट.लिए...रामेश्वरी

Monday, November 21, 2011

हम नेता हूँ..
हमका का चाहिए यही इक सवाल ?
सिर्फ इक वोट और कुर्सी......
इतना मा भी देखो भइया..
काहे मचा है बवाल..

लोग रिश्बत खाता है
लोग डकारते सारा माल..
हम खाहे चारा उस पर भी बवाल...
धत्त...गुरबग लोग ..रामेश्वरी

Saturday, November 19, 2011

कौन हैं अपने...कौन पराये हैं..
इक धुंधला चेहरा हैं, और उड़ते साए हैं...
नशे में छिपी मौत है, अमूमन लोग ज़िन्दगी दूंदते हैं 
है वो मये खाना भी खूब, जहाँ शांति मय बन परोसी जाती है ...रामेश्वरी
सत्यम शिवम् सुन्दरम...
सत्य तुम्हारा वजूद है ...
शिवम् हमारे तुम..
सुन्दरम यह बगिया हमारी 
देशम तुल्यं मातरम् ....
वन्दे मातरम् ....
(रामेश्वरी)....
चंद लम्हों से इक लम्हा चुरा लिया मैंने...
क्या मालूम वही लम्हा तुम्हे जान से प्यारा था...

जो लम्हें हम यूँ ही छोड़ आये...
क्या मालूम वो ही कतरा-ऐ-दिल हमारा था..रामेश्वरी
जब जब चेहरा उठाया आकाश की ओर...
खुदा बोले क्या देखे क्या इरादा है तेरा ...
मांगना कौन गरीब चाहे है.....ए खुदा..
हम चेहरा उठा ढूंढे कहाँ है ढिकाना तेरा ...
किस रूप में तू है, क्या जात धर्म है खुदा तेरी..
देखना चाहा था तुझे यही दुआ है मेरी ..
न जाने वह  जन्नत थी..या वह  गनीमत थी..
जहाँ चपे-चपे पर बसा तेरा बसेरा था ...(रामेश्वरी )
तू नेकी कर या बदी कर...
मेरे विरह वेदना के पलों को..
बस इक सदी ना कर.....रामेश्वरी
जब तलक खुदा था तू...
सबसे जुदा था तू ...
रोज सजदे किये थे मैंने ..
जब से खुदा से खुद हुआ है..
नशे में क्या बेसुध हुआ है...

खुदी से खुद..
खुद से खुदा((अहंकारी ) बन गए ..
पर हम फ़कीर अब कहाँ ..
रोज सजदा करेंगे...रामेश्वरी
मेरे शब्दों को शब्द दे दो...
मैं गूंगी हूँ बे -आवाज़ नहीं...

लहरों पर नाचे मेरा दिल भी..
हवा का गुनगुनाना..
पंछियों का चहचहाना..सुन..
मचलता गुनगुनाता मेरा दिल भी..
पर तार जिसके तोड़ दिए जाए..

मैं वो साज़ नहीं....(रामेश्वरी )

Wednesday, November 16, 2011

बंद पिंजरे में पंख मेरे....
तू मेरे लिए आसमां ना बना....
भूल गयी में अस्तित्व अपना...
भूल गयी में आवाज़ अपनी...
भूल गयी में पहचान अपनी..
चेहरा अपना भूल गयी हूँ.
तू मेरे लिए आईना ना बना...

क़ैद बरसों से इक पिंजरे में...
उड़ना जैसे भूल गयी...
देखूं उड़ते संगी साथी...
जुड़ना उनसे भूल गयी हूँ...
भूल गयी में पंछी हूँ...
बोलूँ बस राम राम ...
चहचहाना अपना भूल गयी हूँ..

सुन बहेलिये इस फरियादी की..
आज़ादी में भूल गयी हूँ..

बंद और कैद हुए हैं पर मेरे...
मैं तो पर भी हैं मेरे..
यह अहसास भूल गयी हूँ...(रामेश्वरी)

इक तोता जो बीस साल से इक पिंजरे में क़ैद है......उसे कैसा महसूस होता होगा...वही महसूस करने की कोशिश की...
कभी इंसान खुद को उन पिंजरों में इतने ही वर्ष बंद करके देखे......तब शायद उनकी पीड़ा महसूस हो.....
कल से कलम तक...
कलम से कलाम तलक ...
शब्दों की राह छोटी सही..
अर्थों की डगर बहुत बड़ी है..

कल से कलम तलक..
गरीब को गरीबी पार करनी है..
कलम से कलाम तलक विद्या ...
हौसला, लगन से निखार करनी है...(रामेश्वरी)

Saturday, November 12, 2011

हाय हाय रे भ्रस्टाचार है...
शिक्षा में,दीक्षा में...
रेल में रिक्शा में...
बड़ी बड़ी परीक्षा में...

घर में बाज़ार में ..
अब तो रिश्तों में, शिस्टाचार में....
.
हाय हाय रे भ्रस्टाचार है...

दीन main ईमान में..
राशन की दूकान में..
माँ की रसोई में..
सब्जियों के तोल में..
घटते बड़ते मोल में..
गैस की भरपाई में..
नोटों की गडडी बन ..
दबी रजाई में..

हाय हाय रे भ्रस्टाचार है...

सड़क पर जब सरेआम बच्चा जन्म लेता है..
इंसानियत भी देखो कैसे गर्म जेबों में बंद रहता है ...
देखो देखो ...
खुलेआम बिकता इमानदारी का अच्चार दिखता है..

आज की राधा में, आज के कृष्णा में..
कोडियों के भाव बिकता प्यार दिखता है..
भूख में हमारी, हमारी तृष्णा में..
मिलावट बन हर जगह बस्ता है...

हाय हाय रे भ्रस्टाचार है...

विद्या के मंदिर में..शिक्षा पाने को..
विद्या के ठेकेदरों को मनाने में...
दान बन भारस्ताचार दिखता है..
ज्ञान भी हाय रे अब....दान में बिकता है..

अब तो परिवारों में भी भ्रस्ताचार है...
जिसके घर हो धन दौलत उसी का सारा परिवार है

आज कसम यही में तो खाऊंगी..
गाय को घास अवश्य....
पर घूस किसी को ना खिलाऊंगी..

हाय हाय रे भ्रस्टाचार है...
(रामेश्वरी)

Wednesday, November 9, 2011

कलयुग में नीम पर भी अब आम लगे हैं...
देखो2 कैसे गधों के सर भी सींघ लगे हैं..(रामेश्वरी)
ये मातम था मेरे जनाजे पर ..
या बज रही शहनाई थी ...
कुम्भ में भी यूँ लगे.ज्यूँ ..
मुझ पर हंस रही तन्हाई थी ....(रामेश्वरी)
कब्र पर मेरी पंखा झल कुछ न मिलेगा...
गीला कहीं नहीं फिर भी गिला मिलेगा..(रामेश्वरी)
चुपके से झोंका कुछ गुनगुना गया..
क्या धुन थी .क्या तराना था..
उसको गुजरना था मेरे करीब से..
बस गुजरने का यूँ इक बहाना था..

महुआ तले बैठूं जो...
उसमे मीठास महुआ की...
नीम तले बैठूं जो...
काम करे वो दवा सी ..
ये प्रदुषण का युग है..
वो शुधि का जमाना था..

यहाँ प्रदूषण वहां प्रदूषण ...
खून भी प्रदूषित हुआ है..
उस युग में लंका में विभीषण ..
अब घर घर इक विभीषण 
हुआ 

है..
(रामेश्वरी)
घुमा सारा जहाँ...
बाजार सारे छाने हैं..
जहाँ बिके दीन-इमान...
कहाँ वो दुकाने हैं....
(रामेश्वरी)

Sunday, November 6, 2011

आधी ज़िन्दगी के लिए...
आधी ज़िन्दगी गवां दी..
जब जीने का वक़्त आया....
मौत ने दस्तक सुना दी..(रामेश्वरी)
सच बोलने वालों को बावला करार दिया जाता है...
कभी उन्हें फांसी कभी पागलखाना दिया जाता है..

अब सच बोलने से क्यूँ डरते हैं हम..?
क्यूंकि पागलखाने से डरते हैं हम...

बोल सच बोलेगा?
मुँह गर खोलेगा...

बिना टिकेट आगरा की सैर करवाएंगे..
बंद कर तहखाने में शाहजहाँ तुझे बनायेंगे...

बोल ना सच क्यूँ बोलता है..
क्यूँ बहरों के कान खोलता है...
क्यूँ अंधों को सच दिखलाता है..
चुप नहीं हो सकता .......बोल 
इसमें तेरा क्या जाता है...

इसमें भी घोटाला है..
इसमें भी घोटाला है ..
कहता है सबसे..
जिसको हमने सदियों टाला है....

इतिहास गवाह है...
सच्चाई हमेशा सूली चड़ा है ...
बोल क्यूँ जिद पर अड़ा है...

चुप ना हुआ तो ...
रोज झूठ का इंजेक्सन तुझे लगायेंगे..
झूठ तेरी रगों में  बहायेंगे...

(रामेश्वरी)