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Wednesday, November 9, 2011

चुपके से झोंका कुछ गुनगुना गया..
क्या धुन थी .क्या तराना था..
उसको गुजरना था मेरे करीब से..
बस गुजरने का यूँ इक बहाना था..

महुआ तले बैठूं जो...
उसमे मीठास महुआ की...
नीम तले बैठूं जो...
काम करे वो दवा सी ..
ये प्रदुषण का युग है..
वो शुधि का जमाना था..

यहाँ प्रदूषण वहां प्रदूषण ...
खून भी प्रदूषित हुआ है..
उस युग में लंका में विभीषण ..
अब घर घर इक विभीषण 
हुआ 

है..
(रामेश्वरी)

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