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Wednesday, November 16, 2011

बंद पिंजरे में पंख मेरे....
तू मेरे लिए आसमां ना बना....
भूल गयी में अस्तित्व अपना...
भूल गयी में आवाज़ अपनी...
भूल गयी में पहचान अपनी..
चेहरा अपना भूल गयी हूँ.
तू मेरे लिए आईना ना बना...

क़ैद बरसों से इक पिंजरे में...
उड़ना जैसे भूल गयी...
देखूं उड़ते संगी साथी...
जुड़ना उनसे भूल गयी हूँ...
भूल गयी में पंछी हूँ...
बोलूँ बस राम राम ...
चहचहाना अपना भूल गयी हूँ..

सुन बहेलिये इस फरियादी की..
आज़ादी में भूल गयी हूँ..

बंद और कैद हुए हैं पर मेरे...
मैं तो पर भी हैं मेरे..
यह अहसास भूल गयी हूँ...(रामेश्वरी)

इक तोता जो बीस साल से इक पिंजरे में क़ैद है......उसे कैसा महसूस होता होगा...वही महसूस करने की कोशिश की...
कभी इंसान खुद को उन पिंजरों में इतने ही वर्ष बंद करके देखे......तब शायद उनकी पीड़ा महसूस हो.....

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