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Monday, November 28, 2011

वो बहे हैं पर हवा नहीं...
वो खुदा सा दिखे...
पर वजूद उसका हर जगह नहीं..
वो पथहर सा भी लगे..
पर वो पसीजा हर कहीं...
वो धुंआ भी लगे .....
पर वो ईर्ष्या में जला कभी नहीं..
वो गंगा जल सा भी लगे..
पर वो इतना वफ़ा में पाक साफ़ भी नहीं...
वो मजनू सा, राँझा सा भी लगे..
पर मैं कभी लैला..हीर लगी नहीं...
वो बादल सा भी कभी लगे..
पर वो सुखी धरातल पर बरसा कभी कभी नहीं..
वो नमक सा भी लगे...
पर किसी घायल के घाव हरे उसने किये कभी नहीं...
कभी शहद भी लगे..
पर चापलूसी की उसने कभी नहीं...

अब तू ही बता तेरा वजूद क्या है..
तेरी सूरत और आकार क्या है ?
कहीं तू भी निराकार तो नहीं ?..रामेश्वरी ...

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