Search My Blog

Monday, November 28, 2011

कितनी अजीबो गरीब ये किताब और फलसफे ज़िन्दगी हैं ...
इसके लेखक भी हम...इसके पाठक भी हम ही हम हैं ....
फलसफो में देखिये...भरे पड़े फलसफे गम ही गम हैं (रामेश्वरी )

No comments:

Post a Comment