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Sunday, February 24, 2013

चला हूँ मैं ।

चला हूँ मैं । 


है गुरुर सागर को 
गहराई पर अपनी …. 
सागर की गहराई ..
मापने चला हूँ मैं ...
देखूं तो  सही ..
विशालता की उपमा  कहीं ..
संकुचित तो  नहीं ..
 उसकी हर लहर से ..
 टकराने चला हूँ मैं ..
संग उन्मादित सा ..
लहराने लगा हूँ मैं ...
रसिया है सागर ..
संग नदियों का पाकर ..
नदियों से बतियाने चला हूँ ..
सागर की गहराई ..
उन्हें बताने चला हूँ मैं ...
खार निगला सगर जगत का ..
अमृत का उसे पता नहीं ..
मंथन करने चला हूँ मैं ..रामेश्वरी 

चला हूँ मैं । 


है गुरुर सागर को 
गहराई पर अपनी …. 
सागर की गहराई ..
मापने चला हूँ मैं ...
देखूं तो  सही ..
विशालता की उपमा  कहीं ..
संकुचित तो  नहीं ..
 उसकी हर लहर से ..
 टकराने चला हूँ मैं ..
संग उन्मादित सा ..
लहराने लगा हूँ मैं ...
रसिया है सागर ..
संग नदियों का पाकर ..
नदियों से बतियाने चला हूँ ..
सागर की गहराई ..
उन्हें बताने चला हूँ मैं ...
खार निगला सगर जगत का ..
अमृत का उसे पता नहीं ..
मंथन करने चला हूँ मैं ..रामेश्वरी 

Friday, February 22, 2013

आसमां छूने चला था, 
आदमी .....
क्यूँ धरा पर हताश सा ...
आदमी ....
लाशों को रौंदता ..
विकास को अग्रसर ..
फिर भी मायूस ..
खुशियों से मरहूम ..
गुमसुम ....
आदमी .... ..
पंचतत्व निर्मित ..
देह ..
हाड मॉस का लोथड़ा ..
आदमी ..
बेसुध, इंसानियत से ..
दूर, भगोड़ा ..
आदमी ..
जनावर भीतर ..
देखा ...
थोड़ा थोड़ा आदमी ..
 पंचतत्वों को टटोलता,
दो जून रोटी को, 
सागर सा मूंह खोलता ..
 धर्म पर खून खौलता 
खुदी का खुदा ..
बन रहा आदमी ...
फिर भी नाखुश सा ..
क्यूँ है आदमी ?

उड़ गए वो पंछी ..
जिनका कल तक ..
आशियाना था । 
आज है तो सिर्फ ..
मॉस के कुछ लोथडे ..
आग में जलते ..
जाने किस गुमनाम ..
नाम की तलाश में ...
कुछ की बोली तय हो चुकी ..
कितनो की ममता सो चुकी ..
किसने खेली होली ..
रंग चढ़ा नहीं था अभी पलाश में ..
ये किसने ..
बसंत की खुमारी पर ..
पतझड़ मिला दिया ..
ये किसने ..
इंसानियत का अस्तित्व ..
हिला दिया…। रामेश्वरी

ये आम आदमी

कौन है ..
कैसा है…
कहाँ है… 
हर ब्लास्ट पर ..
घायल
हर धमाके में ..
सुना वही उड़ा।।
जिसके लिए बना ..
कानून कड़ा ..
महंगाई की चक्की में ..
पिस रहा है जो…. 
फूटपाथ पर… 
खांस रहा ..
दमे से मर रहा है  ..
चैन की सांस को ..
तरस रहा है जो ...
किसी ने कहा ..
कठपुतली बन चूका है … 
किसी स्वयं घोषित भगवान् को ..
आपबीती सुना रहा है वो। 
भौतिक युग की आपाधापी में ..
आपा खो रहा है। 
बस पैसे की बीज बो रहा है। 
पहले खोते थे कुम्भ में लोग। 
अब घर में ही खो रहा है….
किसी ने दिया पता ..
मुर्दाघर का ..
कहा "ढूंढ ले "
सुना फिर कल ..
मरा है आम आदमी ..
गूंगा है। 
मरना लाज़मी ..
रोज मरने को। 
जी रहा है आदमी ...
कैसा जीव है ..
ये आम आदमी ...रामेश्वरी 

Sunday, February 10, 2013

घट-घट ओनू खोजया,  ता भी घटी न प्रीत ।
घट सी ता सिर्फ नजरां,  जदों नट गया मन दा मीत ।
रब करे घट होवे ओहदा रास्ता, मैनू होवे उनादे दीद ।।रामेश्वरी 

Tuesday, February 5, 2013

लगूं माँ के गले ।
या भूख गले लगाऊं ।।
समझ नहीं पाती ।
सोना महंगा, या चपाती ।
यूँ ही तो नहीं, कोई अबोध बच्ची ।
रस्सी झूल जाती ।
(रामेश्वरी)
प्यार के व्यापार में, देखिये हमारा हाल ।
तन पर ना खाल रही, रहे सर पर ना बाल । 
उनकी ही गलियों में भटक रहे अब देखिये ।
कितना खूबसूरत, मोहक ये उनका रूप जाल ।
ना आकाश रहा अपना, ना डूबने को पाताल ।
त्रिशंकु सा लटक रहा, हँस रहा मुझ पर हर डाल ।
गर तन पर खाल है आपकी जनाब, सर पर हैं बाल ।
दौडिए इस गली से, काट रूप जाल, बचे बाल बाल ।।।रामेश्वरी
प्रेम में प्रताड़ना ।
अब किसे भाती है ।
इतिहास में लैला ने पत्थर खाए ।
अब की लैला पिज़्ज़ा खाती है ।
अनारकली क़ैद रही दीवारों में ।
अब की अनारकली स्वछंद डिस्को जाती है ।। 
पहले पाती लिखते थे, प्रेमी ।
लुकचुप दीवारों में ।
अब मोबाइल सिम हुए ।
जाने कहाँ वो प्रेम गया ।
जामे कहाँ वो दिन गए ।
भौतिकता के दौर में ।
स्वर्णिम दिन ग़ुम हुए ।

रामेश्वरी
ये माँ का जीवन ।
समग्र जीवन संतान को अर्पण ।
अपनी ही छवि देखे उनमे वो ।
उसकी संतान ही, हो उसका ज्यूँ दर्पण ।।

दुर्भाग्य ये कैसा, मिटा दर्पण माँ का ।
फ़िल्मी किरदार दीवारों पर सजा रहे ।
माँ मेरा जीवन अर्पण तुझे।
मैं माँ का जीवन ।।...sidhi bhawon ki group main likhe gaye mere shabd...
हालत पर मेरे लोग कहने लगे हैं अवाम के सभी ।
सजा देना बेवफायियाँ इनकी, मेरे जनाज़े में सभी ।
रामेश्वरी
ज्यूँ हर बहती हवा, पुरवाई नहीं होती ।
इतनी लकीरें हाथों में, सब में लिखी जुदाई नहीं होती ।।रामेश्वरी
संघर्ष का मेरे, पहचान हैं ये ।
दिल की अमीरी का प्रमाण हैं ये ।
फेंका था किसी रईस ने, इन्हें रात में ।
साथ देती अब मेरा यही, हर राह में ।
रईस की आवारगी का सुबूत हैं ये ।
अब यही, इस गरीब की आवारगी में, बूट हैं ये ।
हाँ, हाँ इनमे वो लचक वो चमक ना सही ।
इनमे मेरा पसीना चमकता है ।
गरीब का चेहरा तो ..
इन्हें पाकर भी दमकता है .............रामेश्वरी..tasveer kya bole group main mere likhe gaye chand shabd...
इक गुमसुम सा शोर ।
दूजा शोर मचाता उदंड शोर ।
नगर, गली, शहर, चौराहों में शोर ।
दरार है शोर की, अब दीवारों में ।।

यूँ अंतर्मन, परेशान, सभी शोर से है ।
कहीं भ्रस्टाचार का, कहीं बलात्कार का ।
बस अब हल, क्रान्ति चाहिए ।
मुझे अब शांति चाहिए ।।।।रामेश्वरी
सच दफ़न, कई परतों के साथ ।
इक इक परत पर, सौ झूठ निकले खुदाई से।
कटघरे में, बेइमान का यही बयाँ ।
हुजुर, मेरी बेईमानी की वज़ह है वो ।
नित नए वस्त्र, रंग रोगन ओढती है जो ।
मैं तो सिर्फ, भयभीत, उसकी जुदाई से ।।
रंग रोगन, मोल लाया उपरी कमाई से ।।।रामेश्वरी
कहते लोग सबहिं, भूत पिशाच हनुमान भगाये ।
एक मोरी पिशाचन ऐसी देखि, भगवान डरी जाए ।

कहत बुढे बुढ़ीन सबहीं, भूत पिशाचन की पहचान यही, राखे उल्टे पाँव ।
मोरी पिशाचन ऐसी रही, देखि सेल जबहूँ कहीं, दौडी सर पर रख पाँव ।

जतन करे सबर, करे हवन कई, पूजन कई करवाए ।
सुने हम कई ग्रन्थ में, अग्नि देखि भुत पिशाच भागि जाये ।
धर्मपत्नी पिशाचन वो, जो अग्नि फेरन से, गृह प्रवेश पाए ।।।।सिर्फ एक व्यंग्य कोई इसे अन्यथा ना लें ।।रामेश्वरी
हाय रे आधुनिकता ।
तू इतनी गहरी जड़े जमा गयी ।
संबंध बस नाम के रहे ।
प्रेम तो भौतिकता के दलदल में समां गयी ।
सभी पर ज्वर दिखावे का चढ़ा ।
श्रेय पाने को महंगाई भी पंक्ति में खड़ा ।।। रामेश्वरी

I live among the mass
The butchers, masons, cobblers, 
The cable guys and the milkmen,
I live Among 
Men who carries LPG cylinders to your home,
Painters, barbers and plumbers
Well there are some more ,
The painted women and 
The flock of laborers , clerks, sales men, hosiery workers,
I am in the vicinity of those
Who mend your garden or clean your toilets,
I live among the religious fanatics
For those everything happens at the instance of god
And all their miseries are the sins they do everyday
Every morning I watch faces of school going girls
Waiting to rise and shine ,
And in the daytime I watch boys going to the same place
to learn, they wouldn’t love to do
there lives a few politician with wicked faces
and some retailers with greedy eyes
a money lender with few goons looking menacingly
I go with them leaving my tiny hole behind
Merge with them at the bus stops
And becomes part of mangled crowded bus
Which stops at odd places with people keep filling in
And I do some odd to earn a little to keep my ration filling,
Yes I am one of them
I do not know who to vote, who to criticize and who to follow
Unconcerned over the stock prices, or what these filmsy girl wore in that fashion show,
Who will tell the truth to me plans of the politicians for my benefit,
When my heard moves , I follow
Yes
I am the mass
I create the so called India,
under privileged, suppressed, denied, frustrated,
i am a ticking time bomb
जागती रातों से, जागने का शबब पूछने को ।
सूरज तो डूबा नहीं तन्हाई में, हमीं ने पलकें झुकाई हैं ।।रामेश्वरी