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Friday, February 22, 2013

आसमां छूने चला था, 
आदमी .....
क्यूँ धरा पर हताश सा ...
आदमी ....
लाशों को रौंदता ..
विकास को अग्रसर ..
फिर भी मायूस ..
खुशियों से मरहूम ..
गुमसुम ....
आदमी .... ..
पंचतत्व निर्मित ..
देह ..
हाड मॉस का लोथड़ा ..
आदमी ..
बेसुध, इंसानियत से ..
दूर, भगोड़ा ..
आदमी ..
जनावर भीतर ..
देखा ...
थोड़ा थोड़ा आदमी ..
 पंचतत्वों को टटोलता,
दो जून रोटी को, 
सागर सा मूंह खोलता ..
 धर्म पर खून खौलता 
खुदी का खुदा ..
बन रहा आदमी ...
फिर भी नाखुश सा ..
क्यूँ है आदमी ?

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