उड़ गए वो पंछी ..
जिनका कल तक ..
आशियाना था ।
आज है तो सिर्फ ..
मॉस के कुछ लोथडे ..
आग में जलते ..
जाने किस गुमनाम ..
नाम की तलाश में ...
कुछ की बोली तय हो चुकी ..
कितनो की ममता सो चुकी ..
किसने खेली होली ..
रंग चढ़ा नहीं था अभी पलाश में ..
ये किसने ..
बसंत की खुमारी पर ..
पतझड़ मिला दिया ..
ये किसने ..
इंसानियत का अस्तित्व ..
हिला दिया…। रामेश्वरी
जिनका कल तक ..
आशियाना था ।
आज है तो सिर्फ ..
मॉस के कुछ लोथडे ..
आग में जलते ..
जाने किस गुमनाम ..
नाम की तलाश में ...
कुछ की बोली तय हो चुकी ..
कितनो की ममता सो चुकी ..
किसने खेली होली ..
रंग चढ़ा नहीं था अभी पलाश में ..
ये किसने ..
बसंत की खुमारी पर ..
पतझड़ मिला दिया ..
ये किसने ..
इंसानियत का अस्तित्व ..
हिला दिया…। रामेश्वरी
No comments:
Post a Comment