सच दफ़न, कई परतों के साथ ।
इक इक परत पर, सौ झूठ निकले खुदाई से।
कटघरे में, बेइमान का यही बयाँ ।
हुजुर, मेरी बेईमानी की वज़ह है वो ।
नित नए वस्त्र, रंग रोगन ओढती है जो ।
मैं तो सिर्फ, भयभीत, उसकी जुदाई से ।।
रंग रोगन, मोल लाया उपरी कमाई से ।।।रामेश्वरी
इक इक परत पर, सौ झूठ निकले खुदाई से।
कटघरे में, बेइमान का यही बयाँ ।
हुजुर, मेरी बेईमानी की वज़ह है वो ।
नित नए वस्त्र, रंग रोगन ओढती है जो ।
मैं तो सिर्फ, भयभीत, उसकी जुदाई से ।।
रंग रोगन, मोल लाया उपरी कमाई से ।।।रामेश्वरी
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