चला हूँ मैं ।
है गुरुर सागर को
गहराई पर अपनी ….
सागर की गहराई ..
मापने चला हूँ मैं ...
देखूं तो सही ..
विशालता की उपमा कहीं ..
संकुचित तो नहीं ..
उसकी हर लहर से ..
टकराने चला हूँ मैं ..
संग उन्मादित सा ..
लहराने लगा हूँ मैं ...
रसिया है सागर ..
संग नदियों का पाकर ..
नदियों से बतियाने चला हूँ ..
सागर की गहराई ..
उन्हें बताने चला हूँ मैं ...
खार निगला सगर जगत का ..
अमृत का उसे पता नहीं ..
मंथन करने चला हूँ मैं ..रामेश्वरी
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