कहते लोग सबहिं, भूत पिशाच हनुमान भगाये ।
एक मोरी पिशाचन ऐसी देखि, भगवान डरी जाए ।
कहत बुढे बुढ़ीन सबहीं, भूत पिशाचन की पहचान यही, राखे उल्टे पाँव ।
मोरी पिशाचन ऐसी रही, देखि सेल जबहूँ कहीं, दौडी सर पर रख पाँव ।
जतन करे सबर, करे हवन कई, पूजन कई करवाए ।
सुने हम कई ग्रन्थ में, अग्नि देखि भुत पिशाच भागि जाये ।
धर्मपत्नी पिशाचन वो, जो अग्नि फेरन से, गृह प्रवेश पाए ।।।।सिर्फ एक व्यंग्य कोई इसे अन्यथा ना लें ।।रामेश्वरी
एक मोरी पिशाचन ऐसी देखि, भगवान डरी जाए ।
कहत बुढे बुढ़ीन सबहीं, भूत पिशाचन की पहचान यही, राखे उल्टे पाँव ।
मोरी पिशाचन ऐसी रही, देखि सेल जबहूँ कहीं, दौडी सर पर रख पाँव ।
जतन करे सबर, करे हवन कई, पूजन कई करवाए ।
सुने हम कई ग्रन्थ में, अग्नि देखि भुत पिशाच भागि जाये ।
धर्मपत्नी पिशाचन वो, जो अग्नि फेरन से, गृह प्रवेश पाए ।।।।सिर्फ एक व्यंग्य कोई इसे अन्यथा ना लें ।।रामेश्वरी

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