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Wednesday, April 18, 2012

अगला चुनाव

खिन्न भिन्न से, क्यूँ नोचते हो ..
तुम सर के बेगुनाह ये बाल....
हार का सेहरा पहना  है जो इस साल....
दबा दो माल गोदामों  में, 
पीयेंगे सिर्फ ये उबली दाल..
महंगाई खुद आसमान छू जायेगी...
तमतमायेंगे जनता के ये सुर्ख गाल लाल...
नारे फिर तुम भी लगाना...
चिल्लाना फिर तुम भी, गली२ डाल२...
"हाय ये महंगाई के लाल"....
अगला चुनाव जब आएगा...
जीतोगे तुम ही उस साल...............रामेश्वरी....

Thursday, April 12, 2012

गधा महाराज

एक बार एक जंगल में सभी गधे सभा कर रहे थे, कि हम सभी एक हैं और सभी गधे भी हैं तो क्यूँ हम अपना राजा शेर को बनायें |   शेर कि अक्ल और शक्ति से हमें क्या लेना देना ?   चुनाव हुए और सभी गधों ने अपने समाज से ही इक गधे को राजा बना दिया|   बेचारा शेर मूंह लटकाएं उनकी काम अक्ली और मूर्खता को देख चुपचाप बैठा रहा, वह अकेले करता भी क्या क्यूंकि बहुतमत उसके खिलाफ ही था|    पर देखिये उनका निर्णय का फल, राजा  गधा आखिर गधा ही ठहरा, बिना प्रजा कि लात मारे वो काम ही ना करे, और सारे गधे उसे लात मारें तो सजा ए मौत कि सजा|  इधर कुआँ उधर खाई, ये बात उन्हें अब बहुत देर से समझ आई, जब प्रजा खुद ना घर कि ना घाट कि कहलाई |  और प्रजा करती भी क्या, कुछ साल  फिर नए चुनाव होने तक मूंह ताकती रही..........

प्यार बिकाऊँ तो ना था, लगाया किसने इश्तेहार इसके व्यापार का |
अपने ही सौदा करेंगे इसका, शायद यही दस्तूर है इसके बाज़ार का ||.....(रामेश्वरी )...........
ये सुबह आखिरी थी, ये ढलती शाम आखिरी है...
पढ़ लेना मेरे मरने के बाद, ये पैगाम आखिरी है........

पीने दो मुझे जी भर के, बस यह अब काम आखिरी है..
साकी भर प्याला मय का, इस मयखाने में मेरा जाम आखिरी है ....

लो ऑंखें मूँद ली हमने..
डूबे ना कोई इन आँखों में, खुदखुशी की मनाही है....
इस झील में गहराई इतनी है..
ना इश्क से डरते हैं, ना रुसवाई से डरते हैं |
अँधेरा है कलम में मेरे, रोशनाई से डरते हैं ||..


ना इश्क से डरते हैं, ना रुसवाई से डरते हैं....
हम तो बस गए वक़्त की परछाई से डरते हैं ..
सूरज को रोशनी, चाँद को चांदनी,गुड को चाशनी देना सीखाया नहीं जाता |
सांप को डसना, पुष्प को हसना, अजगर को कसना सीखाया नहीं जाता |
इक इंसान जिसे इंसानियत सिखानी पड़े, इंसान उसे बनाया नहीं जाता 
चलो फिर आज धुल से धूमिल आँगन को पोतना है |
लम्हा२ उजड़ा था आँगन ये, फिर से इससे जोतना है ||

दो चार बीज लायी हूँ, ख़ुशी के उधार, बेगाने से, हल भी जोतना है |
पनपेगा धीरे२, फल लगेंगे ख़ुशी के, उधार वापसी का भी सोचना है ||.............रामेश्वरी
वो देखो बादलों को चीर कर एक किरण अस्तित्व में आई है |
कब तक ढक सकता था, मनचला है वो, जान आफत में आई है ||..................रामेश्वरी







आज सच दबा है, कल कंठ में हुंकार होगी |
त्राहित्राहि करेगा झूठ, दो घूंट जल की पुकार होगी ||.





जब अपनों से ही घायल हुए, तो अब गैरों से क्या डरना |जब मर ही गए अपनों के हाथों, मरे हुए को और क्या मरना ||....
खिले बाग़ में फूल कई, कोई अकेला खिला, क्या आजमा रहा होता है |
इतने बड़े गुलिस्तां में वो, कांटो पर खिल कर भी मुस्कुरा रहा होता है....

जिनके मुठियाँ भरी थी खुशियों से, मिली जो इस जहां से |
खोल मुठियाँ फैला दी, वही खुशियाँ लौटाने इस जहां को ||
खोलते कैसे हम मुठियाँ अपनी, भरी जो दुखों से इस जहां के |
और वो पूछते हैं सारे जहां, क्या राज है उनकी बंद मुठियों का ||..............
(जिसको दुनिया से जो मिलता है वह वही लौटाता है...रामेश्वरी
देती थी रूह को जो सुकून ए छाँव |
बरगद की डालियाँ वो अब कट चुकीं ||
सीमा पर उगा था बदकिस्मत वो भी |
देश बंटे, वो डालियाँ भी बंट चुकीं ||
जो यहाँ शांति थी वहां सुकून था||
यहाँ सनक थी, वहां जूनून था||
दोनों की तपन पर एक थी....
दोनों के सर तप रही धुप एक थी |
दोनों को चाहिए सर छाँव एक थी|
क्यूँ बरगद फिर धराशायी हुआ ||
(रामेश्वरी )

वो बचपन का चाँद

दिन भर की मेहनत से..
थका थका सा टूटा सा ये तन मन ..
थोड़ा सुस्ता लूं ...
सुन शीतल पवन थोड़ा सुला दे मुझे ...
छु कर जा मुझे भी, जैसे छुआ गुलाब...
चिंतित ह्रदय में अब भी उठ रहे सैलाब ...
कैसे दूँगी, कल भविष्य को जवाब...
चाँद भी अब, कहानियाँ सुनाता नहीं..
टिमटिमाता तारा दूर तक नज़र आता नहीं....
बस छाए गर्दिशों के बादल हैं...
मैला सा अब, आकाश का आँचल है....
छोटे थे जब, इन्ही तारों में गम छुपा देते थे...
चाँद का मासूम चेहरा देख, मुस्कुरा दिया करते थे ...
जब से आकाश भी बोझिल नाराज़ है...
बचपन भी बुझा बुझा सा, नाराज़ है....रामेश्वरी

रोटी

जब भर पेट दुनिया, सोयी नज़र आती है ...
इक बच्ची कहीं सिसकियों में रोती नज़र आती है.....
पुछा जो उससे जा करीब उसके...
क्या कारण है सिसकियों का उसके...
बोली जैसे तैसे आंसू रोक वो....
जो रोटी मांगी थी मैंने, इक सेठानी से ...
भूख शांत करने उदर को अपने..
सेठानी ने वो रोटी ...
अपने पालतू कुत्ते को डाल दी.....
धकेल मुझे द्वार से अपने,
उसने चटकनी लगा दी....
सोच रही हूँ अंकल मैं कुत्ता ही होती...
किसी सेठ के घर मजे से सोफे सोयी होती.................रामेश्वरी

Friday, April 6, 2012

बड़ा सुकून ऐ शांति है मकबरे पर मेरे |
कितनी खुश हैं वो, मेरे घर से यहाँ तक आने में ||..(रामेश्वरी)
आज भी मकबरे में कब्र में मेरी, उमस बहुत है |
क्या कोई मेरा अपना,  मेरे लिए रोया भी नहीं ||... 

यूँ तो अकेला नहीं,  बगल में कब्र गैरों की बहुत हैं |
ताल्लुक रखा रसूख वालों से, अकेला सोया कभी नहीं ||

हर बरस मेला सजता है कब्र पर मेरी, भीड़ बहुत है |
लोग आते कांटे छोड़ जाते हैं, क्यूँ सुकून फूलों सा बोया नहीं ||

रूह देती आवाज़ बार२, सुनो जग वालों, ये कांटे चुभते बहुत हैं |
कहा हर आते जाते ने, जैसा बोते वैसा पाते हैं, क्या तुमने कांटा बोया नहीं ?

इसीलिए हर मेले कब्र पर तुम्हारी,  हम कांटे छोड़ जाते हैं कांटे छोड़ जाते हैं >>>>>>>>>>>>>रामेश्वरी 

Tuesday, April 3, 2012

मिले जो दीदार आशिक को यार का ..
मज़ा है तभी दीवानों, मेरे इंतज़ार का ...

लबों पर उनके गज़ब की मुस्कराहट है ..
जानते नहीं,शबब हैं वो , मेरे करार का ....

बहार उन्ही से है, इस फिजा ऐ दिल में 
चाह किसे अब, इस मौसम ऐ बहार का ..

दिल धडकता है उन्ही की धडकनों से..
इक बार एतबार कर, मेरे एतबार का ...

दौड़ रही लहू में चाहत की तरंगे यूँ ही ...
सवाल कहाँ है अब इन पर इख्तियार का ...

कहते हो, क्या कीमत है मेरी निगाहों में तेरी ..
मोल भाव ना कर, ये खिलौना नहीं बाज़ार का ...

लटें बिखरी, लिबास ज़र२, लहूलूहान हूँ ठोकरों से ..
शायद यही है अंजाम ऐ सरहद तेरे मेरे प्यार का ...
 














चल उस मोहल्ले की गली का चप्पा चप्पा छानते हैं दोस्तों....
जहाँ सब अपने हो, रिश्ता गैरों अपनों में ना बांटते हो दोस्तों.............

बेशक गली हो पत्थरदिलों की, ज़ज्बात ना जानते हो दोस्तों...
हर रोज एक नया बुत पत्थरों में, तराशना वो जानते हो दोस्तों ..............रामेश्वरी 


प्यार बिकाऊँ तो ना था, लगाया किसने इश्तेहार इसके व्यापार का |
अपने ही सौदा करेंगे इसका, शायद यही दस्तूर है इसके बाज़ार का ||.....(रामेश्वरी )

Sunday, April 1, 2012

दर और दरमियाँ में कहो तो फर्क कितना है..
फर्क बस नजदीकियों और फ़ासलों में जितना है...

देख न निगाहें तेर कर, निगाहों में मेरी, पता नहीं गहरा ये कितना है ...
क्या पाओगे इनमे डूब, कोना बसर को ढूंढोगे कैसे, ये चींटी भर जितना है...............रामेश्वरी
कल तक आजमाई थी लकीरें माथे की, आज हथेलियों को आजमाना है...
जो पा न सके किस्मत की लकीरों से, उस पर अब हथेलियों को आजमाना है .............रामेश्वरी
कैसे मलीन करूँ ह्रदय अपना, कीचड इसमें लाऊं कैसे, वो मिलता नहीं 
चाहा खिलाना कमल, भीतर अपने, बिन कीचड पावन कमल खिलता नहीं.....

खोजा बहुत कीचड कमल खिलाने को, दलदल मिला कीचड कहीं मिलता नहीं...
कीचड के छींटों से पाक साफ हो सकते हम, दलदल में गिर कोई संभला नहीं ...........रामेश्वरी (दलदल का अर्थ बुराइयाँ )
दो गज ज़मीन चाहिए, चैन सुकून से सोने को......
वो सोता नहीं, भटकता बहुमंजीले हवाई महल बना2....





दो कदम चलना था, इस दिल से उस दिल की राह पर ...
वो इतरा रहा, बैठ अकेले चमचमाती लखपति टकटकिया पर .....
बनाओ मिजाज़ अपना भी, उस बहते दरिया की तरह...
मीलों चलकर मिले जो सागर से, आंसू भी दिखे ना उसके पानी में मिलकर .............रामेश्वरी
वो डर डर भटके, खाक छानी सारे जहाँ की, पाने दो गज ज़मीन, जन्नत-ऐ-कायनात की.....
हम बेसब्र, चले दो कदम, इस दिल से उस दिल तक, नाम करवा ली अपने, कायनात सारी .....रामेश्वरी
अब मकान पक्के और ईमानदारी कच्ची है ..
सूली चढ़ता वही, जिसके गर्दन जुबां सच्ची है..



अब मकान पक्के और ईमान कच्चा है...
अब वफ़ा भी ऊँची हैसियत का दामन थामती है .
दोस्तों महंगाई डायन सपनो में आती है..
वक़्त से पहले हमारी उम्र बड़ा जाती है......
सुना डायन चार घर छोडती है...
ये डायन निगोड़ी हर बच्चे का बचपन खा जाती है..

कितना मुश्किल है..

रोते को हँसाना, रूठे को मानना, 
कितना मुश्किल है................
सच बोलना, झूठों की पोल खोलना ...
कितना मुश्किल है ................
मृत प्राण लाना आसान, ईमान जगाना....
कितना मुश्किल है...................
सावन लाना आसान, अहंकारी अंधे को दुनिया दिखाना ...
कितना मुश्किल है..................
अंगूठा लगाना आसान, गदी से चिपके हुओं को उठाना ..
कितना मुश्किल है....
संत का प्रवचन आसान, मुखौटे ओडे नेता का प्रवचन सुनना ....
कितना मुश्किल है......................
नफरत का बीज बोना आसान, प्रेम वृक्ष सींचना .......
कितना मुश्किल है........................
(रामेश्वरी)......एक बार करके देखें....
हम सोचते रहे, इस बंजर सुखी धरती पर...
हुई क्यूँ ना छम छम बरसात सावन की...
निगाहें जब की, ऊपर की ओर इस धरा ने ...
सर ओढ़नी कहाँ थी धरा के, नीले आसमान की
बेदर्द मत फूंक इस आशियाने को, समझ किसी गैर का आशियाना...
गर इस आशियाने में मेहमां तेरा कोई अपना हुआ, मुश्किल होगा फिर बुझाना इसका.............
प्यार कुछ नहीं बस इक सरफिरा जूनून होता है...
नहीं जिसमे कुछ दिन चैन, ना सुकून होता है..
पागलों सी हालत होती है, हमारे भीतर हम नहीं..
सुने ना हमारी एक, कोई अनजान शख्स छुपा होता है...
करे दिल्लगी वो, और सारा इलज़ाम हमीं पर होता है...
हालत इसमें ऐसी, ना पैर ज़मीन पर ना आसमा पर होता है....
बचो इस रोग से दोस्तों, इस दर्द में भी हर कोई हंस रहा होता है......
इस रोग का हकीम भी, इसी दर्द की दवा ढून्ढ रहा होता है.....................

बचपन

इस दुनिया में नफरत का डेरा है..
सब करते बस हमेशा तेरा मेरा हैं..
चल उस जहाँ की और जाते हैं...
जहाँ से बचपन फिर ख़रीदे जाते हैं ...
जब जब बचपन हमारे साथ था ..
कहाँ दिन-रात का फर्क,ख्याल था ...
सब आँगन अपने हुआ करते थे..
सुबह आँगन अपने, दुसरे पल 
दुसरे आंगन झुला झुला करते थे..
पड़ोस की आंटियां भी माँ सा आदर ..
हम बच्चों से पाती थीं...
इक आज्ञा उनकी सर आँखों रखी जाती थी ...
दोस्ती ही हमारी उस पल रब्ब हुआ करती थी..
माने तो अब्बा ना माने तो बस कुट्टी हुआ करती थी...
आज कंक्रीट जंगल इतना विशाल हुआ है..
बचपन खुली हवा को तड़पकर बेहाल हुआ है...
इंसानी जानवरों के बीच इस जंगल में बचपन...
उम्र से पहले बुजुर्गी का एहसास भरे ढला हुआ है